नजरियाः क्या घर को आग लग जाएगी घर के चिराग से?

नजरियाः क्या घर को आग लग जाएगी घर के चिराग से?
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नीरज सिन्हा ,   Nov 17, 2019

आजसू के साथ गठबंधन टूटने और बनते- बिगड़े समीकरणों के बीच सरकार के मंत्री सरयू राय के फैसले से आज प्याले में तूफान उठ गया. सरयू राय के इस तेवर का बीजेपी को कतई अंदाजा नहीं रहा होगा. लेकिन 24 घंटे के भीतर मंत्री सरयू राय का यह फैसला उनकी हार- जीत से कहीं आगे निकलता दिख रहा है.

कह सकते हैं कि झारखंड में चुनावी सियासत एकबारगी 360 डिग्री पर घूम गई है. साथ ही बीजेपी के अंदर - बाहर सवाल उठने लगे हैं कि क्या घर को आग लग जाएगी घर के चिराग से.

आज सरयू राय ने अपनी ही सरकार के मुख्यमंत्री रघुवर दास की पूर्वी सिंहभूम सीट से चुनाव लड़ने की घोषणा की है. इसके साथ ही वे पश्चिम जमशेदपुर से भी लड़ेंगे.

उन्होंने निर्दलीय लड़ने का फैसला लिया है. अभी वे पश्चिम से ही विधायक हैं और इस सीट पर वे दो बार चुनाव जीते हैं. 

बीजेपी ने मुख्यमंत्री रघुवर दास को पूर्वी से उम्मीदवार बनाया है. बीजेपी को इसका भी गुमान रहा है कि रघुवर दास ने लगातार पांच बार पूर्वी से जीत हासिल की है.

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पिछले ही चुनाव में रघुवर दास ने कांग्रेस के उम्मीदवार आनंद बिहारी दूबे को  70 हजार 270 वोटों के अंतर से हराया था. जबकि जेवीएम के उम्मीदवार अभय कुमार सिंह तीसरे नंबर पर रहे थे. 

सरयू राय बीजेपी के वरिष्ठ नेता के तौर पर शुमार रहे हैं. संसदीय और विधायी कार्यों के जानकार तथा घपले- घोटाले उजागर करने में महारत रखने वाले सरयू राय के फैसले से दूरगामी और प्रतिकूल प्रभाव से इंकार नहीं किया जा सकता. 

जाहिर गठबंधन को लेकर आजसू के तल्ख तेवर से संभलने की कोशिशों में जुटी बीजेपी के रणनीतिकारों को अब सरयू राय के दांव से भी निपटने की चुनौतियां हैं. आज से जो आग सुलगी है, उसे बीजेपी काबू में कैसे करती है, इसे भी देखा जा सकता है. 

ये नौबत क्यों आई

81 सदस्यीय झारखंड विधानसभा के लिए अब तक बीजेपी ने 71 उम्मीदवारों की सूची जारी कर दी है. इसके लिए चार सूची जारी की गई है. लेकिन इनमें सरयू राय का नाम नहीं है. 

जबकि पश्चिम जमशेदपुर समेत बीस सीटों पर सात दिसंबर को चुनाव है और कल यानी 18 नवंबर को नामांकन की आखिरी तारीख है.

हालांकि सरयू राय ने मौके और वक्त की नजाकत को देखते हुए पर्चा खरीद लिया है. बीजेपी नेतृत्व द्वारा टिकट होल्ड पर रखे जाने को लेकर सरयू राय ने कई दिनों का इंतजार किया और जब उन्हें अहसास हुआ कि ये परिस्थितियां उनके राजनीतिक आचरण, निजी स्वभाव के खिलाफ जा रहा है, तो शनिवार को उन्होंने प्रेस कांफ्रेस करके कहा कि पार्टी के शीर्ष नेताओं को बता दिया है कि अब टिकट को लेकर मेरे बारे में विचार मत करिए. 

सरयू राय ने यह भी कहा था कि रविवार को कार्यकर्ताओं, समर्थकों के साथ विचार करके वे आगे की रणनीति तय करेंगे. आज उन्होंने अपना फैसला सुना दिया.

उन्होंने कहा कि वे पूर्वी जमशेदपुर के प्रचार में बताएंगे कि किन परिस्थितियों में ये कदम उठाना पड़ा. बदली परिस्थितियों में पश्चिम की सीट पर अब बीजेपी किसे मैदान में उतारती है, यह देखा जाना बाकी है.

