क्यों अमेठी ने राहुल का साथ नहीं निभाया?

क्यों अमेठी ने राहुल का साथ नहीं निभाया?
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पीबी ब्यूरो ,   May 24, 2019

कांग्रेस और खास कर गांधी परिवार के लिए दशकों से मुफीद रही अमेठी संसदीय सीट से इस बार राहुल गांधी की हार ने भारतीय राजनीति में नई बहस छेड़ दी है. कांग्रेस के लिए इसे करार झटका भी माना जा रहा है. जबकि 2004, 2009 औप 2014 में राहुल गांधी ने अमेठी से जीत हासिल की थी. 

इस बार बीजेपी की स्मृति इरानी ने राहुल गांधी को 48 हजार 78 वोटों से हराया है. हालांकि यह अंतर बहुत बड़ा नहीं है, पर इस जीत हार के मायने कहीं ज्यादा निकाले जा रहे हैं. और इस परिणाम को बड़ा उलटफेर के तौर पर देखा जा रहा है. 

इस बार केरल की वायनाड सीट से राहुल गांधी ने जब चुनाव लड़ने का फैसला लिया, तभी से बीजेपी उन्हें निशाना पर लेती रही. बाकयदा चुनाव में भी बीजेपी की स्मृति इरानी इसे उछालती रहीं. 

कांग्रेस का गढ़

स्मृति ईरानी की यह जीत ऐतिहासिक है क्योंकि 1967 में हुए चौथी लोकसभा के चुनाव के बाद यह तीसरा ऐसा मौका है जब कांग्रेस को अपने गढ़ कहलाने वाले अमेठी में हार का स्वाद चखना पड़ा है. 

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इससे पहले 1977 में आपातकाल के बाद हुए चुनाव में पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के बेटे और कांग्रेस के नेता संजय गांधी को यहां से हार का सामना करना पड़ा था. तब उन्हें जनता पार्टी के रवींद्र प्रताप सिंह ने हराया था.

हालांकि उसके बाद 1980 में हुए चुनाव में संजय गांधी ने दोबारा इस संसदीय सीट पर कब्जा कर लिया था. फिर उनके आकस्मिक निधन के बाद 1981 में कांग्रेस की तरफ से राजीव गांधी ने इस सीट से चुनाव लड़ा था. तब उन्हें यहां से जीत मिली थी. वे 1991 तक इस सीट से सांसद रहे थे. वर्ष 1991 में उनकी हत्या के बाद कांग्रेस ने कैप्टन सतीश शर्मा को इस सीट से चुनाव लड़ाया गया. उस चुनाव के अलावा 1996 के चुनाव में भी उन्होंने इस सीट से जीत का परचम लहराया. 

लेकिन 1998 में हुए चुनाव के दौरान सतीश शर्मा को भाजपा के संजय सिन्हा ने शिकस्त दी थी.हालांकि संजय सिन्हा अमेठी से बहुत ज्यादा समय तक के लिए सांसद नहीं रह सके थे. 

सोनिया भी जीतीं

1998 में चद महीनों के बीच सरकार गिर जाने के बाद 1999 में हुए चुनाव में कांग्रेस की अध्यक्ष रहीं सोनिया गांधी ने इस सीट से नामांकन दखिल किया था. तब उन्हें यहां से जीत मिली थी. इसके बाद साल 2004 में राहुल गांधी लगातार तीन बार जीते. 2014 में राहुल गांधी से स्म-ति इरानी चुनाव हार गई थीं. लेकिन बीजेपी ने उन्हें फिर से मैदान में उतारा. कांग्रेस की कमान संभालने के बाद राहुल गांधी की जिम्मेवारियां बढ़ी. लोकसभा चुनाव से पहले पांच राज्यों के विधानसभा चुनावों में भी उनकी व्यस्तता बढ़ी. जाहिर है अमेठी को बहुत वक्त नहीं दे सके. लेकिन चुनाव में प्रियंका गांधी ने अमेठी में रैलियां और सभा कर राहुल गांधी के पक्ष में हवा का रुख करने की लगातर कोशिशें करती रही. राहुल भी प्रचार करने गए. 

आत्मीयता

पीटीआई की एक रिपोर्ट के मुताबिक उनकी इस जीत के पीछे अमेठी की जनता का कहना है कि कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी से उन्हें वह आत्मीयता नहीं मिल सकी, जो उनके दिवंगत पिता और पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी से मिलती थी.

समाचार एजेंसी के मुताबिक अमेठी के लोगों का कहना है कि राजीव गांधी के समय शुरू की गई कई परियोजनाएं और कार्यक्रम राहुल के सांसद रहते एक-एक कर बंद हो गए  उनके मुताबिक इसके चलते बड़ी संख्या में लोगों को रोजगार के लिए अमेठी से पलायन करना पड़ा.

राहुल गांधी से केवल अमेठी के युवा ही दूर महसूस नहीं करते, बल्कि गांधी परिवार से बरसों से पूरी निष्ठा से जुड़े बुजुर्गों का भी मन टूटा दिखता है. समाचार एजेंसी ने अलग- अलग वर्ग के लोगों से बात की है.

इससे पहले 23 मई को नतीजे आने के बाद राहुल गांधी ने अमेठी से अपनी हार स्वीकार करते हुए स्मृति ईरानी को बधाई दी. उन्होंने कहा, 'मैं अमेठी के नतीजे पर कहना चाहूंगा कि स्मृति ईरानी जी जीती हैं, उन्हें मैं बधाई देता हूं। अमेठी की जनता ने अपना फैसला दिया है, मैं उस फैसले का सम्मान करता हूं। यह लोकतंत्र है। मैं चाहता हूं कि स्मृति ईरानी जी प्यार से अमेठी की जनता की देखभाल करें और जो भरोसा अमेठी की जनता ने उन पर जताया है, उसे वो पूरा करें.'


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