दो महिला दिग्गजः कोडरमा और चाईबासा के मैदान में, दम कितना घमासान में

दो महिला दिग्गजः कोडरमा और चाईबासा के मैदान में, दम कितना घमासान में
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चित्रांश ,   May 02, 2019

ये तस्वीर पुरानी है. बीते दिनों में विपक्ष में रहकर साथ चलने की निशानी है. वैसे राजनीति में वक्त के हिसाब से परिस्थितियां बदलती है. लिहाजा चुनावी मैदान में अब इनकी नई कहानी है. इनमें एक हैं अन्नपूर्णा देवी. दूसरी हैं गीता कोड़ा. लोकसभा चुनाव को लेकर ये दोनों महिलाएं सुर्खियों में हैं. 

अन्नपूर्णा देवी कोडरमा से भाजपा के टिकट पर चुनाव लड़ रही हैं. और गीता कोड़ा चाईबासा से कांग्रेस की उम्मीदवार हैं. भाजपा और कांग्रेस ने इन्हीं दो महिलाओं को झारखंड में उम्मीदवार बनाया है. 

जबकि भाजपा 14 में से 13 पर और कांग्रेस 7 सीटों पर चुनाव लड़ रही है. तब पूछा जा सकता है कि दोनों महिला उम्मीदवारों का मुकाबला किससे है मैदान में . साथ ही दम कितना है कोडरमा और चाईबासा के घमासान में. 

कोडरमा में छह मई और चाईबासा में 12 मई को चुनाव है. 

तानाबाना

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कोडरमा में अन्नपूर्णा देवी का मुकाबला राज्य के पूर्व मुख्यमंत्री और झारखंड विकास मोर्चा के केंद्रीय अध्यक्ष बाबूलाल मरांडी तथा भाकपा माले के राजकुमार यादव से है. बाबूलाल मरांडी विपक्ष के साझा उम्मीदवार भी हैं. और कोडरमा से तीन बार चुनाव जीते हैं. माले के राजकुमार यादव कोडरमा संसदीय क्षेत्र के राजधनबार से विधायक हैं और 2014 के लोकसभा चुनाव में दूसरे नंबर पर थे. 

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जबकि अन्नपूर्णा देवी कोडरमा से चार बार विधायक रही हैं. 2014 के चुनाव में वे भाजपा से हार गई थीं. उन्होंने राजद में 21 सालों की राजनीति की है. इसी साल पिछले मार्च महीने में वे भाजपा में शामिल हुई हैं. और भाजपा ने मौजूदा सांसद रवींद्सेर राय का टिकट काटकर अन्नपूर्णा देवी को उम्मीदवार बनाया है. 

लिहाजा कोडरमा से इन तीनों उम्मीदवारों की प्रतिष्ठा जुड़ी है. अन्नपूर्णा देवी के साथ बीजेपी का बैकिंग है, तो बाबूलाल मरांडी के पास तजुर्बा और पुराना संपर्क है.

वैसे कोडरमा लोकसभा सीट को लेकर एक अहम समीकरण यह है इसके चार विधानसभा क्षेत्र गिरिडीह जिले में आते हैं. बाबूलाल मरांडी का यह गृह क्षेत्र भी है. लेकिन उन चार विधानसभा क्षेत्र में तीन पर बीजेपी का कब्जा है. 

Publicbol (गीता कोड़ा चुनाव अभियान में) 

उधर चाईबासा सीट से चुनाव लड़ रहीं गीता कोड़ा पूर्व मुख्यमंत्री मधु कोड़ा की पत्नी हैं. अभी जगन्नाथपुर विधानसभा क्षेत्र से वो विधायक हैं.

2009 में भी गीता कोड़ा ने विधायक का चुनाव जीता था. 2014 में वे अपने दम पर चाईबासा लोकसभा का चुनाव लड़ी थीं. लेकिन भाजपा के लक्ष्मण गिलआ से हार गई थीं. लक्ष्मण गिलुआ बीजेपी के प्रदेश अध्यक्ष हैं. जाहिर है इस बार वे प्रतिष्ठा की लड़ाई में फंसे हैं. 

