नजरियाः 18 साल का झारखंड और नाबालिग राजनीति

नजरियाः 18 साल का झारखंड और नाबालिग राजनीति
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योगेश किसलय, वरिष्ठ पत्रकार ,   Dec 29, 2018

क्षेत्रीय राजनीति के बूते कभी विकास पुरुष के रूप में उभरे चंद्रबाबू नायडू ने एक प्रेस वार्ता में कहा थाः " मुझे मेरे अधूरे वायदे नींद नही आने देते. नायडू का आंध्र प्रदेश में पहला कार्यकाल था. और उन्होंने अपने तरीके से विकास के नए आयाम तय किये थे. उन्होंने आगे बताया मैंने लगभग चार हजार घोषणाएं की, जिसमे तीन हजार पूरे हो गए. सात सौ पर काम चल रहा है लेकिन तीन सौ अभी भी अधूरे हैं".

नायडू के इस खुलासे पर पत्रकार मंत्रमुग्ध थे. उन्होंने हिसाब लगाया और नायडू के दावे, वायदे और चिंता की तस्दीक भी की. नायडू की यह साफगोई राजनीतिज्ञ की नहीं बल्कि एक ईमानदार प्रशासक की स्वीकारोक्ति थी.

नायडू राजनीतिज्ञ से अधिक टेक्नोक्रेट की तरह राज करते रहे जिसका खामियाजा भी उन्हें भुगतना पड़ा. वैसे नायडू चुनाव हारे और राजनीति में उतर- चढ़ाव का सामना भी करते रहे, लेकिन आंध्र प्रदेश को एक मुकाम तक पहुंचाया.

झारखंड की वर्तमान सरकार के चार साल का तुलनात्मक विचार केवल तथ्य और आंकड़े पर नहीं हो सकते. राजनीति परसेप्शन यानि अवधारणा पर ज्यादा टिकी होती है. आंकड़े का खेल क्रिकेट के लिए छोड़ा जा सकता है. हार कर भी आंकड़ेबाजी के खेल में जीतने का धंधा क्रिकेट जैसे खेलों के लिए है. राजनीति बिहैवेरियाल साइंस है. इसे व्यवहारिक संदर्भों में ही कसना पड़ता है. परेशानी यह है कि खेमों में बंटे समाज और अपने मूल धर्म, मर्म से दूर होते कथित तौर पर घुटनेटेक मीडिया से उम्मीद नहीं की जा सकती कि चार साल में झरखंड के विकास और जन कल्याणकारी कार्यक्रमों तथा जनता के बीच सरकार की लोकतांत्रिक छवि का लेखा-जोखा करने की हिमाकत दिखाए.

नायडू के विकास की सोच या समेकित, सामयिक, पारदर्शी पर आधारित कोई मॉडल झारखंड की राजनीति और नौकरशाही में कभी पैमाना नहीं बना. जनसेवक लोकसेवक की परिभाषा दरकिनार कर राजनेता, राजनीति में केवल और केवल रोजगार तलाशते हैं और नौकरशाही रस्म अदायगी कर रही है.

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मुझे याद है कि तीन साल पहले एक नौकरशाह किसी चिकित्सा अधिकारी को नसीहत दे रहे थे कि वे जनता की सुने उनके हित की सोचें. साथ ही उन्होंने खुलकर कहा कि उनका क्या है, आज यहां है कल कहीं और चले जायेंगे. मुझे लगा कि राज्य में ऐसे ब्यूरोक्रेट हैं, जो पहले से मानकर चल रहे हैं कि वे महज अपनी नौकरी बजा रहे हैं. राज्य के विकास और हितों से उनका ज्यादा लेना- देना नही है. तब क्यों नहीं ये सवाल उठे कि इस मानसिकता से ऊपर उठना होगा.

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अगर मोटे तौर पर हिसाब किया जाए, तो झारखंड में भी ताबड़तोड़ घोषणाएं की गई हैं. लेकिन उनपर अमल कितना हुआ इसे सही तरीके से परखा जाना चाहिए. कई घोषणाएं तो ऐसी थीं, जो राज्य की परंपराओं और यहां के हिस्ट्री ट्रैक के हिसाब से केवल आसमान से तारे तोड़ने वाली बात थी.

दरअसल सत्ताधीश जानते हैं कि जनता सपने में जीना सीख गई है. वादों और घोषणाओं पर ही जनता इतनी उतावली हो जाती है मानो उनके लिए खुशियों और आर्थिक, सामाजिक तौर पर सशक्त होने के सारे दरवाजे खोल दिये गए हैं और वे निहाल हो रहे हैं

दिक्कत इस बात की भी है कि विरोध करने का धर्म धारण करने वाला विपक्ष भी इस इंतजार में है कि सरकार से जनता का मोहभंग हो और मजबूरी में जनता उन्हें चुने.

