शिव के बारे में शंकर से अधिक कौन जानता है

शिव के बारे में शंकर से अधिक कौन जानता है
योगेश किसलय ,   Feb 21, 2020

शिव के बारे में शंकर से अधिक कौन जानता है. शंकर यानी आदि शंकराचार्य. शायद ही कोई हो जो शिव की महत्ता, अस्तित्व और उनके भोलेपन को नही मानता हो. 

हालांकि रावण ने शिव का नाम शंकर दिया था. रावण जब उनसे मिला, तो अपनी बहादुरी के अहंकार में शिव को ही युद्ध के लिए ललकारा. शिव ने उसे पहले आराम करने की सलाह दी, लेकिन रावण युद्ध करने को आतुर हो गया. शिव ने डमरू बजाते हुए उसके हमलों को हंसी हंसी में विफल कर दिया. 

रावण जब थक गया, तो भगवान शिव ने कहा ''विश्राम कर लो. रावण ने कहा, विश्राम नही विराम करूँगा. रावण को भगवान शिव की ताकत का अहसास हुआ. रावण ने अपना घमंड किनारे रखा और भगवान शिव से कहा कि अब वे उसका कल्याण करे. शंकर- शंकर का जाप उन्होंने शुरू किया. शं का मतलब कल्याण. कल्याण करने वाले हैं भोले शंकर''

भारत ही नही श्रीलंका , मलेशिया , इंडोनेशिया , मंगोलिया यहां तक कि अफ्रीका के कई देशों में शिव को मान्यता मिली हुई है. दरअसल शिव प्रकृति के प्रतीक हैं. कैलाश पर्वत पर निवास यानी पहाड़ो पर वास, मृगछाल वस्त्र यानी प्राकृतिक आवरण , जटा से गंगा का उद्गम यानी जल , नदी के साथ निवास , गले मे सर्प यानी विपरीत स्वभाव के प्राणी के साथ भी रहना. 

इनके मित्र और भक्त भी इनकी तरह बौड़म हैं. बसहा बैल की सवारी. पुत्र गणेश भी सूंढ़ धारी ही नही लंबोदर भी. नागों के परम मित्र होने के कारण गले मे वे नाग लटकाए रहते हैं. आज जिसे आदिवासी कहते हैं वे भी उनके उतने ही निकट थे और वे भी शिव को आराध्य मानते हैं. भगवान शिव वनस्पति प्रेमी थे इसलिए वनवासी उनके प्रिय थे. वनवासियों के भी आराध्य भगवान शिव हैं. शिव के भक्त भी जाति , धर्म , सम्प्रदाय से अलग है. 

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झारखण्ड के टांगीनाथ में आदिवासी पुजारी तो कश्मीर घाटी के ममालक शिव मंदिर का मुस्लिम पुजारी मोहम्मद अब्दुल और गुलाम मोहम्मद , खुरासान में बहमन पारसी पुजारी.  मतलब शिव सर्वजनवादी देवता हैं. 

संजीव सान्याल ने अपनी किताब 'THE LAND OF SEVEN RIVERS' में शोध करके लिखा है कि नास्तिकों के देश चीन में भी 800 ईसवी के कई शिव मंदिर हैं जहां पूजा-पाठ होती है.

जापान और कोरिया में शिव के वाहन नंदी की पूजा होती है. कुल मिलाकर शिव ऐसे देवता हैं जो न केवल सर्वव्यापी हैं बल्कि देश , काल , सम्प्रदाय , वर्ग , जाति से ऊपर हैं.

शिव प्राणियों के सभी समुदाय देव , दैत्य , दानव , नाग ,यक्ष , वरुण , ऋषि , पितर , असुर , राक्षस , गंधर्व , नर, वानर , वसु , आदित्य , आर्य , अनार्य , द्रविड़ , दस्यु सबसे समभाव रखते हैं. 

अब तो यह महाकाल रेल में भी सफर कर रहे हैं. मैं फिर दोहरा रहा हूँ कि शिव जनवादी देवता हैं. 

और अंत मे , आदि गुरु शंकराचार्य ने इसलिए कहा है ," मनोबुद्धहंकार चित्तानीनाहं  न चश्रोतजिव्हे न चघ्रणनेत्रे नाचाभ्यो मुखोमे न तेजो न वायु चिदानंद रूपः शिवोहं शिवोहं " यानि शिव न मन ,न बुद्धि ,न अहंकार , न चित ,न घ्राण , न आँख न मुख ,न प्रकाश न वायु में हैं बल्कि सम्पूर्णता में व्याप्त हैं जो परम आनंद रूप है. भगवान शिव यज्ञ और कर्मकांडो के समर्थक नही हैं. सिर्फ जलार्पण कीजिये और उनका आशीर्वाद लीजिए. इसी वजह से वे सर्वप्रिय, सुलभ और सहज स्वीकार्य हैं. ऐसे आशुतोष को बारम्बार प्रणाम''. 


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