गीता कोड़ा ने भी इसी साल कांग्रेस का दामन थामा है. और चाईबासा से वे विपक्ष का साझा उम्मीदवार हैं. साझा उम्मीदवार होने की वजह से चाईबासा में बीजेपी और कांग्रेस की बिल्कुल आमने- सामने की लड़ाई हो रही है. समीकरणों के तार तोड़े-जोड़ा जा रहे हैं और वोट बैंक पर दरक लगाने की कशमकश है. 

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कोड़ा दंपती

चाईबासा से मधु कोड़ा 2009 में निर्दलीय चुनाव जीते थे. उन्होंने भाजपा को चुनाव हराया था. जबकि जगन्नाथपुर विधानसभा सीट से वे 2000 और 2005 में चुनाव जीत चुके हैं. 2005 में बीजेपी ने जब मधु कोड़ा का टिकट काटा था, तो कोड़ा निर्दलीय लड़कर चुनाव जीत गए थे.

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2006 में कोड़ा ने झारखंड में बीजेपी सरकार का तख्ता पलट कर मुख्यमंत्री बनने का रिकॉर्ड भी हासिल कर चुके हैं. हालांकि बाद में वे भ्रष्टाचार और मनी लाउंड्रिंग के मामले में फंसते चले गए. अभी उनके चुनाव लड़ने पर रोक है. लेकिन कोल्हान के आदिवासियों के बीच कोड़ा दंपती की मजबूत पकड़ रही है, यह उनके धुर विरोधी भी जानते- समझते हैं.

कांग्रेस की भी इस सीट से उम्मीदें लगी है. फिलहाल स्टार प्रचारक के तौर पर जोत सिंह सिद्धू ने वहां प्रचार किया है. हेमंत सोरेन ने भी हवा का रुख मोड़ने की कोशिश की है. 

बीजेपी के लक्ष्मण गिलुआ ने प्रचार तेज किया है 

इधर कोड़ा दंपती ने भी कोल्हान को मथ कर रख दिया है. हालांकि शुरुआती दिनों में झामुमो के विधायकों की नाराजगी और दूरियां से गीता कोड़ा परेशान जरूर रहीं. लेकिन अब विपक्ष के रणनीतिकारों ने मामले के पैचअप कर दिया है और जेएमएम के विधायक भी मैदान संभालते दिख रहे हैं.

दरअसल चाईबासा संसदीय क्षेत्र की पांच विधानसभा सीटों पर जेएमएम का कब्जा है. जाहिर है जेएमएम के खुलकर साथ दिए बिना चुनावी नैया खेना भी आसान नहीं था. 

चाईबासा में कांग्रेस की भी पहले से जमीन रही है. कांग्रेस के नेताओं, कार्यकर्ताओं को लामबंद करते हुए कोड़ा दंपती उस जमीन में जान फंकते दिखाई पड़ रहे हैं. यह सीट आदिवासियों के लिए सुरक्षित है. जाहिर है कांग्रेस और बीजेपी में आदिवासी वोट छीनने और बचाने की जोर आजमाइश चल रही है.

चाईबासा में जेएमएम के विधायक दीपक बिरूआ के लिए भी यह चुनाव लिटमस टेस्ट जैसा है. क्योंकि इस विधानसभा सीट से वे दो बार चुनाव जीते हैं. कमोबेश यही स्थिति जेएमएम विधायक जोबा मांझी की है. 

गीता कोड़ा आदिवासी गांवों में प्रचार कर रहीं 

पीएम मोदी

अब कोडरमा और चाईबासा में घमासान किस कदर है इसका अंदाजा लगाया जा सकता है कि 29 अप्रैल को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कोडरमा संसदीय क्षेत्र के जमुआ में चुनावी सभा की. और छह मई को वे चाईबासा आ रहे हैं.

