झारखंड बीजेपी में इतना सन्नाटा क्यों है?

झारखंड बीजेपी में इतना सन्नाटा क्यों है?
Publicbol (File Photo)
चित्रांश ,   Jan 02, 2020

अबकी बार 65 पार, नारा के साथ विधानसभा चुनाव में पूरी ताकत झोंकने वाली झारखंड बीजेपी में फिलहाल हलचल गुम है. चुनाव के नतीजे आए दस दिन हुए, पर प्रदेश या केंद्रीय स्तर पर कोई बड़ी बैठक नहीं हो सकी है. अलबत्ता चुने विधायक एक साथ नहीं बैठ सके हैं.  

जाहिर है चुनाव में करारी हार के बाद सबकी नजर इस ओर लगी है कि आगे बीजेपी की रणनीति क्या होगी. 

साथ ही नजरें टिकी हैं कि बीजेपी में विधायक दल का नेता कौन होगा और कौन होगा नया प्रदेश अध्यक्ष.

दरअसल, 23 दिसंबर को नतीजे आने के ठीक दो दिन बाद 25 दिसंबर को लक्ष्मण गिलुआ ने प्रदेश अध्यक्ष के पद से इस्तीफा दे दिया है. चुनाव नतीजे आने के बाद गिलुआ भी नेतृत्व के निर्देश के इंतजार में है. 

हालांकि बताया जा रहा है उनका इस्तीफा फिलहाल स्वीकार नहीं हुआ है. कमेटी काम कर रही है. 

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इस बीच नया प्रदेश अध्यक्ष बनने के लिए पार्टी में आधे दर्जन से अधिक नेताओं के नाम उछल रहे हैं. लॉबिंग भी जारी है.

लेकिन विधानसभा चुनाव के नतीजे को देखते हुए अहम जिम्मेदारी देने से पहले शीर्ष नेतृत्व हर पहलु और समीकरण को परख लेना चाहता है. 

उधर बीजेपी के तमाम दिग्गज और नेतृत्व संभालने वाले सीएए को लेकर मोर्चा खोल रहे हैं. कार्यक्रमों पर गौर करने से यह लगता है कि झारखंड का यह मामला फिलहाल पीछे रखा गया है. 

हालांकि साल के एक पहले इंटरव्यू में पार्टी के अध्यक्ष अमित शाह ने कहा है कि झारखंड में हार को लेकर आत्मचिंतन करेंगे. 

वैसे चुनाव नतीजे आने के बाद प्रारंभिक रिपोर्ट नेतृत्व तक पहुंच गई है. संगठन महामंत्री धर्मपाल सिंह ने कई शीर्ष नेताओं को मौजूदा स्थिति की जानकारी दी है. चुनाव प्रभारी पहले से आलाकमान के सीधे संपर्क में रहे हैं.  

इस बीच पार्टी में रघुवर दास की भूमिका क्या होगी, इसे भी देखा जाना है. रघुवर दास पहले प्रदेश अध्यक्ष रह चुके हैं.

बीते 28 दिसबंर को रघुवर दास ने पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह और कार्यकारी अध्यक्ष जेपी नड्डा से दिल्ली में मुलाकात की थी. हालांकि मुलाकात और बातचीत का ब्योरा बाहर नहीं आया है. 

संकेत इसके भी हैं कि हार का ठीकरा रघुवर दास पर ज्यादा फूट सकता है.

पार्टी के एक वरिष्ठ पदाधिकारी नाम नहीं जाहिर करने के साथ कहते हैं, सरकार और संगठन में सबसे ज्यादा रघुवर दास हावी रहे. जैसा चाहा वैसा किया, टिकट बंटवारे में ही उनकी चली, तो हार की जिम्मेदारी उनकी ही बनती है. नेतृत्व को भी इसका अहसास है और वो इस मामले की अनदेखी नहीं कर सकता. 

लेकिन इसके इतर भी कारण तलाशे जाएंगे. हार की और वजहें भी हो सकती है. और उसकी पड़ताल विचार मंथन में संभव है. 

अंदरखाने इसकी भी चर्चा है कि इस बार बात निकलेगी, तो दूर तलक जाएगी. दरअसल, नेतृत्व झारखंड की हार पर बेहद गंभीर है.

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इन सबके बीच नतीजे आने के दस दिनों बाद तक पार्टी के नवनिर्वाचित विधायकों की इकट्ठे और आधिकारिक तौर पर बैठक नहीं हो सकी है. जबकि छह से आठ जनवरी तक विधानसभा का सत्र आहूत है.

