क्या विपक्ष के एजेंडा में शामिल होगा ‘भुखमरी का दाग और रोजगार, कुपोषण का दर्द’?

क्या विपक्ष के एजेंडा में शामिल होगा ‘भुखमरी का दाग और रोजगार, कुपोषण का दर्द’?
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सिराज दत्ता ,   Jan 29, 2019

पिछले दो वर्षों में झारखंड में कम-से-कम 19 लोगों की भूख से कथित मौत हुई है. इनमें से 9 आदिवासी, 5 दलित और 5 पिछड़े समुदाय के थे. इन सभी के परिवारों के लिए पर्याप्त भोजन व पोषण का अभाव सामान्य बात थी.

कई परिवारों में तो महीनों से दाल तक नहीं बनी थी. मरने के दिन घर में न तो अनाज था और न ही पैसे. परिवार के सदस्यों के पास आजीविका और रोज़गार के पर्याप्त साधन भी नहीं थे.

दुमका के कोलेश्वर सोरेन ने तो मरने के एक महीने पहले केवल 250 रु और 1.5 किलो चावल के लिए अपने पलाश के पेड़ तक को बेच दिया था.

हालांकि राज्य सरकार या केंद्र सरकार ने नहीं माना है कि झारखंड में किसी व्यक्ति की भूख से मौत हुई है. इसे लेकर अलग ही विरोध- बहस जारी है. 

ये मौतें झारखंड में भुखमरी की स्थिति के सूचक मात्र हैं. राज्य में बड़ी आबादी को भूख का सामना करना पड़ता है. पांच वर्ष से कम आयु के 40 प्रतिशत से भी अधिक बच्चें कुपोषित हैं. हाल के एक सर्वेक्षण में यह पता चला है कि परहैया जनजाति की लगभग आधी आबादी को भूख से जूझना पड़ता है. 

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खाद्य असुरक्षा की स्थिति में जी रहे परिवारों के लिए सामाजिक-आर्थिक अधिकार जैसे राशन, मध्याह्न भोजन, आंगनवाड़ी सेवाएं, पेंशन, मनरेगा में काम आदि जीवनरेखा समान हैं. 

भोजन के अधिकार विषय पर काम कर रहे फैक्ट फाइंड की टीम ने ग्रास रूट पर जाकर जो तथ्य जुटाए उससे एक बात स्पष्ट तौर पर रेखांकित होती है कि मौत के शिकार हुए लोग और उनके परिवार विभिन्न कारणों से जन वितरण प्रणाली से मिलने वाले अनाज से वंचित थें.

कुछ एकल महिलाएं व वृद्ध सामाजिक सुरक्षा पेंशन से वंचित थें. कई महीनों से मनरेगा में काम भी नहीं मिला था. साथ ही, इन तक सरकारी स्वास्थ्य सेवाएं की पहुंच न के बराबर थी. 

आधार का दर्द

इन मौतों ने उजागर कर दिया है कि सरकार की जन कल्याणकारी योजनाएं लगातार कमजोर होती जा रही हैं. राज्य में 2015 में राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा कानून लागू होने के बावज़ूद भी कई वंचित परिवारों का राशन कार्ड नहीं बना है. 

आधार से न जुड़ने के कारण पिछले तीन वर्षों में बड़ी तादाद में राशन कार्डों को रद्द भी किया गया है. जन वितरण प्रणाली में आधार-आधारित बायोमेट्रिक सत्यापन की अनिवार्यता के कारण हर महीने बड़ी तादाद में कार्डधारी राशन नहीं ले पाते. इन परिस्थितियों में अब कार्डधारियों के लिए अनाज लेने के लिए राशन दुकान के चक्कर लगाना आम बात हो गई हैं.

आदिम जनजाति

सर्वोच्च न्यायालय के आदेशों के अनुसार हर आदिम जनजाति परिवार को अंत्योदय राशन कार्ड मुहैया कराना है. लेकिन राज्य के अनेक आदिम जनजाति परिवारों के इस अधिकार का हनन हो रहा है. 

सरकार अनाज की कालाबजारी के लिए भ्रष्ट डीलरों एवं जिम्मेदार अधिकारियों के खिलाफ़ मुक्कमल कार्रवाई करती, तो यह नौबत नहीं आती. लेकिन इस राज्य में गरीब जनता को ही राशन से वंचित किया जा रहा है. 

