राजनीतिक गिरावट का दौरः वोट के गिने- चुने दिन बाकी, उम्मीदवार का पता नहीं

 राजनीतिक गिरावट का दौरः वोट के गिने- चुने दिन बाकी, उम्मीदवार का पता नहीं
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अनिल अंशुमन ,   Apr 04, 2019

वोटरों को जागरूक करने के लिए देश स्तर पर जोरदार अभियान चलाया जा रहा है. शासन, प्रशासन से लेकर समाज के हर तबके को इससे जोड़ा गया है. स्कूली बच्चें तख्तियां लिए रैलियां निकाल रहे हैं. नारे लगा रहे हैं. यह एक तस्वीर है. अब दूसरी तस्वीर पर गौर कीजिएः चुनावों में प्रत्याशी का होना एक अनिवार्य पहलू है, जिसे अमूमन पार्टी आलाकमान ही तय करता है. मौजूदा चुनावी राजनीति का जो रंग-ढंग दिखाई पड़ने लगा है उसमें प्रत्याशी तय करने से पहले आम अवाम की भागीदारी या रायशुमारी के कोई मतलब नहीं रह गए हैं. गोया, जिस उम्मीदवार को आप पांच साल के अपना नुमांइदा या प्रतिनिधि चुनेंगे, जो जनप्रतिनिधि कहलाएंगे, वह कौन होगा कैसा होगा, किसके लिए प्रतिबद्ध होगा, यह आधी रात या चुनावों से चंद दिनों पहले आप जान सकेंगे.

आखिर क्यों. दल या आलाकमान पांच साल पहले न सही चुनावों से कुछ महीने पहले तक यह बताने की स्थिति में नहीं होता कि किस क्षेत्र से कौन उम्मीदवार होगा. 

इसे चुनावी राजनीति में गिरावट के तौर पर  भी देखा जा सकता है. क्या, यूनानी दार्शनिक अरस्तू के उस उद्धरण पर नए सिरे से बहस की शुरुआत नहीं की जानी चाहिए, जिसमें उन्होंने कहा था, ‘प्रजातंत्र मूर्खों का शासन है’.

पांच बरस क्षेत्र की जनता के बीच काम करके चुनाव में प्रत्याशी बनने को अब आउट्डेटेड माना जाता है. अब प्रत्याशी बनने के लिए सिर्फ आलाकमान की रजामंदी का जुगाड़ ही सबसे ज़रूरी है. जातीय समीकरण पर वह उम्मीदवार कितना सटीक बैठता है, धन- बल से कितना मजबूत है इसे परखा जाता है.

इसके बाद गठबंधन की राजनीति और इसकी कवायद में जोड़-तोड़, लोकतंत्र के असली मालिक को यह जानने से वंचित करता रहा है कि आखिर उसका उम्मीदवार कौन होगा. लोकसभा चुनाव के फकत गिने- चुने दिन बाकी हैं, पर अब भी उम्मीदवारों के नाम पर अलग अलग दलों में माथापच्ची और जोड़ तोड़ जारी है. आखिर क्यों?

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शायद ही ऐसा कभी हुआ हो कि प्रत्याशी तय होने से पहले क्षेत्र की मतदाता, जनता से कोई राय, सलाह व सहमति ली जाती हो. अलबत्ता ‘पढ़े लिखे जागरूक मतदाता’ का एक बड़ा हिस्सा भी बिलकुल अंतिम क्षण में खड़े किए गए प्रत्याशी को मानो ‘ईश्वर का आदेश’ मानकर उसकी जीत के लिए मरने- मारने पर उतारू होने लगता है. 

युवा मतदाता का एक तबका पहलवान से अधिक उसके पट्ठे बनने में अधिक रोमांच महसूस करता है. जो गाड़ियों में पार्टी / प्रत्याशी के चुनाव चिन्ह का झंडे लगाकर तथा सर पर पट्टी व गले में स्कार्फ लगाकर ऐसे भाव में उछल कूद मचाते हैं , गोया किसी दुश्मन से युद्ध कर रहें हों. ये अलग बात है कि दिनभर की कवायद का समापन मुफ्त के दारू-मुर्गे से होता हो.

पार्टियों में आतंरिक लोकतंत्र समाप्त होने से भी तस्वीरें बदलती जा रही है. भले ही कोई इसका दंभ भरता हो कि उम्मीदवारों के चयन में लोकतंत्र के उसूलों का ख्याल रखा गया है.

यही वजह है कि जीता हुआ उम्मीदवार जनता- जनार्दन के प्रति समर्पण के बजाय आलाकमान के फरनाम को पूरा करने में लगा होता है. साथ ही पांच बरस वह अपने हितों को उपर रखता है. 

हम कह सकते हैं कि लगातार लोकतंत्र के असली निहितार्थ को ही हाशिये पर धकेला जा रहा है. राजनेता और राजनीतिक दल पारदर्शिता की तमाम दुहाई दें, लेकिन लोकतंत्र के महापर्व चुनाव के मौके पर वे कितने छद्म तरीके अपनाते हैं, इस पर सामान्यत: कोई गौर ही नहीं करता.

राष्ट्र और समाज के नाम पर क्षेत्र, जाति, संप्रदाय और दलीय बंधन से ऊपर उठकर सोचने-करने की बातें राजनीतिक दल अक्सर करते हैं, लेकिन कड़वा सच है कि चुनावी दंगल में कौन बचेगा, कौन गिरेगा और किसकी लॉटरी लगेगी, यह दो-ढाई लोगों को छोड़कर कोई नहीं जानता. जबकि आम अवाम को यह अधिकार कायम हो कि 'आधी रात' को अपना प्रत्याशी देखने- जानने के बजाय नाम की घोषणा पहले हो.

इस प्रसंग में जनकवि धूमिल याद आते हैं, जिन्होंने कहा था, ‘हमारे यहां लोकतंत्र एक ऐसा तमाशा है’, जिसकी जान मदारियों की भाषा है. ''धूमिल की इस उक्ति के स्थायी बन जाने का संकट दिनों दिन गहराता ही जा रहा है".

जनता के लिए, जनता के द्वारा और जनता से ... इसे लोकतंतत्र की मूल आत्मा के तौर पर देखा और माना जाता है. लेकिन मौजूदा प्रजातंत्र के स्वरूप को नेता-पार्टी के लिए, नेता-पार्टी के द्वारा और नेता-पार्टी के तौर पर ढाला जा रहा है. लोकतंत्र के इस नए और कथित दर्शन को मानने और लागू करने के अभ्यस्त बनाने हेतु तरह तरह से घुट्टी पिलाकर ‘अनुकूलित’ किया जा रहा है.  

इन हालात को बदलने के लिए जनता का ही पूर्णतः सजग होना ज़रूरी है. जिस दिन हम जागरूक होकर अपने-अपने वोट और उम्मीदवार, दल का मूल्यांकन करना सीख जाएंगे, यकीन मानिए वह दिन लोकतंत्र का सच परिभाषा लिख जाएगा. जनभावना की ज्वार पर सरकार बनाने-बिगाड़ने का दंभ ध्वस्त होता दिखेगा.


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