इसी सत्र में हेमंत सोरेन की सरकार विश्वासमत हासिल करेगी. और सात जनवरी को विधानसभा अध्यक्ष की नियुक्ति होगी.

इस बीच रघुवर दास इन बातों पर जोर देते रहे हैं कि उनके खिलाफ दुष्प्रचार किया गया. लेकिन इतना कहने से वे बच नहीं सकते.

जाहिर है कल तक जिस झारखंड को लेकर नेतृत्व गुमान में था, उसे संभालने की चुनौती एकबारगी आन पड़ी है.

इन हालात में झारखंड बीजेपी का नेतृत्व कोई करे, उसे संगठन को संभालने के साथ विपक्ष की मजबूत भूमिका में आने और जेएमएम की ताकत को रोकने की चुनौती का सामना एक साथ करना पड़ेगा. और ये काम बहुत आसान नहीं हैं.  

लक्ष्मण गिलुआ का इस्तीफा

लक्ष्मण गिलुआ चक्रधरपुर सीट पर विधानसभा चुनाव लड़े थे. जेएमएम से हार गए. इससे पहले पार्टी ने उन्हें चाईबासा से लोकसभा का चुनाव लड़ाया था. तब वे कांग्रेस से चुनाव हार गए थे.

बीजेपी की करारी हार के बीच रघुवर दास को भी जमशेदपुर पूर्वी सीट पर हार का सामना करना पड़ा है. बीजेपी में ही बगावत की राह पर उतरे सरयू राय ने रघुवर दास को हराया है.

चुनाव के वक्त और नतीजे आने के बाद से सरयू राय रघुवर दास पर निशाना साधते रहे हैं. चुनाव में टिकट बंटवारे से उपजा अंसतोष अब सतही तौर पर भी छलकता दिखाई पड़ने लगा है. 

लक्ष्मण गिलुआ को रघुवर दास का बैकिंग सबसे ज्यादा था. लेकिन चुनाव में दोनों हारे. इससे भी संगठन में खामोशी है. 

आदिवासी इलाकों में झटका

बीजेपी को सबसे ज्यादा झटका आदिवासी इलाकों में लगा है. अनुसूचित जनजाति के लिए सुरक्षित 28 में से सिर्फ दो सीटों पर बीजेपी को जीत मिली है. 25 सीटों पर जेएमएम- कांग्रेस और एक सीट पर जेवीएम को जीत मिली है.

चुनाव से पहले बीजेपी ने आदिवासियों की 22 सीटें जीतने का लक्ष्य हासिल किया था. 

साथ ही बीजेपी इस बार सिर्फ 25 सीटों पर चुनाव जीती है. जबकि सत्ता की बागडोर संभालने वाले जेएमएम 30 सीटों पर चुनाव जीत कर सबसे बड़े दल के तौर पर उभरा है.

हालांकि बीजेपी को जेएमएम से ज्यादा वोट मिले हैं. बीजेपी को विधानसभा चुनाव में सबसे ज्यादा 50 लाख 22 हजार हजार 374 वोट (33.4 प्रतिशत) मिले हैं.

2014 के चुनाव में बीजेपी ने 37 सीटों पर जीत हासिल की थी. जबकि 2019 में हुए लोकसभा चुनाव में बीजेपी और आजसू ने 12 सीटों पर जीत हासिल कर तथा 83 लाख वोटों का रिकॉर्ड खड़ा कर विपक्ष के सकते में डाल रखा था. 

आगे विधानसभा चुनाव के नतीजे को लेकर बीजेपी के सांसदों की भूमिका पर सवाल खड़े हो सकते हैं. कई संसदीय क्षेत्र में एक भी विधानसभा सीट पर बीजेपी को जीत नहीं मिली है. इससे पहले लोकसभा चुनाव के वक्त पार्टी के विधायकों पर अपने क्षेत्र में लीड लेने का दबाव था और उन्हें खुले तौर पर टास्क सौंपे गए थे. 

गुंजाइश पूरी है कि अब विधानसभा चुनाव में हारने-जीतने वाले सांसदों की भूमिका पर सवाल खड़े कर सकते हैं. साथ ही नेतृत्व भी जवाब-तलब कर सकता है. 

जाहिर है चुनाव नतीजे के बाद सांसदों की नजर भी नेतृत्व पर है.

