परत दर परतः अब तक बीजेपी से किसी बागी ने बदला लिया, तो वो हैं मधु कोड़ा और बाबूलाल

परत दर परतः अब तक बीजेपी से किसी बागी ने बदला लिया, तो वो हैं मधु कोड़ा और बाबूलाल
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नीरज सिन्हा ,   Mar 30, 2019

अलग राज्य गठन के बाद बीजेपी ने लोकसभा और विधानसभा चुनावों में कई लोगों के टिकट काटे और उम्मीदवार बदले हैं. लेकिन टिकट काटे जाने के बाद किसी बागी ने बीजेपी को अपनी पैठ दिखाई या चुनाव में तुरंत बदला लिया है, तो वो शख्स हैं पूर्व मुख्यमंत्री मधु कोड़ा.

इसी सिलिसले में एक और नाम बाबूलाल मरांडी का जोड़ा जा सकता है. फर्क इतना है है कि मधु कोड़ा का टिकट काटा गया था जबकि बाबूलाल मरांडी ने पार्टी छोड़ दी थी. 

यह कहानी इसलिए प्रासंगिक है कि इस बार के लोकसभा चुनाव में बीजेपी अपने कई सांसदों का टिकट काटती हुई दिख रही है. 

रांची से बेजीपी के सांसद रामटहल चौधरी खुलकर बीजेपी को चुनौती दे रहे हैं. और उन्होंने कहा कि हर हाल में चुनाव लड़ेंगे. जाहिर है बागी बनकर रामटहल के चुनाव लड़ने से उनकी ताकत भी परखी जाएगी.

उधर गिरिडीह में रवींद्र पांडेय क्या कदम उठाएंगे यह भी देखा जाना बाकी है. दरअसल बीजेपी ने यह सीट आजसू के खाते में दी है. 

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अलग राज्य गठन के बाद झारखंड लोकसभा के चौथे चुनाव में शामिल होगा. पंद्रह नवंबर 2000 को अलग राज्य का गठन हुआ था. अलग राज्य गठन के बाद 2004, 2009 और 2014 में आम चुनाव हुए हैं. जबकि झारखंड ने अब तक तीन बार विधानसभा का चुनाव देखा है. जबकि इस साल के नवंबर- दिसंबर में विधानसभा का भी चौथा चुनाव होगा.

ध्यान रहे अलग राज्य में हुए या होने वाले चुनावों की चर्चा की जा रही है. 

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अब बात मधु कोड़ा की. 2000 का विधानसभा चुनाव मधु कोड़ा बीजेपी से जीते थे. अलग राज्य गठन के बाद झारखंड में बीजेपी की सरकार में वे मंत्री बने.

2003 तक बाबूलाल मरांडी की सरकार में और इसके बाद अर्जुन मुंडा दोनों की सरकार में में कोड़ा को मंत्री बनाया गया. वे चाईबासा के जगन्नाथपुर से विधायक थे. 

बात 2005 की

2005 के चुनाव में बीजेपी ने मधु कोड़ा, रामजी लाल शारडा, चंद्रेश उरांव, दिनेश उरांव सरीखे विधायकों के टिकट काट दिए थे. इससे पहले रामजी लाल शारडा हटिया से चार बार चुनाव जीते थे. जाहिर है टिकट कटने से उन्हें झटका लगा. वे निर्दलीय हटिया के मैदान में उतर गए. 6327 वोट लाकर शारडा छठे नंबर पर रहे. हटिया से जीत कांग्रेस की हो गई. भाजपा भी हारी.

उधर जगन्नाथपुर विधानसभा से मधु कोड़ा निर्दलीय चुनाव लड़े. कोड़ा की जीत हुई. और इस सीट पर भाजपा के उम्मीदवार जवाहर बानरा 5895 वोट लाकर पांचवे नंबर पर रहे. 
मतलब कोड़ा ने बीजेपी को जोर का झटका धीरे से दिया. और इसके बाद कोड़ा अर्श पर जाते रहे. 

