राजनीति में क्यों गुम हो रही सांस्कृतिक और बौद्धिक क्रांति?

राजनीति में क्यों गुम हो रही सांस्कृतिक और बौद्धिक क्रांति?
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अनिल अंशुमन ,   Jan 08, 2019

यह स्थापित सत्य है कि राजनीति और अर्थनीति का प्रतिबिंब होते हुए भी संस्कृति का अपना एक स्वायत्त चरित्र होता है. राजनीति के निर्णायक होने के बावजूद सांस्कृतिक चेतना/क्रांति ने अपनी स्वायत्त क्षमता के बूते सदैव मानव समाज के विकास और बेहतरी में अभूतपूर्व सकारात्मक योगदान दिया है.

हर काल में जब भी किसी राजनीतिक सत्ता ने जन विरोधी कदम उठाए, तो संस्कृतिक चेतना की वजह से ही इन कदमों के विरूद्ध निडरता के साथ आवाज़ उठाई गई. इसके अनेक उदाहरण हैं. यही वजह है कि प्रायः हर सत्ता, संस्कृति की स्वायत्त भूमिका को अपने लिए खतरा मानती रही है.

हालांकि कई बार ऐसा भी हुआ है कि सत्ता ने मनोवैज्ञानिक अस्त्र के रूप में सांस्कृतिक चेतना या किसी निर्णायक बदलाव के लिए तैयार होते बौद्धिक प्लेटफॉर्म का इस्तेमाल भी किया है.  जबकि इतिहास में कई बार ऐसी सांस्कृतिक क्रांतियां हुईं हैं, जिसने सिर्फ सत्ता ही नहीं ज़माने का रुख भी बदल दिया है. 

अलबत्ता वैज्ञानिक आविष्कारों से हुए सभ्यता के आधुनिक विकास के दौर में भी मानव चेतना, उसके सोचने समझने और कल्पना क्षमता को विकसित व परिष्कृत करने में संस्कृति कि प्रभावकारी भूमिका रही है. 

संस्कृति के महत्व को स्थापित करते हुए आम जन के चहेते साहित्यकार मुंशी प्रेमचंद ने संस्कृति को राजनीति के आगे चलने वाली मशाल बताया था. 

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अस्सी के दशक में बिहार के क्रांतिकारी किसान आंदोलन के प्रखर जन सांस्कृतिक प्रणेता और समकालीन जनमत पत्रिका के प्रधान संपादक डॉ महेश्वर ने मुंशी प्रेमचंद जी की स्थापना को एक नया आयाम देते हुए कहा कि “जब राजनीति और संस्कृति किसी का भी अस्तित्व नहीं था तब धरती पर विकसित प्राणी के रूप में न सिर्फ मनुष्य और जीवन संघर्ष ही मौजूद था. एक संस्कृतिकर्मी या राजनीतिकर्मी के रूप में आपकी प्रतिबद्धता इस मनुष्य और इसके सुख-दु:ख व संघर्षों के साथ होनी चाहिए. यह बात अगर कोई राजनैतिक कर्मी या संस्कृति कर्मी भूल जाता है, तो वह जनता का नहीं रह जाता."  

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मौजूदा दौर में जनचेतना जगाने या बढ़ाने वाला बौद्धिक, सांस्कृतिक आंदोलन (क्रांति) ज़मीनी धरातल पर लगभग खामोश है. या फिर गुम है. यह चिंता का विषय है. लेकिन उससे भी अधिक चिंतनीय है वर्तमान राजनीति की प्राथमिकता में इस मुद्दे का हाशिए पर जाना.

स्थापित राजनीति (सत्ता राजनीति) का जनपक्षीय स्वरूप निरंतर घटता जा रहा है, जिसे बदलने के बजाय उसी में हिस्सेदार बनने की होड़ में लगभग सभी शामिल हैं . ऐसे में बौद्धिक, सांस्कृतिक क्रांति को महत्व देना घाटे का सौदा ही साबित समझा जाता है. 

इसलिए वर्तमान स्थापित राजनीति कतई नहीीं चाहती कि किसी भी प्रकार से कोई बौद्धिक, सांस्कृतिक क्रांति हो. और ये क्रांति जनमानस को बदले. आम जन के जेहन में कौंधे. सीने में दम भरे. जाहिर है यदि कहीं से क्रांति की हलचल होने भी लगी, तो भी उसे दमन से दबा दिया जाएगा. 

समाज में बौद्धिक,  सांस्कृतिक क्रांति का सवाल आज इस मोर्चे पर सक्रिय सभी लेखक, कवि, कलाकारों तथा बुद्धिजीवियों के जन पक्षधर होने के औचित्य को चुनौती दे रहा है. सनद रहे कि महज कुछेक सांस्कृतिक कर्म / गतिविधियां और बंद कमरे के रचनाकर्म अथवा विमर्श मात्र से ही कोई सांस्कृतिक आंदोलन खड़ा नहीं होता.

इन्हीं संदर्भों में यह सवाल भी प्रासंगिक है कि जिन जोखिमों को उठाकर कलबुर्गी, दाभोलकर और गौरी लंकेश इत्यादि ने अपनी बौद्धिक सामाजिक सक्रियता निभाई, आज कितने बुद्धिजीवी और लेखक,कवि, कलाकार वास्तव में उस जोखिम को उठाने को तैयार हैं ?

विडंबना ये है कि मौजूदा राजनीति तो क्या संस्कृति और बौद्धिक जगत में ऐसा माहौल बन गया है जिस पर जन कवि धूमिल ने वर्षों पूर्व ही कटाक्ष किया था " फटी हुई काँख भी ढँकी रहे और मुट्ठी भी तनी रहे"...! 