वैसे कई सांसद इस हाल के लिए अपनों के बागी बनने और बाहर से आए‌ चेहरे को ज्यादा तवज्जो देने को हद तक जिम्मेदार बता रहे हैं. गोड्डा से पार्टी के सांसद निशिकांत दूबे ने पिछले दिनों अपने फेसबुक वाल पर कुछ इसी तरह की टिप्पणी की थी. 

गुरुवार, 2 जनवरी को रांची स्थित अपने आवास पर अर्जुन मुंडा से प्रेस से मुखातिब थे. चुनाव में पार्टी की हार से जुड़े एक सवाल के जवाब में उन्होंने कहा कि इसके कई कारण हो सकते हैं. संगठन के स्तर पर इसकी चर्चा व समीक्षा होगी. 

सत्ता बचाने में नाकाम

नीचे से शीर्ष स्तर कसक जरूर है कि बीजेपी के हाथ से सत्ता सरक गई और बड़ी हार का भी सामना करना पड़ा. जबकि लोकसभा चुनाव के नतीजे आने के बाद से ही बीजेपी ने विधानसभा चुनाव की तैयारियां शुरू कर दी थी और चुनाव में पार्टी ने तमाम दिग्गजों को उतारा था.

पार्टी के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष ओम प्रकाश माथुर चुनाव प्रभारी तथा बिहार सरकार में मंत्री बीजेपी के वरिष्ठ नेता नंदकिशोर यादव सह प्रभारी की कमान संभाल रहे थे.

पार्टी के कार्यकारी अध्यक्ष जेपी नड्डा भी झारखंड में ही सबसे ज्यादा वक्त देते रहे. चुनाव के दौरान सदस्यता अभियान के प्रभारी कई दफा आए, 

बीजेपी में सबसे बड़े और करिश्माई नेता नरेंद्र मोदी ने झारखंड में दस चुनावी रैलियां की. उधर बीजेपी के बांबिंग प्रचार से विपक्ष हैरान-परेशान रहा.

जबकि चुनावी नतीजे उलटफेर वाला साबित हुआ. नतीजे ने बीजेपी को झकझोर कर रख दिया है. और जेएमएम नेता हेमंत सोरेन सबसे बड़े बाजीगर बनकर उभरे हैं. 

विधायक दल का नेता 

इस बीच विधायक दल की बैठक के लिेए प्रदेश के नेताओं का केंद्रीय नेतृत्व के निर्देश का इंतजार है. विधायक दल का नेता चुने जाने के लिए केंद्रीय स्तर पर किसी जिम्मेदार नेता को भी भेजा जा सकता है.

पार्टी के वरिष्ठ विधायक नीलकंठ सिंह मुंडा और सीपी सिंह का नाम विधायक दल के नेता के रूप में आगे है. दोनों के पास लंबा अनुभव है और बीजेपी के पुराने चेहरे भी हैं.

पार्टी के प्रदेश महामंत्री दीपक प्रकाश कहते हैं, पार्टी में सन्नाटा नहीं है. गतिविधियां जारी हैं. नेतृत्व के निर्देश का इंतजार है. समय पर विधायक दल का नेता भी चुना जाएगा. साथ ही चुनाव के नतीजों को लेकर विचार मंथन किया जाएगा. 

वरिष्ठ पत्रकार और राजनीतिक विश्लेषक रजत कुमार गुप्ता कहते हैं कि बीजेपी को कतई उम्मीद नहीं थी कि झारखंड में इस परिणाम का सामना करना पड़ेगा. 

रघुवर दास भले कह रहे हों कि दुष्प्रचार हावी हुआ, लेकिन इससे वे जिम्मेदारियों से नहीं बच सकते. चुनाव के नतीजे बताते हैं कि स्थानीय मुद्दे, विषयो को लेकर शासन-प्रशासन की भूमिका और रवैये पर लोगों में नाराजगी थी. जाहिर है अंदर ही अंदर बीजेपी के खिलाफ हवाएं चल रही थी.

बीजेपी में टिकट वितरण से उपजे असंतोष और गठबंधन नहीं होने से भी पार्टी को नुकसान का सामना करना पड़ा है. पार्टी के बड़े और दिग्गज रणनीतकारों को भी पहले चरण के वोट के बाद ही अहसास हो चला था कि सब कुछ ठीक नहीं चल रहा है. समीकरण संभालने की तमाम कोशिशें जरूर की गईं. लेकिन वे सफल नहीं हुए. महाराष्ट्र में बीजेपी पहले ही सत्ता से बाहर हो चली है. बेशक झारखंड को लेकर रणनीतिकार सकते में हैं. जाहिर है खामोशी के मायने निकाले जा रहे हैं.  

 

 

 


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