क्या है दसवीं अनुसूचि और क्यों बंधु को पार्टी से निकाले जाने के बाद भी दलबदल की राह आसान नहीं?

क्या है दसवीं अनुसूचि और क्यों बंधु को पार्टी से निकाले जाने के बाद भी दलबदल की राह आसान नहीं?
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नीरज सिन्हा ,   Jan 22, 2020

विधानसभा चुनाव के नतीजे आने के महीने भर के अंदर विधायक बंधु तिर्की को पार्टी से निकाले जाने के बाद झारखंड की सियासत में एक सवाल मजबूती से उछल रहा है कि अब आगे क्या होगा. क्या विधायक बंधु तिर्की को आनन- फानन में इसलिए निकाला गया कि विलय के लिए दो तिहाई (टू-थर्ड) सदस्यों की सहमति की बाध्यता खत्म हो जाए. क्या बंधु को पार्टी से निकाले जाने के बाद दलबदल में बाबूलाल मरांडी की राह आसान हो जाएगी. क्या जेवीएम में तेजी से बनते- बिगड़ते समीकरणों के बीच बीजेपी में विलय की संभावनाओं को बल मिल रहा है. 

सवाल और भी हैं. और इन सवालों के बरक्स दसवीं अनुसूचि के प्रावधान और पैरा यह जाहिर करते हैं कि इस कार्रवाई के बाद भी अगर बाबूलाल मरांडी बीजेपी में शामिल होते हैं, तो सदस्यता को लेकर दसवीं अनुसूचि से ऊबर पाना मुश्किल हो सकता है. 

हालांकि बाबूलाल मरांडी ने अब तक पुख्ता तौर पर नहीं कहा है कि उनकी पार्टी बीजेपी में विलय कर रही है, लेकिन जेवीएम में जिन किस्मों की गतिविधियां हैं उससे अटकलों और संभावनाओं का दौर जारी है. 

अलबत्ता पार्टी के दो विधायकों ने बाबूलाल मरांडी से मिलकर कहा है कि वे बीजेपी में जाना नहीं चाहते. प्रदीप यादव और बंधु तिर्की पहले भी कह चुके हैं कि पार्टी विलय की ओर बढ़ती दिख रही है, जिसके वे पक्षधर नहीं हैं. 

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निरहर्ता के बारे में उपबंध

दसवीं अनुसूचि के अनुच्छेद 102(2) और अनुच्छेद 191 (2) में दल परिवर्तन के आधार पर निरहर्ता के बारे में उपबंध का क्रम 4 कहता है-

सदन का कोई सदस्य पैरा 2 उपपैरा(1) के अधीन निरर्हित नहीं होगा (सदस्यता नहीं जाएगी) यदि उसके मूल राजनीतिक दल का किसी अन्य राजनीतिक दल में विलय हो जाता और वह यह दावा करता है कि वह और उसके मूल राजनीतिक दल के अन्य सदस्य-

यथास्थित ऐसे अन्य राजनीतिक दल के या ऐसे विलय से बने रए राजनीतिक दल के सदस्य बन गए हैं, या

उन्होंने विलय स्वीकार नहीं किया है और एक अलग समूह के रूप में काम करने का विनिश्चिय किया है. 

सदन के किसी मूल राजनीतिक दल का विलय हुआ तभी समझा जाएगा जब संबंधित विधान दल के कम से कम दो तिहाई सदस्य ऐसे विलय के लिए सहमत हो गए हों. 

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तब दो तिहाई क्या होगा

इस बार विधानसभा चुनाव में बाबूलाल मरांडी, प्रदीप यादव और बंधु तिर्की पार्टी के सिंबल पर चुनाव जीते हैं. जाहिर है तीनों पार्टी के विधायक हैं. चुनाव परिणाम आने के बाद प्रदीप यादव को विधायक दल का नेता बनाया गया है. 

इसके साथ ही पार्टी ने हेमंत सोरेन की सरकार को समर्थन दिया है. हालांकि समर्थन पार्टी कभी भी वापस ले सकती है. और यह केंद्रीय अध्यक्ष के अधिकार में आता है. 

 

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रही बात दसवीं अनुसूचि की बाध्यता और शर्तों-नियमों की, तो बीजेपी में विलय के लिए जेवीएम के तीन में से कम से कम दो विधायकों की सहमति जरूरी होगी. 

जबकि बंधु तिर्की और प्रदीप यादव का कहना है कि वे बीजेपी में जाने के पक्षधर नहीं हैं. दोनों ने यह भी कहा है कि पार्टी के केंद्रीय अध्यक्ष बाबूलाल मरांडी से मिलकर उन्होंने अपनी स्थिति स्पष्ट कर दी है. 

