राज्य सभा चुनाव एक मौका होगा, जब झारखंड में बीजेपी-आजसू नए सिरे से करीब आ सकती है

राज्य सभा चुनाव एक मौका होगा, जब झारखंड में बीजेपी-आजसू नए सिरे से करीब आ सकती है
Publicbol (File Photo)
पीबी ब्यूरो ,   Feb 26, 2020

राज्य सभा के लिए चुनाव की तारीखों की घोषणा के साथ ही झारखंड की राजनीति में हलचल शुरू है. हलचल के बीच यह चुनाव एक मौका भी होगा जब बीजेपी और आजसू के बीच विधानसभा चुनाव में बढ़ी दूरियां कम हो सकती है.

दरअसल, विधानसभा चुनाव में एक-दूसरे का हाथ छोड़ने से दोनों दलों को बड़ा धक्का लगा है. दोनों दलों को इसका अहसास भी है.

राज्य सभा चुनाव से पहले विधानसभा के बजट सत्र में भी बीजेपी चाहेगी कि आजसू विपक्ष की भूमिका में साथ निभाए. यह आजसू के लिए भी वक्त का तकाजा होगा कि वह साथ निभाए. 

झारखंड में राज्य सभा की दो सीटों के लिए 26 मार्च को चुनाव होगा. इसी दिन वोटों की गिनती होगी. चुनाव को लेकर अधिसूचना जारी कर दी गई है.

नामांकन दाखिल करने की आखिरी तारीख 13 मार्च है. झारखंड समेत 17 राज्यों की 55 सीटों पर चुनाव होना है. 

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राज्य में जो दो सीटें खाली हो रही हैं उनमें एक एनडीए समर्थित निर्दलीय सांसद परिमल नथवाणी और राजद सांसद प्रेमचंद गुप्ता शामिल हैं.

परिमल नथवाणी को पिछली दफा बीजेपी और आजसू विधायकों ने समर्थन दिया था. जबकि राजद ने जेएमएम, कांग्रेस के सहयोग से जगह बनाई थी. 

झारखंड से निर्वाचित दोनों राज्यसभा सांसद का कार्यकाल नौ अप्रैल 2020 को पूरा होने जा रहा है.

2019 में हुए विधानसभा चुनाव के नतीजे से वोटों का समीकरण बदलता दिख रहा है. और राज्य सभा चुनाव को लेकर आजसू के अलावा एनसीपी, भाकपा माले के एक- एक वोट के साथ बरकट्ठा से निर्दलीय चुनाव जीते अमित यादव के वोट अहम हो सकता है. 

पत्ते नहीं खोले

हालांकि सत्ता-विपक्ष ने भी राज्य सभा चुनाव को लेकर पत्ते नहीं खोले हैं. लेकिन एक सीट पर जीत हासिल करने के लिए जेएमएम अकेले भी सक्षम दिख रहा है.

उसके पास 29 विधायक हैं. जबकि राज्यसभा सांसद के निर्वाचन के लिए 28 विधायकों की पहली प्राथमिकता (फर्स्ट प्रिफरेंस) के वोट चाहिए. ऐसे में झामुमो किसी एक व्यक्ति को आसानी से राज्यसभा भेज सकता है.

इधर सत्तारूढ़ दल जेएमएम-कांग्रेस- राजद के विधायकों की संख्या 46 है. जेवीएम के टिकट से चुनाव जीते प्रदीप यादव और बंधु तिर्की कांग्रेस में शामिल हो गए हैं.

और विधानसभा में लिखित तौर पर कांग्रेस का सदस्य मानने को आग्रह किया है. अगर दोनों को कांग्रेस के सदस्य के तौर पर माना जाता है, तो सत्त पक्ष में विधायकों की संख्या 49 हो जाती है. 

गुंजाइश इसकी भी है कि सत्ता पक्ष दूसरा उम्मीदवार भी खड़ा करे. तब उसे और वोट जुटाने होंगे. उम्मीदवार खड़ा करने की स्थिति में उसे राजद, माले, एनसीपी और एक निर्दलीय को पाले में करने की कवायद होगी. आजसू की ओर भी हाथ बढ़ाया जा सकता है. 

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बीजेपी के पास 26 

इधर बीजेपी के पास 25 विधायक हैं. बाबूलाल मरांडी के आने से यह संख्या 26 हो जाती है. ऐसे में भाजपा को कम-कम एक विधायक के समर्थन की निहायत जरूरत पड़ेगी.

हेमंत सोरेन बरहेट के साथ दुमका से चुनाव जीते थे. दुमका की सीट उन्होंने छोड़ दी है. जाहिर है अब 80 विधायकों पर ही वोट और नतीजे होंगे. 

अगर परिमल नथवाणी को बीजेपी ने समर्थन दिया, तो नथवाणी की प्राथमिकता में आजसू के दो वोट लेने की होगी. और उन्हें यह समर्थन मिल भी सकता है कि क्योंकि नथवाणी के आजसू के साथ पहले से अच्छे रिश्ते रहे हैं. 

बीजेपी ने कोई दूसरा उम्मीदवार उतारा, तो पार्टी की पहली कोशिश होगी कि आजसू का समर्थन हासिल करना. विधानसभा चुनाव में अलग-अलग होकर लड़ने के बाद भी केंद्र में आजसू एनडीए का घटक दल है. झारखंड में आजसू के एक सांसद हैं. 

विधानसभा चुनाव के दौरान

महज नौ महीने पहले लोकसभा चुनाव में नरेंद्र मोदी की प्रचंड लहर पर सवार बीजेपी के लिए झारखंड विधानसभा चुनाव धक्का देने वाला साबित हुआ है. 

साथ ही सरकार और लोकसभा चुनाव में बीजेपी के साथ चली आजसू के लिए भी नतीजे बेहद परेशान करने वाले हैं. 

कुल 62 लाख 41 हजार 907 वोटर हासिल कर बीजेपी को 25 और आजसू को 2 सीटों पर जीत मिली है. 

इधर जेएमएम गठबंधन (जेएमएम-कांग्रेस- राजद) को 53 लाख 19 हजार 472 वोट लेकर 47 सीट झटकते हुए सरकार बनाने में कामयाब हुआ है. 

बीजेपी को विधानसभा चुनाव में सबसे ज्यादा 50 लाख 22 हजार हजार 374 वोट (33.4 प्रतिशत) मिले हैं. 

वोटों के समीकरण बताते हैं कि कम से कम दर्जन भर सीटों पर बीजेपी और आजसू के उम्मीदवार आपस में लड़कर हार गए.   दोनों साथ लड़ते तो संभावना थी कि कम से कम 40-41 का आंकड़ा छू सकते थे. तब सत्ता की लड़ाई टसल वाली होती. 

विधानसभा चुनाव के दौरान बीजेपी और आजसू के बीच बढ़ी दूरी के बाद दोनों दलों के नेता रणनीतिकार कभी साथ नहीं बैठे या एक दूसरे की ओर हाथ नहीं बढ़ाए हैं. अब राज्य सभा चुनाव एक मौका हो सकता है जब दोनों दल करीब हो सकते हैं. 


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