उधर कांग्रेस ने पूर्व मंत्री बन्ना गुप्ता को मैदान में उतारा है. पश्चिम की सीट पर सरयू राय की मोर्चाबंदी बहुत कमजोर भी नहीं है. अगर उनके समर्थक इस घटनाक्रम को जिद और दिल पर ले लिए तो लड़ाई दिलचस्प होगी.

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हालांकि बात चुनावी नतीजे से इतर दूसरे रूप में और दूर तलक जााती दिखती है. बात बगावत की भी है. सीधे नेतृत्व और सत्ता शीर्ष पर बैठे चेहरे के खिलाफ, जाहिर है इस हाल में बाजी उन्होंने पलट दी, तो वे भारतीय जनता पार्टी की राजनीति में एक नया अध्याय भी जोड़ जाएंगे.

क्यों लग जाएगी आग

तफ्सील से समीकरणों और असर पर चर्चा से पहले पूछा जा सकता है कि क्यों घर के चिराग से आग लग सकती है घर को. कल से सरयू राय के समर्थन में जिस तरह से बीजेपी के कार्यकर्ता और समर्थकों का जुटान हो रहा है, वह जमशेदपुर के अलावा राज्य के दूसरे हिस्सों में चुनावी असर डाल सकता है.

हिन्दी दैनिक राष्ट्रीय खबर के संपादक और वरिष्ठ राजनीतिक विश्लेषक रजत कुमार गुप्ता कहते हैं, आग लग जाएगी नहीं आग लग गई है. जिस तेजी से राजनीतिक घटनाक्रम बदल रहे हैं, उससे यह तय हो चला है कि इस मुद्दे पर फैसला ही झारखंड की राजनीति का एक टर्निंग प्वाइंट साबित होने जा रहा है. सरयू राय को टिकट नहीं दिये जाने पर जमशेदपुर में बीजेपी के अंदर ही जोरदार तरीके से गोलबंदी भी हो रही है. सवाल भी उठ रहे कि रघुवर दास और उनके खेमे के लोगों ने इस मामले को इतना लटकाकर रखना चाहा कि धैर्य खोकर सरयू राय खुद कोई फैसला ले लें. 

रजत कुमार गुप्ता आगे कहते हैं कि बीजेपी में भी सरयू राय को चाहने वाले नेता, कार्यकर्ता हैं, इससे इंकार नहीं किया जा सकता. दोनों सीटों पर परिणाम क्या होगा, यह बताना अभी जल्दीबाजी हो सकती है, लेकिन सरयू राय उन सवालों को चुनाव में उठा सकते हैं जिन पर  उन्होंने तर्क, तथ्य और दस्तावेजों के साथ समय- समय पर मुख्यमंत्री और कुछ खास अफसरों को कठघरे में खड़ा किया है. कैबिनेट में बातें रखी है. 

इन बातों में दम है

परिस्थितयों पर गौर करें, तो बीजेपी के रणनीतिकार इससे भी इंकार नहीं कर सकते कि सरयू राय को चेहरा बनाकर पार्टी ने अपने नंबर बढ़ाये हैं. पूर्वी सिंहभूम सीट पर जातिगत समीकरणों की वजह से भी सरयू राय का यह फैसला भाजपा के लिए परेशानी का सबब बन सकती है. 

यह बात भाजपा के अंदर भी सर्वविदित है कि सरयू राय को भ्रष्टाचार के खिलाफ एक ऑइकन की तरह माना जाता है. खुद भाजपा ने भी समय समय पर उनके नाम का खूब प्रचार किया है. खास तौर पर लालू यादव और चारा घोटाला एवं मधु कोड़ा एवं खनन घोटाला में सरयू राय के कंधे पर बैठकर ही भाजपा ने चुनावी गाड़ी को आगे बढ़ाया है.

उछाल दिए हैं मुद्दे  

कल और आज सरयू राय मीडिया से जिस रूप में रूबरू थे, उस पर गौर करें, तो उन्होंने सहज और सरल ढंग से अपनी बातें कही. सरयू तैश में नहीं दिखे. और न ही जज्बातों के रौ में कोई अनगर्ल बयानबाजी की. सरयू राय को मालूम रहा होगा कि वे किस राह पर जा रहे हैं और इस राह में कील- कांटे क्या हो सकते हैं. साथ ही उनके हमसफर कौन लोग हो सकते हैं. सरयू राय के आवास पर समर्थकों और कार्यकर्ताओं के जुटान के भी मायने निकाले जा रहे हैं. जमशेदपुर के कई मंडल अध्यक्षों की नजर सरयू राय के इस फैसले पर टिकी है. 

