जब वेद मंत्रों के उच्चारण से गुमनाम और भटकती जिंदगी को पटरी मिली

जब वेद मंत्रों के उच्चारण से गुमनाम और भटकती जिंदगी को पटरी मिली
Photo- Ankit Singh (वक्त बदलाः बाएं है प्रदीप बराल और दाएं में भी प्रदीप बराल)
आशुतोष सिंह ,   May 21, 2020

बाईं तस्वीर में प्रदीप बराल हैं. दाईं तस्वीर में भी प्रदीप बराल ही हैं. वेद का अध्ययन करने के दौरान छात्रावास से निकल पड़े बराल पांच साल तक विक्षिप्त हालत में घूमते- भटकते रहे. फिर एक नया मोड़ आया जब वेद के उच्चार ने इस शख्स की गुमनाम और भटकती जिंदगी को पटरी पर ला दिया. कह सकते हैं वक्त के फेर ने अचानक से फर्क ला दिया. 

हालांकि इस कहानी के मुख्य किरदार बने हटिया इलाके स्थित एक मंदिर के सेवक और स्थानीय युवक अंकित सिंह. 

प्रदीप बराल पांच साल पहले वेद का अध्ययन करने गुवाहाटी से वाराणसी आए थे. एक साल तक वेदाश्रम में अध्ययन करने के बाद उनकी मानसिक स्थिति गड़बड़ा गई. चुपके से छात्रावास छोड़कर निकल पड़े. कई जगहों पर भटकते हुए रांची पहुंचे. विक्षिप्त अवस्था में हटिया के रिंग रोड पर अक्सर घूमते हुए देखे जाते थे.  

इन पांच सालों के दौरान परिवार वालों को कोई खबर नहीं थी कि प्रदीप जिंदा भी है या नहीं. लेकिन परिस्थितियां बदली. वक्त बदला. एक दिन गुवाहाटी के सुपरिटेंडेंट आफ पुलिस का फोन प्रदीप के घर वालों को पहुंचा. एसपी ने उन लोगों से बताया, ''आपके परिवार का लड़का प्रदीप रांची में जिंदा और महफूज है.''  

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गुरुवार को प्रदीप बराल के भाई प्रेम बहादुर बराल और उसके दो अन्य साथी उसे लेने तुपुदाना हटिया पहुंचे थे. प्रदीप को देखते ही मानो उनकी खुशियों और उम्मीदों को पंख लग गए. 

प्रेम बहादुर बताते हैं, ''शुरुआती दिनों में प्रदीप को बहुत तलाशा, पर बाद में उम्मीदें छोड़ दी. वैसे प्रदीप की याद जरूरत आती. फिर कई मौके पर लगता अब वो जिंदा नहीं है. क्योंकि कहीं से उसकी कोई सूचना नहीं मिल रही थी. पांच साल पहले प्रदीप को वेद अध्ययन करने के लिए वराणसी स्थित वेद आश्रम भेजा गया था. एक साल तक वहां पढा. उसके बाद से उसकी कोई सूचना नहीं मिल पा रही थी'' 

प्रदीप बराल की यादें भी अब जिंदा होने लगी है. वो कहता है, वाराणसी से चुपचाप पैदल ही निकल गया था. लगता है कि मुंबई, हैदराबाद, दिल्ली और अन्य कई शहरों से होते हुए  रांची पहुंच गया.  

इधर काफी दिनों से वो हटिया स्थित सतरंजी पुल के नीचे विक्षिप्ता अवस्था में रहने लगा. बढी़ दाढ़ी ,मैले कुचैले कपड़े में हटिया से लेकर हुलहुंडू तक पैदल घूमता रहा. एक दिन रिंग रोड के निकट एक मंदिर के पास वह खड़ा था और वेद मंत्र का उच्चारण कर रहा  था. कठिन पर स्पष्ट. 

तभी उस मंदिर के सेवक एवं स्थानीय युवक अंकित  सिंह तथा कई अन्य लोगों ने उसे वेद मंत्र उच्चार करते हुए सुना करते हुए सुना. तब उन्हें लगा कि यह वास्तव में कोई ज्ञानी है, जो मजबूरियों में इस अवस्था में पहुंच गया है. 

अंकित और उसके साथियों ने उसे नहला धुला कर अच्छे कपड़े पहनाए. भोजन भी कराया और मंदिर में ही रहने का इंतजाम करा दिया.

इसके बाद प्रदीप के बताने पर उसके फोटो को गुवाहाटी के एसपी के पास व्हाट्सएप किया गया. इस आग्रह के साथ ही उसके परिवार का पता लगाकर प्रदीप बराल के जिंदा होने और रांची में रहने की सूचना दे दी जाए। 

हाल ही में गुवाहाटी के एसपी का फोन अंकित के पास आया. उसे जानकारी दी गई. कि बराल के परिवार का पता चल गया है. कुछ दिनों में ही उसके परिवार के लोग उसको लेने रांची के हटिया पहुंच जाएंगे. 

गुरुवार को अंकित और उनके साथियों ने प्रदीप बराल को तुपुदाना थाने में थाना प्रभारी के समक्ष भाई प्रेम बहादुर बराल को सौंप दिया. प्रेम बहादुर अपने भाई प्रदीप को लेकर टैक्सी से गुवाहाटी चला गए.

जाते- जाते प्रदीप बराल की आंखें छलछला गई. इधर अंकित और उनके साथी प्रदीप बराल की आखों को पढ़ते रहे. अंकित कहते हैं, ''यह वेद मंत्र का असर ही रहा होगा. हमलोग तो महज माध्यम बने. कह सकते हैं किस्मत भी क्या चीज है. कहां से कहां ले जाती है एक आदमी को.'' 


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