पद्मश्री दिगंबर हांसदा नहीं रहे, छोड़ गए संताली भाषा में उल्लेखनीय योगदान की अमिट छाप

पद्मश्री दिगंबर हांसदा नहीं रहे, छोड़ गए संताली भाषा में उल्लेखनीय योगदान की अमिट छाप
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पीबी ब्यूरो ,   Nov 19, 2020

जमशेदपुर के करनडीह स्थित लाल बहादुर शास्त्री मेमोरियल कालेज के पूर्व प्राचार्य और पद्मश्री दिगंबर हांसदा 81 साल की उम्र में निधन हो गया है.

दिगंबर हांसदा को संताली भाषा और साहित्य में उल्लेखनीय योगदान के लिए 2018 में पद्मश्री पुरस्कार मिला था.

प्रो दिगम्बर हांसदा का जन्म जमशेदपुर के समीप गांव दोवापानी में एक आदिवासी कृषक परिवार में हुआ था. फिलहाल वे सारजोम टोला, करनडीह, जमशेदपुर में निवास कर रहे थे. 

उनके निधन की खबर पर केंद्रीय मंत्री अर्जुन मुंडा समेत कई संगठनों और शिक्षाविदों ने शोक प्रकट किया है. पूर्व मुख्यमंत्री रघुवर दास संवेदना प्रकट करने उनके घर पहुंचे हैं. साथ ही उन्होंने सरकार से राजकीय सम्मान के साथ उन्हें अंतिम विदाई देने का आग्रह किया है. 

शिक्षा और सेवा में लंबा सफर

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प्राथमिक शिक्षा राजदोहा मिडिल स्कूल से हुई. जबकि उन्होने 1963 में राँची यूनिवर्सिटी से राजनीति विज्ञान में स्नातक और 1965 में एमए किया. उसके बाद टिस्को आदिवासी वेलफेयर सोसायटी से जुड़ गए. 

दिगंबर हांसदा ने आदिवासियों के सामाजिक एवं आर्थिक उत्थान के लिए पश्चिम बंगाल और ओडिशा में भी काम किया. प्रो हांसदा संथाल साहित्य अकादमी के संस्थापक सदस्य भी रहे. 

ऑल इण्डिया संथाली फिल्म एसोसिएशन द्वारा प्रो दिगंबर हांसदा को लाईव टाइम अचीवमेंट अवार्ड प्रदान किया गया है.

वर्ष 2009 में निखिल भारत बंग साहित्य सम्मेलन ने उन्हे स्मारक सम्मान से सम्मानित किया वहीँ भारतीय दलित साहित्य अकादमी नई दिल्ली द्वारा उन्हें डॉ अंबेदकर फेलोशिप प्रदान किया जा चुका है.

वे केंद्र सरकार के ट्राईबल अनुसंधान संस्थान एवं साहित्य अकादमी के भी सदस्य रहे और उन्होंने सिलेबस की कई पुस्तकों का देवनागरी से संथाली में अनुवाद किया.

इसके अलावा उन्होंने इंटरमीडिएट, स्नातक और स्नातकोत्तर के लिए संथाली भाषा का कोर्स संग्रहित किया। उन्होंने भारतीय संविधान का संथाली भाषा की ओलचिकि लिपि में अनुवाद करने के साथ ही कई पुस्तकें भी लिखीं.

शिक्षाविद, साहित्यकार, समाजसेवी होने के साथ वे बेहद नेक दिल इंसान भी थे. प्रो हांसदा ने आदिवासी भाषा साहित्य के क्षेत्र में झारखण्ड की अलग पहचान दिलाई.  

उनकी कृतियाँ - सरना गद्य-पद्य संग्रह, संथाली लोककथा संग्रह, भारोतेर लौकिक देव देवी, गंगमाला , संथालों का गोत्र काफी लोकप्रिय रही हैं. उनके पास किताबों और शोध का खासा संग्रह भी रहा है. 


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