बात 2006 की

वैसे 2005 में राज्य में बीजेपी की सरकार बनी. अर्जुन मुंडा मुख्यमंत्री बने. इससे पहले नौ दिनों की शिबू सोरेन की सरकार को सत्ता से हटाने में आजसू प्रमुख सुदेश महतो ने बाजीगर की भूमिका निभाई और बीजेपी के हाथों सत्ता वापस लौटाई. हालांकि बहुमत के लिहाज से निर्दलीयों का समर्थन लेना पड़ा. समर्थन देने के बदले मधु कोड़ा फिर मंत्री बने. 

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कुछ ही महीनों बाद 2006 में मधु कोड़ा, एनोस एक्का, हरिनारायण राय समेत कुछ विधायकों ने अर्जुन मुंडा सरकार की तख्ता पलट दी.

इसके बाद एक निर्दलीय विधायक की हैसियत से मुख्यमंत्री बनने का मधु कोड़ा ने रिकॉर्ड बनाया. यूपीए के घटक दलों ने सरकार बनाने में उनका साथ दिया. हालांकि बाद में झारखंड मुक्ति मोर्चा ने कोड़ा की सरकार पलट दी और शिबू सोरेन मुख्यमंत्री बन गए. 

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बात 2009 की

इधर 2009 के लोकसभा चुनाव में मधु कोड़ा चाईबासा से निर्दलीय चुनाव लड़े और बीजेपी के बड़कुंअर गगराई को हराया. मतलब चार सालों में सिंहभूम की राजनीति में कोड़ा प्रभावी नेता के तौर पर उभरे. अलबत्ता 2009 के विधानसभा चुनाव में उनकी पत्नी गीता कोड़ा जगन्नाथपुर विधानसभा सीट से जीत गईं.

2014 में भी गीता कोड़ा इसी विधानसभा सीट से चुनाव जीतीं.

इस दौरान मधु कोड़ा को चुनाव लड़ने के लिए अयोग्य ठहराए जाने की वजह से गीता कोड़ा 2014 का लोकसभा चुनाव भी चाईबासा से लड़ीं. गीता कोड़ा ने बीजेपी को सीधी चुनौती दी. वे दूसरे नंबर पर रहीं. इस बार के लोकसभा चुनाव में कांग्रेस गीता कोड़ा को उम्मीदवार बनाने जा रही है. लिहाजा समीकरणों के उलटफेर होने के आसार बढ़ गए हैं. 

अब किस हाल में कोड़ा

लगभग दस सालों से केस-मुकदमों से जूझ रहे मधु कोड़ा फ़िलहाल सिंहभूम में कांग्रेस की जमीन मजबूत करने में जुटे हैं. इससे पहले वे आयकर विभाग और प्रवर्तन निदेशालय की कार्रवाई का सामना करते रहे हैं. मनी लॉड्रिंग के केस में भी वे फंस चुके हैं. पहली दफा साल 2009 में तीस नवंबर को उन्हें गिरफ्तार किया गया था.

 जबकि उनके चुनाव लड़ने के रास्ते अब सालों के लिए बंद हो चुके हैं. 16 दिसंबर 2017 को कोयला घोटाले में उन्हें तीन साल की सजा सुनाई गई है.

साल 2009 में लोकसभा चुनाव को लेकर उन्होंने चुनाव में हुए खर्चे की गलत जानकारी दी. जांच के बाद चुनाव आयोग ने उनके चुनाव लड़ने पर तीन साल का प्रतिबंध लगा दिया है. मतलब मधु कोड़ा फर्श से अर्श पर आते रहे. 

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वरिष्ठ पत्रकार चंदन मिश्रा कहते हैं कि कई केस मुकदमे में फंसने के बाद भी मधु कोड़ा चाईबासा इलाके में अपनी जमीनी पैठ बनाने में सफल रहे. अगर वे गलतियां नहीं करते और सब्र रखते, तो राज्य में आदिवासियों के बड़े और अगली कतार के नेता के तौर पर खुद को स्थापित कर सकते थे. वैसे बाकी नेता दूध के धुले हैं इसकी गारंटी नहीं दी जा सकती, लेकिन कोड़ा लगातार फंसते चले गए. जाहिर ही उनकी राजनीति फर्श से अर्श पर आती रही. 

