देवों के देव शिव का दायरा इतना व्यापक और व्यक्तित्व विराट क्यों?

देवों के देव शिव का दायरा इतना व्यापक और व्यक्तित्व विराट क्यों?
योगेश किसलय ,   Jul 07, 2020

आखिर शिव में ऐसा क्या है? जो उत्तर में कैलास से लेकर दक्षिण में रामेश्वरम् तक वे एक जैसे पूजे जाते हैं. उनके व्यक्तित्व में कौन सा चुंबक है जिस कारण समाज के भद्रलोक से लेकर शोषित, वंचित, भिखारी तक उन्हें अपना मानते हैं. वे क्यों सर्वहारा के देवता हैं. उनका दायरा इतना व्यापक क्यों है?

शिव सत्य के हैं. सुंदर हैं. सर्वव्यापी हैं. सर्वग्राह्य हैं. आदि और अनन्त हैं. सर्वहारा के हैं. सर्वसम्पन्न के हैं. ईश्वर का यही रूप है जो राम , कृष्ण , बुद्ध सभी अवतारों के लिए पूज्य हैं.

राम का व्यक्तित्व मर्यादित है. कृष्ण का उन्मुक्त और शिव असीमित व्यक्तित्व के स्वामी. वे आदि हैं और अंत भी. शायद इसीलिए बाकी सब देव हैं. केवल शिव महादेव. वे उत्सव प्रिय हैं. शोक, अवसाद और अभाव में भी उत्सव मनाने की उनके पास कला है. वे उस समाज में भरोसा करते हैं,जो नाच-गा सकता हो.यह शैव परंपरा है.

जर्मन दार्शनिक फ्रेडरिक नीत्शे कहते हैं ‘उदास परंपरा बीमार समाज बनाती है.’ शिव का नृत्य श्मशान में भी होता है. श्मशान में उत्सव मनानेवाले वे अकेले देवता हैं. लोक गायन में भी वे उत्सव मनाते दिखते हैं. 'खेले मसाने में होरी दिगंबर खेले मसाने में होरी. भूत, पिशाच, बटोरी दिगंबर खेले मसाने में होरी.’

विदेशों में भी गहरी आस्था

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सिर्फ देश में ही नहीं विदेश में भी शिव की गहरी आस्था है. हिप्पी संस्कृति साठवें दशक में अमेरिका से भारत आई. हिप्पी आंदोलन की नींव यूनानियों की प्रति संस्कृति आंदोलन में देखी जा सकती है. पर हिप्पियों के आदि देवता शिव तो हमारे यहाँ पहले से ही मौजूद थे या यूं कहे शिव आदि हिप्पी थे.

अधनंगे, मतवाले, नाचते-गाते, नशा करते भगवान् शंकर. इन्हें भंगड़, भिक्षुक, भोला भंडारी भी कहते हैं. आम आदमी के देवता भूखो-नंगों के प्रतीक. वे हर वक्त समाज की सामाजिक बंदिशों से आजाद होने, खुद की राह बनाने और जीवन के नए अर्थ खोजने की चाह में रहते॒ हैं.

दयासिंधु भी शिव ही हैं

यही मस्तमौला ‘हिप्पीपन’ उनके विवाह में अड़चन था. कोई भी पिता किसी भूखे, नंगे, मतवाले से बेटी ब्याहने की इजाजत कैसे देगा. शिव की बारात में नंग-धड़ंग, चीखते, चिल्लाते, पागल, भूत-प्रेत, मतवाले सब थे. लोग बारात देख भागने लगे. शिव की बारात ही लोक में उनकी व्याप्ति की मिसाल है.

विपरीत ध्रुवों और विषम परिस्थितियों से अद्भुत सामंजस्य बिठानेवाला उनसे बड़ा कोई दूसरा भगवान् नहीं है. मसलन, वे अर्धनारीश्वर होकर भी काम पर विजेता हैं. गृहस्थ होकर भी परम विरक्त हैं. नीलकंठ होकर भी विष से अलिप्त हैं. उग्र होते हैं तो तांडव, नहीं तो सौम्यता से भरे भोला भंडारी. परम क्रोधी पर दयासिंधु भी शिव ही हैं.

विषधर नाग और शीतल चंद्रमा दोनों उनके आभूषण हैं. उनके पास चंद्रमा का अमृत है और सागर का विष भी. साँप, सिंह, मोर, बैल, सब आपस का बैर-भाव भुला समभाव से उनके सामने है. वे समाजवादी व्यवस्था के पोषक. वे सिर्फ संहारक नहीं कल्याणकारी, मंगलकर्ता भी हैं. यानी शिव विलक्षण समन्वयक॒ हैं. 