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तब बंधु चुनौती दे सकते हैं

जेवीएम में विधायकों की संख्या तीन है. इनमें से एक बंधु तिर्की को पार्टी से निष्कासित कर दिया गया है. प्रदीप यादव भी बीजेपी में जाने को सहमत नहीं दिख रहे. इस स्थिति में अगर जेवीएम, बीजेपी में विलय करना चाहे, तो दसवीं अनुसूचि के तहत बाबूलाल मरांडी की सदस्यता क्या सुरक्षित रहेगी या खतरे में जाती दिखेगी, इस सवाल पर हमने झारखंड हाईकोर्ट के वरिष्ठ अधिवक्ता ए अल्लाम से चर्चा की.

ए अल्लाम कहते हैं दो दलबदल के लिए तिहाई सदस्यों का जाना जरूरी है. लेकिन बंधु तिर्की के खिलाफ इस कार्रवाई के बाद पार्टी फोल्डर में दो विधायक रह जाते हैं.

दो विधायकों में दो तिहाई नहीं किया जा सकता. लिहाजा इनमें से कोई एक दूसरे दल में जा सकता है. या कहें विलय कर सकता है. इसलिए कि अब आधे-आधे की बात होगी. 

लेकिन किसी सदस्य के लिए यह कदम दसवीं अनुसूचि से जुड़े कानून का उल्लंघन करने जैसा होगा. कह सकते हैं 'लॉ को डिफीट' करना. 

तब बंधु तिर्की या उनकी जगह दूसरा सदस्य, दल बदलने या विलय को चुनौती दे सकता है.

चुनौती देने के लिए पक्ष क्या हो सकता है, इस सवाल पर ए अल्लाम कहते हैं, पार्टी की गतिविधियां और वर्तमान परिस्थितियों का हवाला देते हुए वह बता सकता है कि दल से निष्कासन की कार्रवाई दूसरे दल में विलय करने के लिए या निरहर्ता से बचने के लिए निकाला गया रास्ता है. दलबदल की यह स्थिति सामने आने पर स्पीकर चाहें, तो स्वतः संज्ञान ले सकते हैं. 

नई कार्यकारिणी 

इस बीच 17 जनवरी को जेवीएम की नई कार्यकारिणी गठित की गई है. संभावना जताई जा रही है कि कार्यकारिणी की बैठक में विलय को लेकर कोई अहम फैसला लिया जा सकता है. जाहिर है पार्टी में सबकी निगाहें बैठक पर है. वैसे बैठक की तिथि तय नहीं है.   

हालांकि पार्टी की नई कार्यकारिणी अगर विलय के लिए सहमति जाहिर करती है, तब भी दो विधायकों की असहमति बाबूलाल मरांडी के रास्ते में  कानूनी अड़चन पैदा कर सकते है़ं. 

जेवीएम के प्रधान महासचिव अभय कुमार सिंह कहते हैं, नई कार्यकाकिरणी का गठन और विधायक बंधु तिर्की के निष्कासन को दलबदल या विलय की तैयारी/संभावना से जोड़कर क्यों देखा जा रहा है. बंधु तिर्की का निष्कासन निहायत चुनाव में पार्टी विरोधी गतिविधियों को लेकर किया गया है. जबकि इस मामले में उनसे जवाब मांगा गया था. तय समय पर जवाब नहीं देने के कारण केंद्रीय अध्यक्ष के निर्देश पर कार्रवाई की गई. 

अगली रणनीति पर नजर 

इस बीच जेवीएम के दोनों विधायक पार्टी के अगली रणनीति के साथ दसवीं अनुसूचि के उपबंधों की जानकारी लेने में जुटे हैं. मंगलवार को बंधु तिर्की के निष्कासन के बाद दोनों विधायकों के बीच इस बारे में चर्चा हुई है. सपा से अमर सिंह के निष्कासन के मामले में सुप्रीम कोर्ट के फैसले का भी हवाला दिया जा रहा है. 

गौरतलब है कि सुप्रीम कोर्ट ने अमर सिंह बनाम केंद्र सरकार के मामले में अपने फैसले में दसवीं अनुसूची के पारा 2 (1) का जिक्र करते हुए अपने आदेश में कहा है कि अगर दलबदल के मकदस से कोई सदस्य निलंबित या पार्टी से बाहर किए जाते हैं, तो भी दसवीं अनुसूचि के कानून प्रभावी होंगे. निष्कासन दल का मामला है, लेकिन सदन के अंदर उसकी सदस्यता के आधार पर दसवीं अनुसूचि लागू होगी. 

जेवीएम विधायक दल के नेता प्रदीप यादव कहते हैं, '' हम दोनों विधायक बीजेपी में जाने को तैयार नहीं हैं. दसवीं अनुसूचि का बारीकी से अध्ययन किया जा रहा है. दलबदल के लिए टू थर्ड विधायकों की सहमति या भूमिका कहीं ज्यादा अहम है.बंधु तिर्की कानूनी तौर पर मशविरा ले रहे हैं. बंधु तिर्की को भले ही पार्टी से निकाला गया है, लेकिनन सदन में उनकी सदस्यता तो है ही. इसलिए आगे क्या कुछ निकल कर सामने आता है, उसे देखा जाए.'' 


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