रांची में सीवरेज-ड्रेनेजः मंत्री सरयू राय ने उछाला मेनहर्ट का काम, बोले, इस हमाम में नंगे हैं कई नाम

रांची में सीवरेज-ड्रेनेजः मंत्री सरयू राय ने उछाला मेनहर्ट का काम, बोले, इस हमाम में नंगे हैं कई नाम
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पीबी ब्यूरो ,   Jul 20, 2019

झारखंड की राजधानी रांची में सीवरेज- ड्रेनेज को लेकर सालों से विवाद और आरोप- प्रत्यारोप के बीच सरकार के मंत्री सरयू राय ने उस प्रोजेक्ट को लेकर परामर्शी कंपनी मेनहर्ट का नाम उछाल दिया है. उन्होंने कहा है कि अनेक जिम्मेदार उच्चपदस्थ पदधारी मेनहर्ट के हमाम में नंगे पाए गए हैं.

इसके साथ ही उन्होंने जेएमएम के कार्यकारी अध्यक्ष और नेता प्रतिपक्ष हेमंत सोरेन भी पर निशाना साधा है.

सरयू राय ने कहा है कि सीवरेंज- ड्रेनेज की बदहाली के लिए मंत्री सीपी सिंह को जिम्मेदार ठहराया जाना उचित नहीं है. जबकि हेमंत सोरेन ने नगर विकास मंत्री रहते हुए इस मामले में में महत्वपूर्ण तथ्यों की अनदेखी की थी.

और अयोग्य साबित हो चुके मेनहर्ट परामर्शी को 17 करोड़ रूपए के बकाये भुगतान करने के लिये कैबिनेट से संकल्प पारित कराया. जबकि इसके पहले निगरानी (तकनीकी कोषांग) की जांच में यह साबित हो चुकी थी कि राजधानी रांची के प्रस्तावित सीवरेज- ड्रेनेज सिस्टम का डीपीआर बनाने और इसके क्रियान्वयन का पर्यवेक्षण करने के लिये मेनहर्ट परामर्शी की नियुक्ति अवैध थी और मेनहर्ट इस कार्य के लिये तकनीकी रूप से अयोग्य था. 

निगरानी आयुक्त 

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सरयू राय ने बताया है कि 6 अगस्त 2010 को निगरानी (तकनीकी कोषांग) के मुख्य अभियंता ने तत्कालीन निगरानी आयुक्त राजबाला वर्मा को जांच रिपोर्ट सौंपीं थी. इसमें कहा गया था कि ‘‘इस निविदा में प्रकाशन से लेकर निविदा निष्पादन की प्रक्रिया त्रुटिपूर्ण रही है और तकनीकी कारणों से मेनहर्ट अयोग्य है.’’ 

राजबाला वर्मा ने जांच प्रतिवेदन पर अग्रेतर कार्रवाई करने के बदले में 21 फरवरी 2011 को संचिका नगर विकास विभाग में भेज दिया. इसके बाद 13 जुलाई 2011 को नगर विकास विभाग ने कैबिनेट से संकल्प पारित कराकर मेनहर्ट को 17 करोड़ रूपये के बकाये का भुगतान कर दिया. 

झारखंड हाइकोर्ट 

मंत्री ने बताया है कि इस बारे में नगर विकास विभाग ने झारखंड उच्च न्यायालय के 25 अप्रैल 2011 के निर्णय के विरूद्ध झारखंड उच्च न्यायालय की खंडपीठ में अपील दायर नहीं करने का निर्णय लिया. इससे स्पष्ट है कि नगर विकास मंत्री रहते हुए हेमंत सोरेन ने निगरानी जांच में अयोग्य साबित हो चुके मेनहर्ट को न केवल 17 करोड़ रूपया का भुगतान कर दिया बल्कि इसके विरूद्ध उच्च न्यायालय की खंडपीठ में अपील दायर करने से भी मना कर दिया.

दूसरी ओर  सीपी सिंह ने वर्तमान सरकार में नगर विकास मंत्री बनने के बाद मेनहर्ट को पर्यवेक्षण के काम से हटा दिया. 

जांच का विषय 

रांची में सीवरेज- ड्रैनेज की बदहाली का मुख्य कारण अयोग्य होने के बावजूद परामर्शी एवं पर्यवेक्षक के तौर पर मेनहर्ट की बहाली करने और इससे निर्माण कार्य का पर्यवेक्षण कराना है. यह जांच का विषय है कि मेनहर्ट ने जो डीपीआर बनाया था वह डीपीआर रांची के सिवरेज-ड्रेनेज प्रणाली के क्रियान्वयन में कितना कारगार सिद्ध हुआ और निर्माण कार्य के दौरान इसमें कितना परिवर्तन करना पड़ा. 

विडंबना देखिए

मंत्री सरयू राय ने कहा है कि विडंबनी देकिए कि एक ओर रांची के सीवरेज-ड्रेनेज का काम मेनहर्ट के पर्यवेक्षण में चल रहा था तो दूसरी ओर 2015 में रांची में पथ निर्माण विभाग भी अलग से ड्रेनेज बना रहा था. जबकि पथ निर्माण विभाग द्वारा 140 करोड़ रूपए खर्च किए जाने के बाद भी ड्रेनेज सिस्टम कामयाब नहीं हुआ.

सवाल ये भी इउठता है कि पथ निर्माण विभाग द्वारा बनाया गया ड्रेनेज सिस्टम मेनहर्ट के डीपीआर के अनुरूप था या नहीं? यह महज संयोग नहीं हो सकता कि जिन राजबाला वर्मा ने निगरानी (तकनीकी कोषांग) की जांच में दोषी पाये गये मेनहर्ट पर कार्रवाई करने की संचिका निगरानी आयुक्त के रूप में दबा दिया उन्हीं राजबाला वर्मा ने पथ निर्माण सचिव के नाते रांची में स्वतंत्र ड्रेनेज सिस्टम का निर्माण भी करा दिया.

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साथ ही यह उल्लेख अप्रसांगिक नहीं होगा कि 16 अक्टूबर 2009 से 28 अगस्त 2011 के बीच निगरानी ब्यूरो के तत्कालीन पुलिस महानिरीक्षक एमवी राव ने झारखंड उच्च न्यायालय के निदेशानुसार आधे दर्जन से अधिक बार निगरानी आयुक्त से अग्रेतर कार्रवाई के लिये निर्देश मांगा, लेकिन  यह निर्देश उन्हें नहीं मिला.  

गौरतलब है कि मेहर्ट को बतौर परामर्शी नियुक्त किए जाने के मामले में निविदा की चयन प्रक्रिया पर भी पहले सवाल उठते रहे हैं. 2005-2006 में विधानसभा में भी यह मामला उछला था.  


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