राम और रावण दोनों उपासक

शिव गुट निरपेक्ष हैं. सुर और असुर दोनों का उनमें विश्वास है. राम और रावण दोनों उनके उपासक हैं. दोनों गुटों पर उनकी समान कृपा है. आपस में युद्ध से पहले दोनों पक्ष उन्हीं को पूजते हैं. लोक कल्याण के लिए वे हलाहल पीते हैं.

वे डमरू बजाएँ तो प्रलय होता है, प्रलयंकारी इसी डमरू से संस्कृत व्याकरण के चौदह सूत्र भी निकलते हैं. इन्हीं माहेश्वर सूत्रों से दुनिया की कई दूसरी भाषाओं का जन्म हुआ.

आज पर्यावरण बचाने की चिंता विश्वव्यापी है. शिव पहले पर्यावरण प्रेमी हैं, पशुपति हैं. निरीह पशुओं के रक्षक हैं. आर्य जब जंगल काट बस्तियाँ बसा रहे थे. खेती के लिए जमीन तैयार कर रहे थे. गाय को दूध के लिए प्रयोग में ला रहे थे पर बछड़े का मांस खा रहे थे. तब शिव ने बूढ़े बैल नंदी को वाहन बनाया. सांड़ को अभयदान दिया. जंगल कटने से बेदखल साँपों को आश्रय दिया.

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केवल भभूत लगाते हैं

कोई उपेक्षितों को गले नहीं लगाता, महादेव ने उन्हें गले लगाया. श्मशान, मरघट में कोई नहीं रुकता. शिव ने वहाँ अपना ठिकाना बनाया. जिस कैलास पर ठहरना कठिन है. जहाँ कोई वनस्पति नहीं, प्राणवायु नहीं, वहाँ उन्होंने धूनी लगाई. दूसरे सारे भगवान् अपने शरीर के जतन के लिए न जाने क्या-क्या द्रव्य लगाते हैं. शिव केवल भभूत का इस्तेमाल करते है. 

उनमें रत्ती भर लोक दिखावा नहीं है. शिव उसी रूप में विवाह के लिए जाते हैं, जिसमें वे हमेशा रहते हैं. वे साकार हैं, निराकार भी. इस इससे अलग लोहिया उन्हे गंगा की धारा के लिए रास्ता बनानेवाला अद्धितीय इंजीनियर मानते थे.

वे न्यायप्रिय हैं

शिव न्यायप्रिय हैं. मर्यादा तोड़ने पर दंड देते हैं. काम बेकाबू हुआ तो उन्होने उसे भस्म किया. अगर किसी ने अति की तो उनके पास तीसरी आँख भी है.

दरअसल तीसरी आँख सिर्फ ‘मिथ’ नहीं है. आधुनिक शरीर शास्त्र भी मानता है कि हमारी आँख की दोनों भृकुटियों के बीच एक ग्रंथि है और वह शरीर का सबसे संवेदनशील हिस्सा है. साथ ही रहस्यपूर्ण भी. इसे ‘पीनियल ग्रंथि’ कहते हैं. 

यह हमेशा सक्रिय नहीं रहती पर इसमें संवेदना ग्रहण करने की अद्भुत ताकत है. इसे ही शिव का तीसरा नेत्र कहते हैं. उसके खुलने से प्रलय होगा. ऐसी अनंत काल से मान्यता है.

शिव का व्यक्तित्व विशाल है. वे काल से परे महाकाल है. सिर्फ भक्तों के नहीं देवताओं के भी संकटमोचक हैं. उनके ‘ट्रबल शूटर’ हैं. शिव का पक्ष सत्य का पक्ष है. उनके निर्णय लोकमंगल के हित में होते हैं.

जीवन के परम रहस्य को जानने के लिए शिव के इन रूपों को समझना जरूरी होगा, क्योंकि शिव उस आम आदमी की पहुँच में हैं, जिसके पास मात्र एक लोटा जल है. इसीलिए उत्तर में कैलास से लेकर दक्षिण में रामेश्वरम् तक उनकी व्याप्ति और श्रद्धा एक सी है. 

(लेखक वरिष्ठ पत्रकार है. समसामयिक विषयों के अलावा समाज, साहित्य पर पैनी नजर रखते हैं) 


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