विजय हांसदा का तीर फिर निशाने पर, पांच साल में चार बार हारे हेमलाल

विजय हांसदा का तीर फिर निशाने पर, पांच साल में चार बार हारे हेमलाल
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पीबी ब्यूरो ,   May 24, 2019

कभी झारखंड मुक्ति मोर्चा के कद्दावर नेता रहे हेमलाल मुर्मू बीजेपी में शामिल होने के बाद से लगातार हार का सामना कर रहे हैं. हेमलाल मुर्मू और बीजेपी दोनों के लिए इसे अजीब संयोग भी कह सकते हैं कि नरेंद्र मोदी की प्रचंड लहर में भी हेमलाल की चुनावी नैया भंवर में ही फंसती चली जा रही है. उधर राजमहल संसदीय सीट पर जेएमएम के विजय हांसदा का तीर एक बार फिर निशाने पर जा लगा है. उन्होंने बीजेपी के हेमलाल मुर्मू को 99 हजार 195 वोटों से हराया है. 

लगातार दो जीत के बाद विजय हांसदा अपने पिता थॉमस हांसदा की राह पर आगे बढ़ते दिख रहे हैं, जो एकीकृत बिहार से लेकर झारखंड तक कांग्रेस के कद्दावर नेता रहे. फर्क यह कि विजय हांसदा ने पिता के निधन के बाद झारखंड मुक्ति मोर्चा का हाथ थामा. 37 साल के विजय हांसदा ने बहुत कम समय में संताल परगना की धरती पर जेएमएम का मजबूत लड़ाका के तौर पर खुद को स्थापित कर लिया.  

विजय हांसदा की यह जीत इस दफा झारखंड मुक्ति मोर्चा के लिए भी बेहद अहम बना है. दरअसल दुमका से पार्टी के सुप्रीमो और दिशोम गुरु (शिबू सोरेन) चुनाव हार गए हैं. साथ ही जमशेदपुर और गिरिडीह में भी जेएमएम को हार का सामना करना पड़ा है. गठबंधन के तहत जेएमएम चार सीटों पर चुनाव लड़ा था. हालांकि जमशेदपुर और गिरिडीह बीजेपी के कब्जे की सीट थी. लेकिन दुमका में शिबू सोरेन की हार ने पार्टी को सकते में डाला है. 

टसल 

इस बार हेमलाल मुर्मू और विजय हांसदा का टसल कहीं आगे बढ़कर बीजेपी और जेएमएम के बीच का था. दरअसल बीजेपी हर हाल में संताल परगना की तीन सीट- राजमहल, दुमका और गोड्डा जीतना चाहती थी. पिछले चुनाव में मोदी लहर के बाद भी बीजेपी की दुमका और राजमहल में हार हो गई थी. इसके बाद से ही बीजेपी ने संताल परगना में जेएमएम को टारगेट पर ले लिया था. गोड्डा में बीजेपी की जीत बरकरार रही. दुमका की सीट उसने जेएमएम से झटक ली. लेकिन राजमहल की सीट फंस गई. 

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संतल परगना की तीन सीटों पर वोट के ठीक अगले दिन यानी बीस मई को मुख्यमंत्री रघुवर दास ने बीजेपी के दफ्तर में मीडिया से बातचीत करते हुए  कहा था कि 13 सीटों पर एनडीए की जीत तय है. साथ ही सीएम ने यह भी कहा था कि सिर्फ राजमहल में टफ कंटेस्ट है, लेकिन पांच-दस हजार के मार्जिन से बीजेपी सीट निकाल ले जाएगी.

23 मई को वोटों की गिनती में भी कई राउंड तक जेएमएम के विजय हांसदा और बीजेपी के हेमलाल मुर्मू के बीच कुछ सौ- हजार वोटों से आगे- पीछे होते रहे, तो लगा कि वाकई फैसला कुछ भी हो सकता है. लेकिन दोपहर में लगभग 14 वें राउंड विजय हांसदा ने हेमलाल मुर्मू को पीछे छोड़ना शुरू किया, तो फिर पीछे मुड़कर नहीं देखा. 

जानें हेमलाल को

हेमलाल मुर्मू ने राजमहल की सीट पर 2004 में जीत हासिल की थी. तब वे जेएमएम में थे. इसी संसदीय सीट के बरहेट विधानसभा क्षेत्र से वे चार बार जेएमएम के विधायक रहे.  झारखंड में विपक्ष की सरकार में वे मंत्री भी रहे. मतलब जेएमएम में रहकर राजनीति की लंबी पारी खेली. एक दौर था जब उन्हें शिबू सोरेन का सिपहसलार माना जाता था. साल 2010 से हेमंत सोरेन के जेएमएम में प्रभावी होने के बाद हेमलाल को थोड़ा खटकने लगा और वह दौर भी आया जब खटराग बढ़ता चला गया. हेमलाल मुर्मू को लगने लगा कि जेएमएम से हटकर भी ने अपना प्रभाव दिखा सकते हैं. इसके बाद हेमलाल मुर्मू 2014 के लोकसभा चुनाव से ठीक पहले जेएमएम छोड़ बीजेपी में शामिल हो गए. 

