सपना की सूनी जिंदगी में अरमानों के पंख लगे, जब कोडरमा डीसी दरवाजे पर पहुंचे दाखिला लेने

 सपना की सूनी जिंदगी में अरमानों के पंख लगे, जब कोडरमा डीसी दरवाजे पर पहुंचे दाखिला लेने
Publicbol (कोडरमा के उपायुक्त के साथ अनाथ बच्ची सपना)
पीबी ब्यूरो ,   Jan 07, 2020

11 साल की सपना ने सोचा नहीं था कि उसकी सूनी जिंदगी में भी अरमानों के पंख लग जाएंगे. हाथों में किताब होगी. 'साहब' खुद दरवाजे पर आकर अभिभावक बनेंगे और स्कूल में दाखिला दिलाएंगे. फिर अपनी गाड़ी में बैठा कर स्कूल के हॉस्टल छोड़ आएंगे.

तीन दिन पहले उन्होंने इतना भर ही पूछा तो था, किस क्लास में पढ़ती हो. पढ़ाई छूट चुकी थी, वो जवाब क्या देती. ठिठुरन भरी सर्दी में गरीबों के बीच कंबल बांटने साहब ने सपना को भी एक कंबल ओढ़ाया. बातें की और चले गए. 

वह शनिवार का दिन था. और ये मंगलवार की सुबह. सपना उसके परिजनों और टोला के लोगों के लिए बदला सा नजारा था. 

झारखंड में कोडरमा प्रखंड के गुमो बस्ती के दलित टोला (वार्ड नंबर 26) में रहने वाली सपना कुमारी का दाखिला जिले के उपायुक्त रमेश घोलप ने कस्तूरबा आवासीय विद्यालय में छठी कक्षा में कराया है. 

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शनिवार को उपायुक्त इसी टोला में ठंड से बचाव के लिए गरीबों के बीच कंबल बांटने पहुंचे थे. उनकी नजर इस बच्ची पर पड़ी. उन्होंने पूछा था कि किस क्लास में पढ़ती हो. और फिर जो किस्सा सामने आया, इससे वे एक अधिकारी की जिवाबदेही से खुद को रोक नहीं सके. 

उपायुक्त कहते हैं, '' बच्ची को स्कूल के कपड़े, जूते, किताबें भी उपलब्ध कराई गई है. साथ ही महिला बाल विकास तथा सामाजिक सुरक्षा को निर्देश दिया गया है कि सपना को हर महीने दो हजार रुपए पेंशन देना सुनिश्चत करें. सपना को पढ़ने की ललक है, इसलिए उसकी पढ़ाई में कोई बाधा नहीं आएगी. 

इससे पहले इस टोला में कैंप लगाकर जरूरतमंदों को पेंशन और अन्य सुविधा देने का निर्देश दिया गया है. 

माता- पिता का साया नहीं

सपना जब डेढ़ साल की थी, तो उसके सिर से मां गीता देवी का साया उठ गया था. इस घटना के छह महीने बाद पिता ईश्वर दास भी सड़क दुर्घटना में गुजर गए. यह बच्ची जब तीन साल की हुई, तो उसकी बड़ी बहन की भी आकस्मिक मौत हो गई.

ऐसे में सपना को अबतक उसकी गरीब चाची बसंती देवी ने लालन-पालन किया. शुरुआती दिनों में उसे गांव के आंगनबाड़ी केंद्र में भेजा गया, लेकिन मुफलिसी में चाची ने पढ़ाना छोड़ दिया.  

तीन दिनों दिन पूर्व शनिवार को इसी टोला में उपायुक्त रमेश घोलप कंबल वितरण करने पहुंचे, तो बच्ची पर उनकी नजर पड़ी. उपायुक्त ने बच्ची से यह जानना चाहा कि किस क्लास में पढ़ती है, तो सारा मामला सामने आया. उपायुक्त ने मातहतों से कहा कि बच्ची का स्कूल में दाखिला दिलाया जाए. 

इधर, उपायुक्त मंगलवार को खुद विभाग के अधिकारियों और कस्तूरबा आवासीय विद्यालय की वार्डेन को लेकर बच्ची के चाची घर पहुंचे. घर के दरवाजे पर बैठ कर दाखिला की प्रक्रिया पूरी की. उन्होंने खुद अभिभावक बन रजिस्टर में हस्ताक्षर भी किए. घर पर ही बच्ची को स्कूल ड्रेस सहित सभी सामान मुहैया कराए गए. 

थोड़ी देर में सपना तैयार होकर घर से निकली. उपायुक्त अपनी गाड़ी में बैठा कर कोडरमा स्थित आवासीय विद्यालय पहुंचा आए. इससे पहले माता-पिता के नाम पूछे जाने पर उसकी आंखों से लोर टपक पड़े. उसे देखकर चाची भी रोने लगीं. उधर स्कूल पहुंचने पर छात्राओं ने सपना का स्वागत किया.

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बच्ची की चाची गंवई लहजे मे कहती हैंः ''सपना के सपना साकार हो जाए, बहुत कृपा होगी. पढ़ जाएगी, तो काम-धाम करेगी. ब्याह में भी परेशानी नहीं होगी. ऊ तो साहब के नजर में आ गई, जो जिंदगी बदलने जा रही है.''

उपायुक्त ने शिक्षा विभाग के जीरो ड्राप आउट के दावे पर सवाल उठाया. साथ ही कहा कि मुखिया, शिक्षक, कर्मचारी, अभिभावक का दायित्व है कि स्कूल से दूर बच्चों को चिह्नित करें.

उन्होंने शिक्षा विभाग को ऐसे मामलों में और प्रभावी तरीके से काम करने का निर्देश दिया, ताकि कोई भी बच्चा स्कूल से दूर नहीं होने पाए. 

उपायुक्त ने बताया है कि महिला एवं बाल विकास एवं सामाजिक सुरक्षा के तहत बच्ची को हर माह दो हजार रूपये सहायता फिलहाल दी जाएगी. फिर इसे नियमित कर दिया जाएगा.

बच्ची की 18 साल होने तक यह सहायता मिलती रहेगी. इस योजना के तहत जिले में 24 बच्चों को लाभ दिया जा रहा है, जो अनाथ व असहाय हैं.


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