चूंकि प्रदेश अध्यक्ष का मामला है, इसलिए मुख्यमंत्री रघुवर दास भी चाईबासा में कोड़ा की नैया खेने में कोई कसर नहीं छोड़ रहे. साथ ही प्रदेश अध्यक्ष होने के लिए बीजेपी का कुनबा भी पसीने बहा रहा है. बीजेपी, कोल्हान की इस लड़ाई को विधानसभा चुनाव के मद्देनजर आर-पार की लड़ाई मान रही है. 

लेकिन एक बात भी शीशे की तरह साफ है कि बीजेपी का उम्मीदवार या रणनीतिकार सबको मोदी मैजिक का भरोसा है. इसलिए हर नेता और कार्यकर्ता उम्मीदवार के नाम पर नहीं, पीएम मोदी के नाम पर वोट मांग रहे हैं. 

इधर हेमंत सोरेन ने कोडरमा में बाबूलाल मरांडी के लिए मुहिम तेज की है. झारखंड में हेमंत सोरेन को विपक्ष के बड़े प्रचारक और रणनीतिकार के तौर पर देखा जा रहा है.

प्रधानमंत्री के जमुआ आने के अगले ही दिन यानी 30 अप्रैल को हेमंत सोरेन ने बाबूलाल मरांडी के समर्थन में चुनावी सभा की. यह कवायद बाबूलाल मरांडी के पक्ष में आदिवासियों का समर्थन पक्का करने के लिहाज से की गई.

इधर एक मई को रघुवर दास ने डोमचांच में बीजेपी कार्यकर्ताओं और समर्थकों के साथ सभा कर हवा का रुख भाजपा की तरफ मोड़ने की कोशिशें की. मतलब कोडरमा में कांटा से कांटा निकालने का आजमाइश जोरों पर है. 

इससे पहले गिरिडीह में हुई एक बैठक में मुख्यमंत्री कोडरमा और गिरिडीह से बीजेपी के विधायकों को आगाह करा चुके हैं कि अगर वे अपने क्षेत्र में पिछड़े, तो विधानसभा चुनाव के वक्त उनके लिए मुश्किल हो सकता है.

दरअसल कुछ ही महीने बाद झारखंड में विधानसभा चुनाव होना है. जाहिर है सीएम के इस रुख के बाद बीजेपी के विधायक ढील नहीं देना चाहते. 

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इधर बुधवार को ही बाबूलाल मरांडी उसी जमुआ में सेंधमारी करने पहुंचे जहां प्रधानमंत्री आए थे. सरफराज अहमद, सबा अहमद, प्रणव वर्मा, लक्ष्मण स्वर्णकार, गौतम सागर राणा सरीखे नेता भी बाबूलाल मरांडी के पक्ष में मैदान संभाले हुए हैं. बाबूलाल के पक्ष में एक फैक्टर अहम माना जा रहा है कि उन्होंने तमाम विपरीत परिस्थितियों के बाद भी जमीन और जनता का साथ कभी नहीं छोड़ा है. इसका लाभ उन्हें मिल सकता है.

विपक्षी दलों के नेता, कार्यकर्ता भी उनके साथ हो चले हैं. हालांकि कोडरमा में जातीय समीकरण पर ही इस बार जीत- हार का फैसला और फासला तय होने जा रहा है. 

हेमंत सोरेन ने भी बाबूलाल के समर्थन में संभाल रखा है मोर्चा 

इधर भाकपा माले किसी हालत में पीछे हटने के लिए तैयार नहीं दिखता. माले को अपने जमानी कैडर तथा वोटरों पर भरोसा है, पार्टी के राष्ट्रीय महासचिव दीपंकर भट्टाचार्य, बगोदर से पूर्व विधायक विनोद सिंह, भुवनेश्वर केवट, मनोज भक्त सरीखे नेता महीनों से गिरिडीह संसदीय क्षेत्रों के दूरदराज इलाके में गोलबंदी की मुहिम चला रहे हैं. माले की मजबूत मौजूदगी का जेवीएम और भाजपा दोनों को अहसास है. हालांकि भाजपा को लगता है कि माले विपक्ष के वोटों में दरार डालेगा. 