दो सीटों पर चुनाव लड़ने के फैसले पर सरयू राय ने कहा है, ''जमशेदपुर पूर्वी का चुनाव वह वहां के लोगों के साथ मिलकर लड़ेंगे. जमशेदपुर पश्चिम में उनके कार्यकर्ता उनकी ओर से चुनाव लड़ेंगे. कार्यकर्ताओं ने उन्हें आश्वस्त किया है कि उन्हें जमशेदपुर पश्चिम में झांकने की भी जरूरत नहीं है. जमशेदपुर पूरब के लोगों ने उनसे कहा कि वे उन्हें वोट देंगे और चुनाव लड़ने के लिए नोट भी देंगे''.

सरयू राय ने यह भी कहा कि वह जमशेदपुर की 86 बस्ती के लोगों को मालिकाना हक दिलाने के लिए अब खुलकर लड़ाई लड़ेंगे. टेल्को में बार-बार होने वाली हड़ताल के खिलाफ अपनी आवाज बुलंद करेंगे. उन्होंने कहा कि देश के अन्य राज्यों में भी टेल्को की इकाइयां हैं, लेकिन सिर्फ जमशेदपुर में बार-बार ब्लॉक क्लोजर होता है. जाहिर है उन्होंने मुद्दे उछाल दिए हैं. दरअसल , 86 बस्ती को मालिकाना हक दिलाने की लड़ाई में ही रघुवर दास ने राजनीति की लंबी पारी खेली है. इस बार विपक्षी दलों ने भी इसे मुद्दा बनाया है, लेकिन जब सरयू बोलेंगे, तो बात कुछ और होगी. 

टिकट बंटवारे से उपजा अंसतोष

इस बार विधानसभा चुनाव में टिकट बंटवारे को लेकर बीजेपी में असंतोष साफ तौर पर उपजता नजर आता है. अब तक बीजेपी ने 11 विधायकों के टिकट काटे हैं. सिंदरी से बीजेपी के विधायक फूलचंद मंडल टिकट काटे जाने के बाद जेएमएम में शामिल हो गए हैं. छतरपुर से बीजेपी के विधायक राधाकृष्ण किशोर आजसू के टिकट पर लड़ रहे हैं. बोरियों के विधायक ताला मरांडी ने बीजेपी से राह अलग कर ली है. 

कई पूर्व विधायकों ने पार्टी छोड़ दी है. कई चुनाव में उतर गए हैं. इनमें बरही से उमाशंकर अकेला का भी नाम शामिल है. सरयू राय के तल्ख तेवर और फैसले से विपक्ष को भी दम मिला है. विपक्ष को लग रहा है कि अब वो खास तौर रघुवर दास को कठघरे में कर सकता है. प्रचार के दौरान सवाल पूछ सकता है. 
 
इधर विधायक शिवशंकर उरांव, गंगोत्री कुजूर, विमला प्रधान का टिकट कटने और बड़कुंअर गागराई को टिकट नहीं मिलने के मायने पार्टी में ही निकाले जाने लगे हैं. इन नेताओं के अलावा सरयू राय के भी ताल्लुकात पार्टी के कद्दावर नेता अर्जुन मुंडा से अच्छे रहे हैं. 

हालांकि अर्जुन मुंडा फिलहाल किसी विवादास्पद मुद्दों या टिकट बंटवारे पर कोई बयान देने से परहेज करते हैं. अलबत्ता कार्यकर्ताओं से जरूर कहते हैं कि जिन्हें भी टिकट मिला है, उनके समर्थन में एकजुट होकर काम करते रहें. 

लेकिन कड़वा सच यह भी है कि रघुवर दास और उनके खेमा को इसका अहसास है कि अर्जुन मुंडा पार्टी के निर्देश का अनुपालन करेंगे, जिम्मवारियां निभायेंगे, लेकिन खुलकर रघुवर दास का समर्थन नहीं करेंगे. 