बच्चों के पोषण के लिए मध्याह्न भोजन और आंगनवाड़ी कार्यक्रम अत्यंत महत्त्वपूर्ण हैं, लेकिन सरकार की ओर से इन्हें सुदृढ़ करने के प्रयास नाकाफी दिखते हैं. 

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आंगनबाड़ी

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प्रदेश में बीजेपी की सरकार ने मध्याह्न भोजन में बच्चों को मिलने वाले अंडों की संख्या बढ़ाने के बजाय  कम कर दिया है. साथ ही, जगह- जगह से ये शिकायतें मिलती रही हैं कि आंगनवाड़ियों में बच्चों को खराब अंडे दिए जा रहे हैं. सैंकड़ों आंगनबाड़ी केंद्र समय पर नहीं खुलते. 

सैकड़ों आंगनवाड़ियों में न समय पर पर्याप्त पोषण मिल रहा है और न ही बच्चों को शिक्षा. प्राथमिक स्वास्थ सेवाओं को सुदृढ़ करने के बजाय निजी अस्पतालों और बिमा कंपनियों को कथित लाभ पहुंचाने के लिए आयुष्मान योजना पर जोर दिया जा रहा है. पिछले छह महीने तक आंगनबाड़ियों में पंजरी ( पैकेट बंद पोषाहार) उपलब्ध नहीं थे. 

झारखंड में गांवों- कस्बों में स्वास्थ्य सेवाएं दुरूस्त करने के लिए जो भी कदम उठाए जाते रहे हैं, वह जमीनी स्तर पर असरदार नहीं होते. 

राज्य में वृद्ध, विधवा व विकलांग की बड़ी तादाद है, जो सामाजिक सुरक्षा पेंशन योजनाओं के दायरे से बाहर हैं. पेंशन योजना या बैंक खाते से आधार का जुड़ाव न होने के कारण पिछले तीन वर्षों में सरकार ने व्यापक पैमाने पर हजारों पेंशनधारियों को पेंशन योजना से हटा दिया है.

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मनरेगा

औपचारिक रोज़गार के साधनों की कमी में झारखंड के मज़दूरों के लिए मनरेगा अत्यंत महत्त्वपूर्ण सहारा है. लेकिन आजकल गावों में मनरेगा की कच्ची योजनाएं न के बराबर चलती हैं. झारखंड में पिछले चार सालों में आदिवासी और दलित परिवारों का कुल मनरेगा मज़दूरी में हिस्सा 50 फीसदी  से गिर कर 38 फीसदी हो गया. 

राज्य में फ़र्ज़ी और डुप्लीकेट जॉब कार्ड रद्द करने के नाम पर लाखों मज़दूर परिवारों को उनके काम के कानूनी अधिकार से ही वंचित कर दिया गया है. 

एक तरफ सरकार जीरो टॉलरेंस की बात कहते हिए भ्रष्टाचार मुक्त शासन देने का दंभर भर रही है वहीं राजनीतिक संरक्षण में ठेकेदारों एवं स्थानीय प्रशासन की मिलीभगत से करोड़ों की मनरेगा राशि की फ़र्ज़ी निकासी हो रही है. झारखंड की नरेगा मज़दूरी दर देश में सबसे कम है और राज्य के न्यूनतम दर से 67 रु कम है. 

केंद्र और राज्य की भाजपा सरकारें लगातार देश और राज्य की आर्थिक वृद्धि का दावा करती रही हैं, लेकिन लोगों के पर्याप्त भोजन, पेंशन, पोषण, रोज़गार और स्वास्थ्य सेवाओं के लिए उनके पास फंड कम पड़ रहे हैं. 

लगता नहीं है कि  इन योजनाओं को सही रूप से कार्यान्वित करने की सरकार के पास स्पष्ट मंशा है. जबकि कॉरपोरेट घरानों को मजबूत बनाने की प्रत्यक्ष- परोक्ष कोशिशें जारी है. यही वजहें है कि बड़े पैमाने पर लोग अपने मौलिक सामाजिक-आर्थिक अधिकारों से वंचित हो रहे हैं. 

झारखंड में जो हालात हैं उनमें एक सवाल मौजूं है कि क्या विपक्ष चुनावों में भुखमरी, रोजगार और कुपोषण को मजबूत एजेंडा के तौर पर शामिल करेगा.  

(लेखक सामाजिक कार्यकर्ता हैं और भोजन के अधिकार समेत कई जन विषयों पर काम करते रहे है)


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