अब कोड़ा दंपती के लिए राहत हो सकती है कि गीता कोड़ा  कम समय में सिंहभूम की राजनीति में पहचान बनाने में सफल होती दिख रही है. विधानसभा में भी वे सुलझे तरीके से सवाल उठाती रही हैं. और विवाद से बचना भी चाहती हैं. कांग्रेस, गीता कोड़ा को चाईबासा से चुनाव लड़ाती है, तो बीजेपी के सामने बड़ा दांव हो सकता है. 

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बाबूलाल मरांडी की चुनौती

2004 के लोसभा चुनाव में बाबूलाल मरांडी झारखंड में बीजेपी से अकेले जीतने वाले उम्मीदवार थे. कोड़रमा से चुनाव जीतकर उन्होंने बीजेपी की लाज बचाई थी. जबकि तेरह सीटों पर यूपीए के उम्मीदवार जीते थे.

इस बीच बाबूलाल मरांडी बीजेपी में असहज महसूस करते रहे. दरअसल 2003 में सहयोगी दलों के द्वारा मुख्यमंत्री पद से हटाये जाने के बाद से ही वे बीजेपी के रुख से खुश नहीं थे. 

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इस बीच 2006 में बाबूलाल मरांडी ने बीजेपी छोड़ दी. और झारखंड विकास मोर्चा का गठन किया. 2006 में कोडरमा लोकसभा का उपचुनाव वे जीत गए. बीजेपी को उन्होंने शिक्सत दी. इसके बाद फिर 2009 का चुनाव बाबूलाल मरांडी कोडरमा से ही जीते. उन्होंने फिर बीजेपी को हराया. 

2014 के चुनावों में बाबूलाल मरांडी को कई हार का सामना करना पड़ा. विधानसभा चुनाव में वो एक साथ दो सीटों से हार गए. हालांकि जेवीएम से आठ लोग चुनाव जीते. इनमें छह लोग चुनाव परिणाम आने के तुरंत बाद बीजेपी में शामिल हो गए. इन हालात में मरांडी को बड़े सेटबैक का सामना करना पड़ा. 

बीजेपी में इसे कोड़रमा में 2006 और 2009 के चुनावों में हार का बदला के तौर पर भी देखा गया. बीजेपी के नेता अक्सर कहते भी रहे हैं कि बाबूलाल मरांडी के दिन लद गए हैं . लेकिन इन से मरांडी घबराते नहीं दिखते. 

हालांकि उनके बीजेपी में पुनः शामिल होने या पार्टी के मर्जर को लेकर जब- तब अटकले लगती रही. कहा- सुना यह भी  जाता है कि बीजेपी के कई शीर्ष नेताओं ने उन्हें मनाने का प्रयास किया. लेकिन वे डिगे नहीं हैं. और थके भी नहीं हैं. इस बार फिर लोकसभा का चुनाव विपक्षी दलों का साथ लेकर लड़ रहे हैं. 

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वरिष्ठ पत्रकार चंदन मिश्रा कहते हैं कि बीजेपी से नाता तोड़ने के बाद इन तेरह सालों में बाबूलाल मरांडी ने बेशक तमाम उतार- चढ़ाव का सामना किया, लेकिन झुके और डिगे नहीं.

जाहिर है इस बार का चुनाव उनके और उनकी पार्टी के लिए बेहद महत्वपूर्ण है. उन्होंने दिल से बीजेपी की राजनीति की और अब बीजेपी छोड़ने के बाद जेवीएम को भी दिल से ही मजबूती देने में जुटे हैं.

लेकिन किसी पार्टी की ताकत और पैठ चुनावों में सफलता से ही आंकी जाती है. 


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