कल ही बीजेपी के गोड्डा सांसद ने अपने फेसबुक वाल पर सरयू राय को लेकर जो टिप्पणी जाहिर है, वह भी सोशल साइट्स पर ट्रेंड कर रहा है. निशिकांत दूबे ने लिखा है, '' जानता हूं मैं एक शख्स को मैं भी 'मुनीर', गम से पत्थर हो गया, पर रोया नहीं''. 

लोकसभा चुनाव में कोडरमा से रवींद्र राय और गिरिडीह से रवींद्र पांडेय का टिकट कटने का दर्द इस विधानसभा चुनाव में असर डाले, इससे इंकार नहीं किया जा सकता.

हालांकि वे दोनों नेता पार्टी के साथ खड़े हैं, लेकिन विधानसभा चुनाव के लिए टिकट के बंटवारे में उनकी भी कुछ इच्छाएं थीं. उधर निरसा से गणेश मिश्र का टिकट कट जाना भी चर्चा में है. रामटहल चौधरी पहले से ही चोट खाये हुए हैं. संताल में ताला मरांडी अपनी चाबी का असर दिखाने के लिए अलग बेकरार हैं. 

चिंगारी और भी हैं

गठबंधन से अलग होकर आजसू ने भी बीजेपी के घर में चिंगारी छोड़ रखी है. आजसू लगातार बीजेपी के कब्जे वाली सीटों पर चुन- चुन कर उम्मीदवार उतार रही है. इससे वोटों का समीकरण प्रभावित होगा, इससे इंकार नहीं किया जा सकता.

आजसू के सबसे बड़े रणनीतिकार सुदेश महतो को बीजेपी के शीर्ष नेताओं से ज्यादा रघुवर दास के रुख और कामकाज से एतराज रहा है.

कल ही चक्रधपुर की चुनावी सभा में सुदेश महतो ने राज्य सरकार के काम और कथनी को लेकर सवाल खड़ा कर दिया है. आगे वे तरसक के और तीर भी तीर खाली कर सकते हैं. 

वैसे पूर्वी सीट पर रघुवर दास के समर्थकों, कार्यकर्ताओं की बड़ी तादाद रही है. इससे पहले के चुनावों में लोगों का भी जोरदार साथ मिलता रहा है. लिहाजा इस बार भी रघुवर दास और उनका खेमा चुनाव जीतने को लेकर इत्मिनान हो सकता है, लेकिन कड़वा सच यह भी है कि सरयू राय की वजह से उन्हें असहज स्थिति का सामना करना पड़ेगा. कल दोनों नेता नामांकन दाखिल करेंगे. जाहिर है नजरा बदला होगा. और हैरत करने वाला भी होगा. 

इस उलटफेर से एक खास बात रेखांकित होती है कि सरयू राय धुन के पक्के हैं और रघुबर दास जिद के और जनता धुन तथा जिद का फर्क खूब समझती है. सरयू राय राय चुनाव लड़ना चाहते हैं और रघुवर दास लड़वाने को तैयार नहीं है और जब पीठ दीवार से सटी हो तो आदमी पीछे की जगह आगे बढ़ने की कोशिश करता है यही कुछ हो रहा है.

बीजेपी के रणनीतिकार सलीके से इन हालात पर पर्दा डालने की कोशिशें करें, लेकिन गूंज पूरे चुनाव में सुनी जाएगी. 

और इस सच्चाई से वे मुंह नहीं मोड़ सकते. सरयू राय को भी जमशेदपुर की राजनीति के तार और समीकरण से वाकिफ हैं. सियासत और सत्ता में कई मौके आते हैं जब बेचैनियों और मुश्किलों की आहटें तेजी से सुनाई पड़ने लगती है.

गुंजाइश है कि रघुवर दास को ये आहटें सुनाई पड़ती होंगी. हालांकि फिलहाल उनकी कोई सीधी प्रतिक्रिया सामने नहीं आई है. 

वैसे रघुवर दास को पांच साल के शासन और लोकसभा चुनाव के नतीजे और अपनी सीट पर लगातार पांच बार की जीत का भरोसा है, लेकिन लोकसभा चुनाव के फिजां से इस चुनाव का फिंजा बदला- बदला सा है. मुद्दे बदले हैं. पार्टी के अंदरूनी हालात बदले हैं.

इन सबके बीच परखा यह भी जाना है कि सरयू राय इस चिराग को सात दिसंबर के बाद और कितना सुलगा सकते हैं. 


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