नजरियाः जेपीएससी विवाद पर झारखंड विधानसभा में स्पीकर की प्रतिक्रिया के मायने क्या हैं?

नजरियाः जेपीएससी विवाद पर झारखंड विधानसभा में स्पीकर की प्रतिक्रिया के मायने क्या हैं?
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नीरज सिन्हा ,   Jan 28, 2019

झारखंड लोक सेवा आयोग की छठी परीक्षा को लेकर सोमवार को विधानसभा में अध्यक्ष दिनेश उरांव ने जो कुछ कहा उसके मायने निकाले जा सकते हैं.

इससे पहले विपक्ष के हंगामे के बीच सदन की कार्यवाही बार- बार स्थगित करनी पड़ी. वैसे भी जब परिस्थितियां कार्यवाही के लायक नहीं हो, तो सदन में स्पीकर विवेक से इस तरह के फैसले लेते रहे हैं. भोजनावकाश के बाद फिर इसी मुद्दे को उछाला गया. अब तक अध्यक्ष सबकी सुन रहे थे. लगता है कि वे बहुत कुछ भांप चुके थे. इसलिए उन्होंने सवाल खड़े करने के साथ प्रतिक्रिया जाहिर की.

उन्होंने कहा,'इस समस्या/ विवाद का निदान नहीं निकाल सकते, तो विधानसभा को बंद क्यों नहीं कर दिया जाए'. राज्य की सबसे बड़ी पंचायत में बार- बार और भारी हंगामे के बीच स्पीकर का यह सवाल सिर्फ सरकार से नहीं विपक्ष से भी रहा होगा. 

सदन में स्पीकर ने जो कुछ कहा है उसके वीडियो क्लीप यूट्यूब तक में घूम रहे हैं. और उससे सुनने-परखने से पहली नजर में यह लगता है कि वे भावुक थे. और जानना भी चाहते थे चाहते थे कि चार सालों से सदन में जेपीएससी छठी परीक्षा ही क्यों गूंजती रही है. 

विवादों और आरोपों से घिरे जेपीएससी की परीक्षाओं पर राज्य का कोई होनहार युवा जब यह कहता है, 'किसी को यह बताने पर कि जेपीएससी की तैयारी कर रहा हूं, तो शक़ की नज़रों से देखा जाता हूं. लोग टिप्पणी करने से बाज़ नहीं आते कि वही घपले-घोटाले वाली परीक्षा ना'? जाहिर है यह पीड़ा मामूली नहीं.

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दरअसल झारखंड में जमींदोज होता सिस्टम और तबाह होती युवा जिंदगी की यह बानगी है. इसी बरक्स झारखंड की छवि राज्य के अंदर-बाहर कैसी बन रही है, इसे भी महसूसा जा सकता है.      

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आखिर नौकरी की आस में युवाओं के बीच से हताशा-निराशा के स्वर क्यों नहीं सुनाई पड़े. 

अलग राज्य गठन के 18 सालों में आयोग की सिर्फ पांच परीक्षाएं जो हो सकी हैं. जबकि अधिकतर परीक्षाएं जांच और सवालों के घेरे में रही हैं. इन परीक्षाओं में पैरवी और पैसे का जोर आम आरोप है. 

झारखंड लोक सेवा आयोग की दूसरी परीक्षा परिणाम पर तो सीबीआई जांच बैठाई गई है. परीक्षाओं में कथित धांधली को लेकर आयोग के कई पूर्व सदस्य और अधिकारी जेल भी जा चुके हैं.

कह सकते हैं,'छोटी सी उमर में लग गया रोग'. जेपीएससी या दूसरी संस्था से निकलने वाली सरकारी वेकेंसी (नौकरी) के नाम पर भरोसा क्यों हिल जाता है. आखिर नई या आने वाली पीढ़ी के लिए कैसी नींव डाली जा रही है. 

किसी परीक्षा के ठीक चार दिन पहले उसके स्थगित होने की सूचना आ जाए, तो उसमें शामिल होने जा रहे अभ्यर्थियों की मनःस्थिति का अंदाज़ा लगाया जा सकता है. पिछले साल छठी जेपीएससी को लेकर यही तो हुआ था. 

एक अभ्यर्थी/परीक्षार्थी के लिए राज्य की सबसे प्रतिष्ठित प्रतियोगिता परीक्षा के लिए तीन सालों तक कई किस्म के फेरबदल, नोटिस का सामना करना पड़े, तो इसकी जिम्मेदारी लेने के लिए कौन आगे बढ़ेगा. सत्ता- सिस्टम में बैठे कोई शख्स खम ठोक कहना चाहेगा कि मेधा, श्रम और उम्र के साथ खिलवाड़ करने का उसे अधिकार नहीं है.

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साल 2015 से

झारखंड लोक सेवा आयोग की छठी परीक्षा को लेकर 326 पदों के लिए साल 2015 में पहली बार विज्ञापन जारी किया गया था. उसी साल प्रारंभिक परीक्षा के लिए फॉर्म भरवाए गए. पाठ्यक्रम में संशोधन हुआ. और विज्ञापन रद्द करते हुए नए सिरे से फॉर्म भरने का आदेश निकला. 

28 नवंबर 2016 को प्रारंभिक परीक्षा ली गई. फरवरी 2017 में परिणाम जारी हुआ. और इसके साथ ही छात्रों के बीच विरोध के स्वर फूटने लगे. इसके बाद संशोधित रिजल्ट, मुख्य परीक्षा की तिथि बढ़ाना और और फिर 24 जनवरी 2018 को परीक्षा स्थगन का नोटिस. 

