वादे पर सरकार चुप क्यों, घोषणा के बाद भी पत्थगलड़ी केस वापस नहीं हुएः झारखंड जनाधिकार महासभा

वादे पर सरकार चुप क्यों, घोषणा के बाद भी पत्थगलड़ी केस वापस नहीं हुएः झारखंड जनाधिकार महासभा
Photo- JJM
पीबी ब्यूरो ,   Feb 24, 2020

झारखंड जनाधिकार महासभा ने कहा है कि स्थानीय मुद्दों और मांगों पर हेमंत सोरेन के नेतृत्व वाले गठबंधन को जनादेश मिला, लेकिन इन दलों ने जनता के बीच किए वादे और जनता के अहम सवालों के हल करने की दिशा में अभी तक कार्रवाई शुरू नहीं की है.

अलबत्ता पत्थलगड़ी के केस वापस लेने के फैसले के दो महीने बाद भी मामले जहां के तहां हैं. इसके साथ ही सीएए, एनआरसी तथा एनपीआर पर झारखंड सरकार की चुप्पी बेहद निराशाजनक है. 

झारखंड जनाधिकार महासभा, विभिन्न जन संगठनों और सामाजिक कार्यकर्ताओं का मंच है, जो जन मुद्दों तथा जमीनी सवालों पर नजर रखने के साथ उन पर काम करती है. 

आज जनाधिकार महासभा से जुड़े मशहूर अर्थशास्त्री ज्याँ द्रेज़ के अलावा भारत भूषण चौधरी, एलीना होरो, दामोदर तुरी और पल्लवी प्रतिभा ने साझा तौर पर प्रेस कांफ्रेस कर कई सवालों पर सरकार का ध्यान दिलाया और कहा अब सरकार चुनावी वादे और जन मांगों पर सीधी कार्रवाई करे. 

महासभा ने तथ्यों के आधार पर दावा किया है कि रघुवर दास के नेतृत्व वाली सरकार को जन अधिकारों पर हमले और जन विरोधी नीतियों की वजह से ही चुनाव में लोगों ने खारिज किया है. और जेएमएम- कांग्रेस के वादे पर भरोसा जताया है. लेकिन उन वादे से सरकार मुंह मोड़ रही है. 

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पत्थगलड़ी के केस 

जनाधिकार महासभा ने कहा है कि सरकार गठन के तुरंत बाद, सभी पत्थलगड़ी मामलों को वापस लेने का निर्णय सराहनीय था. लेकिन, फैसले के दो महीने बाद भी, सभी मामले जस-के-तस हैं. पत्थलगड़ी गाँवों के आदिवासियों में भय और अनिश्चितता का माहौल कायम है, क्योंकि पुलिस और स्थानीय प्रशासन अभी तक इस निर्णय पर कोई कार्रवाई नहीं कर रही है. इसके अलावा, इन गावों में बड़े पैमाने पर मानवाधिकारों के उल्लंघन और विद्यालयों में पुलिस कैंप की स्थापना पर सरकार चुप्पी साधी हुई है. 

भुखमरी और कुपोषण

महासभा ने कहा है कि राज्य में व्यापक भुखमरी और कुपोषण को कम करना सरकार की मुख्य प्राथमिकताओं में होना चाहिए. लेकिन यह दिखाई नहीं देता. सरकार को इसके लिए एक पांच-वर्षीय समग्र योजना तैयार करनी चाहिए. 

आधार-आधारित बायोमेट्रिक प्रमाणीकरण व्यवस्था के कारण लोगों के अधिकारों के उल्लंघन और परेशानियों का मुद्दा कांग्रेस और झामुमो ने लगातार अपने चुनावी अभियान में उठाया था.

लेकिन अब वे बायोमीट्रिक प्रमाणीकरण को जन वितरण प्रणाली और अन्य कल्याणकारी योजनाओं से हटाने की आवश्यकता पर चुप हैं. 

कुपोषण को कम करने के लिए, सरकार को तुरंत मध्याह्न भोजन और आंगनवाड़ियों में मिलने वाले अंडों की संख्या बढ़ानी चाहिए. साथ ही, उनके द्वारा नरेगा में मजदूरी दर बढ़ाने के किए गए वादे को पूर्ण करना चाहिए और राज्य में नरेगा को पुनर्जीवित करना चाहिए.

सीएए एनआरसी पर चुप्पी

महासभा ने कहा है कि सीएए, एनआरसी और एनपीआर को रद्द करने पर को रद्द करने पर झारखंड सरकार की चुप्पी बेहद निराशाजनक है.

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ऐसा प्रतीत हो रहा है कि सरकार 1 अप्रैल 2020 से एनपीआर सर्वेक्षण शुरू करने के लिए तैयार है. ऐसी सरकार जो गरीबों और वंचितों का प्रतिनिधित्व करने का दावा करती है, वो झारखंडियों को एनआरसी और एनपीआर से होने वाले खतरे से बेखबर नहीं रह सकती है.

स्थानीयता और मॉब लिंचिंग

महासभा ने कहा है कि कई अन्य मुद्दे भी हैं जिनपर सरकार को तुरंत कार्रवाई करने की ज़रूरत है. राज्य की वर्तमान स्थानीयता नीति को रद्द कर झारखंडियों के हित और मांग अनुरूप नीति बनाने पर अब तक पहल शुरू नहीं की गई है. 

पांचवीं अनुसूची के प्रावधानों और पेसा क़ानून को लागू करने पर भी सरकार चुप है. जबकि झामुमो और कांग्रेस ने अपने घोषणापत्र में पेसा कानून के पूर्ण कार्यान्वयन का वादा किया था. 

सरकार को राज्य में बढ़ती सांप्रदायिकता और भीड़ द्वारा हिंसा को भी रोकने की आवश्यकता है. महासभा उम्मीद करती है कि सरकार माँब लिंचिंग के विरुद्ध कानून बनाएगी, जैसा कि घोषणा पत्र में कहा गया था.

कांग्रेस ने अडानी पॉवर प्लांट परियोजना (गोड्डा), ईचा-खरकई बांध (पश्चिम सिंहभूम) और मंडल बांध (पलामू) जैसी परियोजनाओं को रद्द करने का भी वादा किया है. लेकिन सत्ता में आने के बाद दोनों पार्टियाँ व सरकार इस मुद्दे पर चुप है.

महासभा ने जोर देकर कहा है कि सरकार जन मुद्दों पर स्पष्ट प्रतिबद्धता दिखाए. साथ ही प्रतिबद्धता बजट और आगामी विधानसभा सत्र में झलके, जिससे जनता का विश्वास सरकार पर जमे. 


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