नौकरी की आस में कहां खड़ा है युवा वर्ग?

 नौकरी की आस में कहां खड़ा है युवा वर्ग?
डॉ विनय भरत ,   Dec 16, 2018

भौगोलिक, प्रशासनिक और भाषाई तौर पर साल 2000 में झारखंड अलग राज्य का गठन हुआ, तो युवाओं ने सपने बुने थे. रोजगार को लेकर. गुणवत्तापूर्ण उच्च शिक्षा को लेकर. हक और अधिकार को लेकर. अब झारखंड अठारह बरस का हो गया है. यानि जवानी की दहलीज पर. इसी 18 की उम्र में युवा अपनी तर्जनी की चोट से सत्ता, सियासत में परिवर्तन का दमखम रखता है, लेकिन इस हैसियत के बाद भी खुद को अगली कतार में शामिल करने का अवसर उसे हासिल होता नहीं दिखता.   

देश की खनिज संपदा में 40 फीसदी हिस्से की कूबत रखतने वाला और लोहा उगलने वाले झारखंड में उचित देख भाल और तराशने वाले हाथों  की कमी के वजह से युवाओं के हुनर में जंग लग रहा है। 

युवा वर्ग के बीच हताशा- निराशा के स्वर क्यों सुनाई पड़ते हैं. वे पलायन करने को क्यों विवश हैं. यह राज्य मानव संसाधन का कितना समुचित उपयोग कर पा रहा है. इन सवालों का जवाब तलाशा जाना इस राज्य और युवा वर्ग के लिए जरूरी है. 

13 विश्वविद्यालय के मार्फत सालाना लगभग डेढ़ हजार पीएच डी, एक हजार नेट, एमफिल की डिग्रियों की उपाधि देने वाले वाले यह राज्य युवाओं के अच्छे भविष्य की गारंटी क्यों नहीं दे सकता. विश्वविद्यालयों का ज्ञान युवाओं को जिस भविष्य के लिए तैयार कर रहा है और राज्य का वर्तमान उन्हें नौकरी के जिस मर्तबान में ढाल रहा है- हकीकत में दोनों के बीच गहरी खाई है. 

सरकारी संस्थानों में नौकरी देने की क्षमता कुल नौकरियों का महज 2.7 फीसदी हो, सरकारों को अपने विश्वविद्यालयों से निकल रहे युवाओं की योग्यता पर भरोसा नहीं हो, तो युवाओं के बीच सरकारों की योग्यता और नीतियों को लेकर पेप्सी के बोतल में नमक जैसा उबाल होना लाजिम है. 

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जवाब यह भी तलाशा जाना चाहिए कि आखिर वजह क्या है कि जिस आइआइटी का युवा नब्बे के दशक तक यूपीएससी को दरकिनार कर शोध को तवज्जो देता था, उसे दारोगा की नौकरी भाने लगी है. आखिर अर्जित ज्ञान को किस स्तर के कार्य में खपाने को य़ुवा विवश हैं. क्या ये नहीं माना जाना चाहिए कि ये सरासर मानव संसाधन और ज्ञान की पाइप लाइन में सीवरेज लीकेज है, जिसे बंद करने की ठोस नीतियां तय नहीं हो पा रही. 

18 सालों में अभी तक मात्र 5 सिविल सर्विसेज परीक्षाओं के मार्फत नियुक्तियां संभव हो पायी है. 2015 में छठी परीक्षा के लिए प्रारंभ की गई प्रकिया अब तक पूरी नहीं हो सकी है. जाहिर है एक नियुक्ति प्रक्रिया में तीन साल तीन साल ! अगर कोई परीक्षार्थी पहली बार में सफल नहीं होता, तो उसकी जिंदगी के छह बेशकीमती साल यूं ही इंतजार में जाया हो जाते हैं. 

साल 2008 में लगभग 880 व्याख्याताओं की नियुक्तियां हुई थी. आगे की नियुक्ति को लेकर दस साल बाद 2018 में विज्ञापन जारी किया जाता है, जिसे बाद में तकनीकी कारणों से रोक दिया जाता है. इस बीच लगभग बीस हजार योग्य उम्मीदवार व्याख्यता की नौकरी की आस में तैयारियों में जुटे हैं लेकिन नियुक्तियां आएंगी दो हजार. शिक्षा व्यवस्था की चूलें क्यों नहीं इस हाल में हिलती रहे जहां औसतन एक हजार छात्रों पर एक शिक्षक ज्ञान बांट रहा हो. 

संविदा (कॉन्ट्रेक्ट) पर नियुक्त शिक्षक, डॉक्टर, इंजीनियर, कंप्यूटर और प्रबंधन का जानकार नौकरी में रहते हुए बेहतर नौकरी की जुगाड़ में लगा रहता है. जब तक ऐसी नौकरी में रहता है, अपने किये गए काम और मिल रहे सैलरी और प्रतिष्ठा में फर्क बैचेनियों में जीता है. 

साथ ही देश की कुल खनिज संपदा का 40 फीसदी झारखंड की धरती उगलती है, तो उस पैमाने पर रोजगार के अवसर भी सामने लाए जाने चाहिए. इनके अलावा कृषि , जंगल और पहाड़ों से घिरे भूगोल के अन्दर वनोत्पाद, लोक कला, कुटीर उद्योग, में आइडिया बेस्ड और नए इनोवेशन के जरिये झारखंड में रोजगार की असीम संभावनाएं हैं. यहां पर्यटन तो है ही. जब गोवा सिर्फ समुद्र की लहरों से अपनी आजीविका चला सकता है तो हम झरनों, नदियों. जलप्रपातों, जंगलो, पहाड़ो, घाटियों से क्यों नहीं !  