चार हार 

2014 में वे बीजेपी के टिकट से राजमहल का चुनाव लड़े, लेकिन जेएमएम से हार गए. लोकसभा चुनाव हारने के कुछ ही महीने बाद बीजेपी ने हेमलाल मुर्मू को उसी बरेहट से विधानसभा का चुनाव लड़ाया, जिस सीट पर वे जेएमएम से चार बार जीते हैं. लेकिन विधानसभा चुनाव में हेमेत सोरेन ने ही उन्हें बरहेट से हरा दिया. 

गौरतलब है कि जेएमएम में ही बड़ी हैसियत रखने वाले साइमन मरांडी भी 2014 के वक्त शिबू सोरेन का साथ छोड़कर बीजेपी में शामिल हो गए थे. लेकिन साइमन भी अपनी परंपरागत लिट्टीपाड़ा की सीट कांग्रेस के डॉ अमिल मुर्मू से हार गए. 

2017 में डॉ अनिल मुर्मू के निधन के बाद लिट्टीपाड़ा का उपचुनाव हुआ. साइमम को लगा कि जेएमएम में वापसी का यही सही मौका है. वे शिबू सोरेन और हेंमत सोरेन से मिले. बताया कि बीजेपी में दिल लगता नहीं. वापस बुला लीजिए. शिबू सोरेन और हेमंत सोरेन मान गए. 

साइमन को लिट्टीपाड़ा उपचुनाव में जेएमएम ने मैदान में उतार दिया. इधर बीजेपी को लगा कि लिट्टीपाड़ा में हेमलाल मुर्मू असरदार साबित हो सकते हैं. इसलिए एक बार हेमलाल मुर्मू को बीजेपी ने लिट्टीपाड़ा के मैदान में उतार दिया. लिट्टीपाड़ा का उपचुनाव जीतने के लिए खुद मुख्यमंत्री रघुवर दास और बीजेपी ने कोई कसर नहीं छोड़ी.

लेकिन साइमन जीत गए और हेमलाल हार गए. यानी तीन साल में हेमलाल मुर्मू जेएमएम से तीन बार हारे. और पांचवे साल 2019 में हेमलाल मुर्मू फिर लोकसभा का चुनाव हार गए. हार के बाद उन्होंने कहा है कि इसके कारणों की समीक्षा करेंगे. 

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हेमलाल मुर्मू की टीस यह भी हो सकती है कि जेएमएम की राजनीति छोड़ बीजेपी में शामिल होने के बाद से वे चुनावों में हार खाते रहे हैं. संताल परगना की राजनीति में माना जाता है कि कम से कम आदिवासी इलाकों में जेएमएम का जेएमएम का झंडा छोड़ किसी दूसरी पार्टी में जम जाना बहुत आसान नहीं होता. इस बार बीजेपी और हेमलाल मुर्मू के लिए यही मिथक तोड़ना प्रतिष्ठा का सवाल बना था. अंततः बीजेपी और हेमलाल सफल नहीं हो सके. 

समीकरण

राजमहल संसदीय सीट के छह विधानसभा क्षेत्रों में चार पर जेएमएम और कांग्रेस का कब्जा है. यहां मुस्लिम, ईसाई और आदिवासी वोट हार-जीत के अहम फैक्टर हैं. विजय हांसदा इस फैक्टर को सहेजने में कामयाब रहे. क्षेत्र में हमेशा सक्रियता और कार्यकर्ताओं की लामबंदी का लाभ भी उन्हें मिलता दिख रहा है. साइमन मरांडी, स्चीफन मरांडी, आलमगीर आलम, अखील अख्तर सरीखे नेताओं के मैदान संभाले रहने से भी विजय हांसदा का किला हिला नहीं. हालांकि बीजेपी ने घेराबंदी की कोई कसर नहीं छोड़ी. प्रचार युद्ध में भी बीजेपी ने ताकत झोंकी. खुद मुख्यमंत्री वहां कमान संभालते रहे. 

जेएमएम के नेता वरिष्ठ विधायक स्टीफन मरांडी कहते हैं कि विजय हांसदा युवा और उर्जावान हैं. साथ ही इस चुनाव में उन्होंने मेहनत बहुत की और सभी दलों के नेताओं, कार्यकर्ताओं को साथ लेकर चलते रहे. बीजेपी के हर दांव को समय रहते नाकाम करने की कोशिशें की जाती रही. जेएमएम ने युद्ध के तौर पर इस चुनाव को लड़ा. अधिक वोट पड़ने का लाभ भी हमें मिला. 


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