नब्बे के दशक में राजनीति करने वाले युवा नेताओं की चर्चा प्रासंगिक है. रांची में बिजली, सड़क, टेलीफोन, पानी के लिए अलग- अलग दलों के कई युवा नेता जनता और मीडिया की आंख का तारा हुआ करते थे. तब रांची एकीकृत बिहार का हिस्सा थी और इस इलाके के लिए कोई भारी भरकम बजट नहीं होता था.  

अड़चनों से वाकिफ होने के बाद भी युवा नेताओं में गजब का उत्साह हुआ करता था. आंदोलन की आड़ में वे पैसा बनाना नही जानते थे बल्कि आदमी बनाते थे. इसलिए जनता भी उन्हें हाथों हाथ लेती थी. जनसरोकार के मुद्दों पर मुखर रहने के कारण ही मीडिया उन युवा राजनीतिज्ञों पर पूरा भरोसा करता था.

तब यह रिवाज था कि जनता के मुद्दे पर नेता, बुद्धिजीवी , पत्रकार और ब्यूरोक्रेट चर्चा और बहस करते थे . अब तो राजनीतिज्ञों का युवा नस्ल केवल सत्ता हासिल करने या निजी लाभ साधने के जुगाड़ में लगा हुआ है.

राजनीति के हिसाब से झारखंड काफी मासूम सा राज्य है. यहां राजनैतिक तिकड़मों को लोग जानते नही हैं. यही कारण है कि कुछ घाघ किस्म के व्यापारी , ब्यूरोक्रेट और सियासत के गलियारे में घूमता बीच का आदमी यहां की राजनीति में विधाता बन जाता हैं. इन घाघ लोगों को जैसे मन आया राजनीति की दिशा तय कर दी और हम तालियां बजाते रहते हैं. या इसी हाल में जीने को विवश रहते हैं. 

अब तक हम अभिशप्त थे कि झारखंड में कभी बहुमत की सरकार नही बनी. मोदी लहर ने झारखंड को बहुमत की सरकार जरूर दे दी. तब पूछा जा सकता है कि इन बेशकीमती चार साल में राज्य ने क्या खास हासिल किया. यह सवाल भी पूछा जा सकता है कि क्या हम नब्बे के दशक वाले नायडू या 2010 के नीतीश बन पाए.

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अलग राज्य बनने के बाद झारखंड में कई साल तक मुनाफे का ही बजट बना. खनिज संपदा से परिपूर्ण झारखंड के पास अकूत संपत्ति भी थी. राजस्व के कई उपाय थे. आज हालत यह है कि सरकारी खजाने की लाल बत्ती जलती हुई दिख रही है. कर्मचारियों को वेतन और मानदेय देने के टोटे पड़े हैं. स्वतंत्र संस्थानों से करोड़ों की जमा राशि मांगी जा रही है ताकि कर्मचारियों को वेतन दिए जा सकें.

अब यह चुनावी साल है. कोई किसी को नाराज नही करना चाहेगा. घोषणाओं और वादों की आंधी उड़ेगी. मतदाता डांग-डांग हुआ फिरेगा कि अहंकारी नेता आन पड़े हमारे चरणों मे. राजनीति की जोड़ -तोड़ और आंकड़ो के खेल में मस्त जनता सपने बुनने लगेगी. नारो पर तालियां बजेगी और सरकार के काम और बर्ताव गौण हो जाएंगे.

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दरअसल राजनीति में लगातार बदलती परिस्थितियों के बीच इस पर बहस होती रही है कि भारत मे चुनाव विकास पर नही नारों पर जीता जाता है. बहस इसकी भी होती रही है कि इस देश में राजनीति को धर्म और राजनीतिज्ञों को भाग्यविधाता मान लिया गया है. क्यों नहीं माना जाए कि राजनीति निहायत ही राजतंत्र का परिष्कृत रूप है. क्यों नही माना जाए कि हमारी सालों साल की गुलामी ने भी हमें स्वतंत्र और नई सोच को स्वीकारने की शक्ति अब तक नहीं दी है.

ऐसे कई मौके आते हैं जब लगता है कि अलग राज्य के 18 साल हो गए, लेकिन राजनीति बिल्कुल ही नाबालिग है. न तो हमें लोकतंत्र की मर्यादाएं पता है , न ही अधिकार का भान है. जिम्मेदारियों का भी अहसास नहीं है. और ना ही हमें अपनी कमजोरियों का पता और अपनी ताकत का गुमान है. हम अभिशप्त हैं ऐसी व्यवस्था में रहने के लिए. ऐसी ही व्यवस्था बनाये रखने के लिए. अब इन चार सालों में राज्य ने क्या खोया और क्या पाया उसे याद रखूं या भूल जाऊं. या आंकड़े और सपनों का सहारा लेकर डांग -डांग होता फिरूँ.


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