विश्व प्रसिद्ध नाटककार बर्तोल्तब्रेख्त ने भी व्यंग्य किया था कि, कितना अच्छा लगता है  / जब जंगल में आग लगी हो / तो हरे भरे पेड़ों की बात की जाए.

वर्तमान चुनौतीपूर्ण परिदृश्य यही है कि प्रभावी राजनीति ने सकल मानव हित को तिलांजलि देकर सिर्फ सत्ता की प्राप्ति और इसके द्वारा क्षुद्र निहित स्वार्थों की पूर्ति को ही एकमात्र लक्ष्य बना लिया है.

पूंजी के बाज़ारवादी वैश्विक अर्थ व्यवस्था के चक्रव्यूह में फांसकर पूरी दुनिया के मानव समाज पर एकाधिकार कायम करना चाहती है. जिसके लिए डिजिटल अत्याधुनिक तकनीक क्रांति के ‘लाभ ही लाभ‘ का भ्रमजाल खड़ाकर विचारहीनता और बर्बरताका ग्लैमरस संसार रचा जा रहा है.

अब राजनीति की पाठशाला में एक ही पाठ सर्वमान्य सा है कि जनता के सवाल, जनमानस पर आधारित विषय को उठाने की बात भी हो, तो उसके पीछे का उद्देश्य सिर्फ और सिर्फ सत्ता हासिल करना हो. यहीं से वैचारिक भटकाव गतिमान होते हैं. 

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प्रचार, प्रसार और मनोरंजन के सारे माध्यमों से दिन- रात यही घुट्टी पिलाई जा रही है कि हाइटेक विकास के सिक्स- फोर लेनी रास्तों पर सबसे आगे निकालने के लिए जितना नीचे गिरते जाओ. और कर लो दुनिया मुट्ठी में. हालांकि चमत्कारिक हाइटेक विकास का भांडा अब फूट रहा है. लेकिन बढ़ते वैश्विक क्षोभ और विरोध के संकटों को डायवर्ट करने की साजिशें एक साथ कई कई स्तरों पर तेज़ हो गईं हैं. 

गांव-घर से लेकर वैश्विक स्तर पर लोगों की मानसिक, वैचारिक कमजोरियों का इस्तेमाल करने के लिए संस्कृति को ही सबसे कारगर हथियार बनाया गया है. इस बात पर बहस छिड़ी है कि अंध देशभक्ति, नफरत, हिंसा, उन्माद, यौन कुंठा, नशा, असहीष्णुता, संकीर्णता और तीखे सामाजिक व सांप्रदायिक विभाजन इत्यादि का बढ़ता भयावह माहौल इसी की देन है.

लोकतंत्र की आड़ में इस या उस शासकीय धड़े को ही मजबूरी के तात्कालिक विकल्प के चयन को स्थायी बनाने की कुटिल चालों के तहत सुविचारित अनुकूलन प्रक्रिया बदस्तूर जारी है. 

Courtesy- Facebook Akhra

इस कसौटी पर सिर्फ झारखंड आंदोलन को कसने की कोशिशें करें, तो सात दशकों से भी अधिक समय तक चले अलग राज्य गठन के आंदोलन को खड़ा करने से लेकर बढ़ाने और धार देने में यहां हुए बौद्धिक व सांस्कृतिक आंदोलन, अभियान की अहम भूमिका रही है.

डॉ रामदयाल मुंडा और बीपी केसरी सरीखे कई बुद्धिजीवी, लेखक, शिक्षाविद व संस्कृति कर्मियों की भूमिका सदैव स्मरणीय रहेगी. कैसे और कब बौद्धिक, सांस्कृतिक अभियान छेड़े जाएं इसके लिए इन शख्सियतों के साथ युवाओं की टोली सीख लेने को उत्सुक रहती थी. 

इसी सिलसिले में जनप्रिय विधायक शहीद महेंद्र सिंह ने राज्य गठन के बाद से ही विधानसभा से लेकर सड़कों के अभियानों में बार- बार अपील करते दिखे कि  अभी सिर्फ अलग राज्य का निर्माण हुआ है, नवनिर्माण बाकी है. राज्य निर्माण के सपने और संकल्प वास्तविकता की धरातल पर उतारने का काम तभी संभव होंगे जब सोच व एकता में व्यापकता होगी. 

लेकिन बात झारखंड से हो या बड़े फलक पर, कोई विकल्प बना- बनाया नहीं होता. जिन समस्याओं की जड़ें व्यापक और गहरी होतीं हैं , समाधान भी तुरत -फुरत और एकांगी नहीं होता. समाधान की ईमानदार एकजुट व कोशिशें हीं वास्तविक समाधान की राह आसान करती हैं . तब इसे संपन्न करने के लिए बौद्धिक, सांस्कृतिक आंदोलन ( क्रांति ) का होना एक महत्वपूर्ण कार्यभार है.

लेकिन इसे भी पूरा करने के लिए हमें एक बार फिर से प्रेमचंद के वे सुझाव " संस्कृति, राजनीति के आगे चलनेवाली मशाल है"… से ही प्रेरणा व दिशा लेनी होगी. और इसके लिए निहायत जरूरी है एक नया बौद्धिक, सांस्कृतिक जागरण से जुड़े आंदोलन को नए सिरे से धार देने की कोशिशें शुरू हो. 

(लेखक झारखंड और बिहार के जाने- माने संस्कृति कर्मी हैं तथा जन सवालों पर पैनी नजर रखते हैं.)   


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