पिछले साल 

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इस बीच सड़कों पर युवाओं के लगातार आंदोलन और साल 2018 में विधानसभा के बजट सत्र में सत्ता- विपक्ष के विरोध के बीच सरकार के कार्मिक प्रशासनिक सुधार तथा राजभाषा विभाग की सचिव निधि खरे ने 24 जनवरी को झारखंड लोक सेवा आयोग के सचिव को पत्र लिखते हुए बताया कि आरक्षित श्रेणी के कुछ अभ्यर्थियों ने प्रारंभिक परीक्षा के परिणाम में आरक्षण एवं प्रावधानों के अनुपालन नहीं किए जाने का मामला उठाया गया है.

साथ ही कई विधायकों ने भी आरक्षण के उपबंधों के अनुपालन कराने का अनुरोध किया है. इन तथ्यों के संज्ञान में आने के बाद सरकार इस मामले में गहनता से विचार कर रही है. अतः अंतिम निर्णय लिए जाने तक परीक्षा स्थगित करने पर आयोग विचार करना चाहेगा. कार्मिक सचिव के पत्र के आलोक में इसी दिन यानी 24 जनवरी को आयोग ने अगले आदेश तक परीक्षा स्थगित करने की सूचना जारी कर दी.

बढ़ गए प्रतियोगी

326 पदों के लिए होने वाली मुख्य परीक्षा में 6103 उम्मीदवारों को शामिल होना था. आगे 28 जनवरी 2019 को हुई मुख्य परीक्षा में 34 हजार छात्रों ने भाग लिया है. 

दरअसल परीक्षा स्थगित किए जाने के बाद सात फरवरी 2018 को सरकार ने मंत्रिमंडल (कैबिनेट) की बैठक में मुख्य परीक्षा में शामिल होने के लिए प्रारंभिक परीक्षा के कट ऑफ मार्क घटाने का फैसला लिया गया था. और उसी फैसले के तहत मुख्य परीक्षा में शामिल होने वाले छात्रों की संख्या बढ़ गई. कैबिनेट के इस फैसल के विरोध में भी छात्रों का एक तबका ने विरोध प्रकट किया था. 

छात्र, प्रारंभिक परीक्षा में आरक्षण का अनुपालन नहीं किए जाने समेत कई मांगों के साथ परीक्षा पर रोक लगाने के लिए आंदोलन की राह पर उतरे हैं. परीक्षा पर रोक के लिए हाईकोर्ट में भी याचिका डाली गई है. सोमवार को (28 जनवरी 2019) को हाईकोर्ट ने परीक्षा पर रोक लगाने से इनकार करते हुए कहा है कि मुख्य परीक्षा का परिणाम कोर्ट की जानकारी में ही प्रकाशित की जाए. 

हालांकि साल 2017 में आयोग ने एक विज्ञप्ति जारी कर स्पष्ट किया गया था प्रारंभिक परीक्षा में आरक्षण का लाभ देय नहीं है. लेकिन विवाद थमने का नाम क्यों नहीं ले रहा. सत्ता- सिस्टम में बैठे लोगों में किसके  जवाब किसके पास है कि छात्र  दोषी हैं या प्रक्रियाओं में खामिया हैं.

सवाल और भी हैं. आगे क्या होगा इस पर संशय हैं. कई किस्म की आशंकाएं भी. युवा जिंदगी की बेशकीमती उम्र लौटाने की गारंटी कौन लेगा.  

गौर काजिए, मरीज जब आईसीयू में भर्ती है और उसका तीमारदार डॉक्टर की तरफ कातर नजरों से देखता है. डॉक्टर की चुप्पी पर तीमारदार घबराता है और पूछता है- सब ठीक तो है. 

जेपीएससी के सिलसिले में सत्ता- सिस्टम से कातर नहीं डटकर सवाल पूछे जाने चाहिए. गुंजाइश है कि परीक्षा पर रोक इस विवाद का हल नहीं हो सकता. लेकिन शासन का इकबाल दिखना चाहिए. इन्हीं मुद्दों पर सरकार की नीति उजागर होती है. 

लेकिन विधानसभा के अध्यक्ष ने जो सवाल खड़ा किया है उसका भी मर्म यही है कि विवाद का जड़ कहां है और क्यों नहीं इसे दुरूस्त किया जा सकता. अगर कोई निर्णायक कदम नहीं उठा सकते तो सदन को क्यों नहीं बंद कर दें. 

स्पीकर की इस प्रतिक्रिया के बाद विपक्ष के लिए मानो मौका मिल गया है. सरकार की आलोचनाएं जारी है. इस्तीफा तक मांगा जा रहा है. नाकामियां गिनाई जा रही हैं. यह समझने- सोचने के लिए सहमत नहीं होते दिखते कि आज इनकी पारी है, कल आपकी पारी हो सकती है. विपक्ष पहरेदार की भूमिका जरूर निभाए. 

बेशक सिस्टम कैसे दुरूस्त हो, यह सरकार पर निर्भर करता है. लेकिन सिर्फ छठी परीक्षा पर इस बहस और आलोचना को केंद्रित नहीं किया जाना चाहिए. स्पीकर ने जो सवाल खड़े किए हैं वह दूर तक असर करता हुआ दिखाई पड़ता है. 

आगे, जनता के नुमाइंदे (चाहे सत्ता या विपक्ष के हों) इन मामलों में राजनैतिक नफा- नुकसान और विवाद से उपर उठकर बहस का हिस्सेदार बनें, सच को सच और गलत को गलत कहने का साहस रखें. झारखंड पर अब तक लगते रहे दाग अगर खत्म नहीं हो सके, तो गहराने से रोके जरूर जा सकते हैं.   


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