बीच की खाई क्यों है

आखिर विश्वविद्यालयों की डिग्रियों और नौकरियों के बीच खाई क्या है और क्यों है ? इसका बड़ा कारण हो सकता है कि सरकारी एस्टाब्लिशमेंट में नौकरी का घोर अभाव. सरकारी शैक्षणिक संस्थानों में जरूरत के लिहाज से शिक्षा दी जा रही है, लेकिन युवाओं को नौकरी निजी संस्थानें दे रही है.  

लोक कल्याणकारी सिद्धांतों की नींव पर खड़ी शिक्षण संस्थाएं देश की संविधान, संस्कृति, ऐतिहासिक धरोहर , भौगोलिक संरचना, सामाजिक मूल्यों, एन्थ्रोपोल्जिकल प्रश्नों के इतर घुमती हैं, या फिर विज्ञान में रिसर्च और डवलपमेंट की ओर मुड़ती हैं, लेकिन अफ़सोस युवाओं को ये तमाम ज्ञान अपने बस्ते में रख कर किसी कॉरर्पोरेट के फाईल कीपिंग का काम करते हुए पेट पालने में जूझना पड़ रहा है. सारा कुछ पढने के बाद उन्हें ऐसी कंपनियों में जॉब मिलती रही हैं, जहां उनका सिर्फ सॉफ्ट स्किल परखा जाता है. 

 अगर ऐसे छात्र कुछ दिनों के लिए नौकरी कर भी लें तो रिटेंशन नहीं हो पाती. तब प्राप्त डिग्री पर पल रहे सपने की खाई बड़ी होती है और नौकरी का तिलिस्म कुछ ही दिन में टूट जाता है. आंकड़े बताते हैं कि सरकारी क्षेत्र में तीन फीसदी, निजी क्षेत्र में 4-5 फीसदी, कृषि के क्षेत्र में 40 फीसदी अवसर हैं और बाकी के सभी रोजगार अन –ऑर्गनाइज्ड सेक्टर में है. या रोजाना का काम है या फिर बेरोजगारी. 

रास्ते क्या हैं 

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सरकारें पहले तो तीन फीसदी नियोजन की नियोजन हिस्सेदारी की नियमित भरपाई करे. फिर वक्त रहते और नौकरियों का सृजन भी. केंद्र यह मानता है कि युवा स्वरोजगार की ओर उन्मुख हो, पर क्या देश अभी उस दिशा में तैयार है, जहां रोजगार के सृजन का हुनर विश्वविद्यालयों में दिये जा रहे ज्ञान के अनुरुप युवा खुद सृजित कर ले. पकौड़े तलना, खोमचे लगाना आजीविका हो सकती है, पर आजीविका और रोजगार में ठीक वैसा ही फर्क है, जैसे मज़बूरी से तौलिये से बदन को ढंकने और शौकिया तौलिये को कंधे पर रखने में !

युवा वर्ग इस कश्मकश में भी है कि क्या नैगमिक सामाजिक उत्तरदायित्व ( सीएसआर) एक्ट के अस्तित्व में आ जाने के बाद कॉरपोरेट घराने देश में शोध और विकास ( रिसर्च और डवलपमेंट)  को  बढाने के लिए पर्याप्त फेलोशिप फंडिंग कर रहे हैं .

चूँकि 1990 में उदारीकरण के दौर के बाद मुनाफा और देश की प्राकृतिक संसाधनों पर इन घरानों का प्रभाव बढ़ता जा रहा है. तब सरकारी नीतियों से यह सुनश्चित करने की उम्मीद की जाती रही है कि उन कॉर्पोरेट घरानों पर शिक्षा के माफिक रोजगार सृजन की जिम्मेदारी मजबूती से सौंपी जानी चीहिए. सौंपे. हलांकि कई घराने और फाउंडेशन इस दिशा में बेहतर काम कर रहे हैं. 

नैगमिक सामाजिक उत्तरदायित्व (सीएसआर) के इस दायरे को बढ़ाना होगा. सीएसआर के तहत अनिवार्य रूप से खर्च की जाने वाली दो फीसदी राशि भी विश्वविद्यालय में पढ़ रहे युवाओं के नियोजन को ध्यान में रख कर करें, तो हम ये मान सकते हैं कि न सिर्फ संगठित क्षेत्र में रोजगार के अवसर चार स बढ़कर दस फीसदी हो सकेंगे. साथ ही देश का मानव संसाधन भी शोध परक कार्यों से अपनी गुणवत्ता का परचम लहराएगा. पर अभी तक होता उलटा आया है. कंपनियां अपनी मुनाफे और जरूरत के मुताबिक युवाओं के ज्ञान को उनके दिमाग से छिल कर अलग करती हैं और दोबारा से उनकी ब्रेन फॉरमेटिंग करती है, जो लंबे समय के लिए प्रोडक्टिव नहीं रह पाती.


(लेखक एसपी मुखर्जी विवि में अंग्रेजी के प्रोफेसर हैं) 


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