हालांकि चुनावी हवा का रुख रोज देख और भांप रहे जानकारों का कहना है कि त्रिकोणीय संघर्ष में सबको अपना वोट बेस बचाने से जूझना पड़ा रहा है. गुंजाइश इसकी भी है कि आखिरी वक्त तक भाजपा की अन्दोनपूर्णा देवी जेवीएम और माले से जूझती रहीं. जबकि जेवीएम और माले भी दो दलों से जूझता रहे.  

अलग-अलग 

कोडरमा और बरकट्ठा से अन्नपूर्णा देवी की उम्मीदें कहीं ज्यादा हैं. पिछले चुनाव में भी बीजेपी को इन दोनों विधानसभा क्षेत्रों से जबरदस्त बढ़त मिली थी.

इसके साथ ही अन्नपूर्णा देवी यादव वोट को अपनी ओर समेटने की कवायद में जुटी है. दो मई को सतगावां में भूपेंद्र यादव की सभा का मकसद भी यही माना जा रहा है. 

सतगांवा पहले से अन्नपूर्णा की जमीन रही है. लेकिन तब राजद के लालू यादव का भी ब्रांड था. इसलिए अन्नपूर्णा नए सिरे से यादव वोट को लामबंद करने में जुटी हैं. भाजपा को अपने वोट बैंक वैश्य तबका से उम्मीदें बरकरार है और विपक्ष भी मानता है कि उस पैकेट को हिलाना- डुलाना मुश्किल है. 

बरकट्ठा के गढ़ में बाबूलाल मरांडी और माले दोनों सेंध लगाने की जोर लगा रहे हैं. माले, बगोदर, जमआ और राजधनबार में भी जोर लगा रहा है. राजधनबार के विधायक होने के नाते राजकुमार यादव के लिए वहां बढ़त लेने की चुनौती है. जबकि बगोदर में विनोद सिंह को,. 

इधर मुस्लिमों और आदिवासियों का का बड़ा हिस्सा विपक्ष बाबूलाल के लिए समेटना चाहता है. वैसे तीन मजबूत उम्मीदवारों के मैदान में होने से वोटों के बंटवारे का खतरा है. इससे दलों और उम्मीदवारों को किसी नतीजे पर पहुंचने में मुश्किलों का सामना करना पड़ सकता है. 

बाबूलाल मरांडी को बखूबी पता है कि बीजेपी किस घाट से पानी उठाती रही है. इसलिए वे उन घाटों की घेराबंदी में लगे हैं. 

कोडरमा की लड़ाई में फिलहाल अलग- अलग विधानसभा क्षेत्रों में अलग- अलग तस्वीर उभरती जा रही है. बाबूलाल मरांडी की सीधी नजर गांडेय, जमुआ, बरकट्ठा और राजधनबार पर है. तो बीजेपी कोडरमा, बरकट्ठा, बगोदर में अपनी दीवार दरकने नहीं देना चाहती. रवींद्र राय का टिकट काटे जाने के बाद अगड़ा वोट बाबूलाल मरांडी की ओर सरक सकता है. इससे बीजेपी के माथे पर बल पड़े हैं. हालांकि रवींद्र राय बीजेपी के प्रचार में शामिल हैं. लेकिन उनके समर्थक समझौता करने के मूड में नहीं दिखते. वोट के तीन दिन बाकी हैं. पानी का कई घाट से गुजरना बाकी है. और ये तीन दिन तीनों दलों के लिए बेहद महत्वपूर्ण हो सकते हैं.  


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