उत्कृष्ट प्रेम दर्शन, विनयशीलता, निश्छलता का प्रतीक 'टुसू' के रंगों में रचा-बसा मन

उत्कृष्ट प्रेम दर्शन, विनयशीलता, निश्छलता का प्रतीक 'टुसू' के रंगों में रचा-बसा मन
डॉ मंजय प्रमाणिक ,   Jan 15, 2020

उत्कृष्ट प्रेम-दर्शन, विनयशीलता, शालीनता, नम्रता और निश्छल मनोवृत्ति का प्रतीक टुसू पर्व का आगाज हो चुका है.  इस पर्व को झारखंड का ऐतिहासिक पर्व की श्रेणी में भी रखा गया है. 

किवंदन्तियों के आधार पर प्राचीन काल से यहां की आदिम जातियां प्रकृति पूजक, पितृ पूजक तथा देव पूजक की अनुयायी रही है.

यहां की सामूहिक गीत, नृत्यादि की कथाएं भी प्रचलित रही है. इसकी प्रवृति आज भी देखी जा सकती है. टुसू पर्व भी इसी सामूहिकता को दर्शाने में सक्षम है.

शीतकाल के इस उत्सव को पूरे पौष मास तक मनाया जाता है. पौष महीने में मनाये जाने के कारण ही इसे ‘पूस परब’ भी कहा जाता है और इस अवसर पर विशेष रूप से तैयार किये गये पकवान (पीठा) को ‘पौष पीठा’ या ‘पूस पीठा’ भी कहा जाता है.

छोटानागपुर के पांचपरगना, कोयलांचल और सिंहभूम के एक बड़े हिस्से में मनाए जाने वाले इस पर्व के रंग में लोगों का मन दशकों से रचता-बसता रहा है. 

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यह पर्व झारखंड के अलावा बिहार, बंगाल, उड़ीसा, मध्य प्रदेश, उत्तर प्रदेश तथा असम के कुछ क्षेत्रों में भी धूमधाम के साथ मनाया जाता है. गौर करने पर यह प्रतीत प्रतीत होता है कि जहां कुरमी लोग बसे हैं वहां टुसू पर्व का अलग ही महत्व है. 

कुरमाली और बांग्ला भाषा में अधिकतर टुसू से संबंधित गीत गाए जाते हैं. इन गीतों को रचने और गाने वाले लोग भी अधिकतर कुरमी ही होते हैं. कहा गया है कि टुसू पर्व का अपना एक अलग ही महत्व है क्योंकि यह पर्व उस समय मनाया जाता है जब किसान साल भर मेहनत करने के बाद फसलों को काटकर घर में ले जाते हैं. और इसके साथ ही पूरा परिवार टुसू पर्व की तैयारी में लग जाते है. 

टुसू पर्व की उत्पत्ति के बारे में किसी भी महाकाव्य में उल्लेख नहीं है, लेकिन लोकगीतों तथा लोककथाओं में यह बिल्कुल जीवंत है. टुसू गीतों में सामाजिक जीवन और प्रेम दर्शन का रंग समाया होता है. 

साथ ही लोककथाएं यह जाहिर करती हैं कि टुसू युवतियों का ही पर्व है. मान्यता है कि टुसू की आराधना जो युवतियां करती हैं, तो उनकी सभी मनोकामनाएँ पूर्ण होती है. 

पर्व का पहला दिन चाउर धोवा से प्रारंभ होता है. उस दिन टुसू पर्व का उद्घाटन होता है.  उसी दिन युवतियां सबेरे उठकर सबसे पहले घर की साफ-सफाई करके तेल, साबुन, कपड़े और बांस की एक नई डाली में चावल लेकर गीत गाते नदी, तालाब या झरने पर जाती हैं. 

चावल को धोने के क्रम में गाया जाने वाला गीत- बुचा बांधेक झोइल-झोइल पानि, तरा चाउर धवा कन गांवेक रानि.. की गूंज टुसू के आगाज का अहसास कराता है. 

दूसरा दिन गुड़ी कुटा का दिन आता है इसमें पिछले दिन धोया हुआ चावल को ढेंकी से कुटा जाता हैं. युवतियाँ खुशी से गुड़ी कुटती हैं और गीत भी गाती हैं. 

आसछे मकर दु दिन सबुर कर।

अगो तरा साया साडि़ जगाड़ कर।।

आइज हेकेइक गुड़ी कुटा दिन।

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तरा साया साडि़क फिता किन।।

इस गीत से साया, साड़ी खरीदने तथा गुड़ी कुटा की जो प्रचलन है उसको दर्शाया गया है. टुसू पर्व का तीसरा दिन ‘बाँउड़ी’ के नाम जाना जाता है. इस दिन पीठा पकाया जाता है.

इसके अलावे और भी  पकवान भी पकाये जाते हैं. पकवान बनाने के बाद परिवार का मुखिया पीठा को पहले अपने पूर्वजों एवं बसमता मां (धरती माता) को पूरी श्रद्धा भाव के साथ चढ़ाया जाता है. उसके बाद पूरे परिवार के सदस्य ग्रहण करते हैं और टुसू गीत का भरपूर आनन्द लेते हैं.

टुसू पर्व का चौथा दिन मकर संक्रान्ति का दिन आता है। इस दिन का इंतजार बहुत ही बेसब्री से करते हैं. यह दिन सबों के लिए खास होता है. 

 
 


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