कोई अपराजेय नहीं...

कोई अपराजेय नहीं...
योगेश किसलय, वरिष्ठ पत्रकार ,   Dec 16, 2018

प्रसिद्ध भौतिकशास्त्री एलेन गूथ नौकरी की फिराक में थे. एक परीक्षा मे बैठे, तो भौतिकी का ही एक सवाल उन्हें परेशान करने लगा. काफी उलझन के बाद उन्होंने जवाब में लिखा था कि इस सवाल का सबसे सटीक जवाब होगा कि यह नौकरी मुझे नही मिलेगी. एलेन गूथ आज भौतिकी के शीर्ष वैज्ञानिकों में एक हैं. इतनी काबिलियत के बाद भी उन्होंने सहजता से स्वीकार किया कि कोई व्यक्ति सर्वज्ञानी और अजेय नही है.

इसी संदर्भ में बीजेपी को भी समझना होगा कि हर सवाल का जवाब उसके पास नहीं है. और वह अपराजेय भी नहीं है. यह कमोबश सामान्य सिद्धांतों का परिणाम है. साथ ही राजनैतिक चरित्र का स्वाभाविक सिद्धांत भी. 

11 दिसंबर को चुनावी नतीजों के सामने आने के बाद राजनैतिक पंडित अलग-अलग तरीके से समीक्षा कर रहे हैं. टीवी चैनलों में बहस का दौर जारी है. कई आलेख लिखे जा रहे हैं. कांग्रेस अपनी जीत की वजह बता रही है, तो बीजेपी हार की समीक्षा करने में जुटी है. दरअसल ये ऐसा परिणाम है, जो भारतीय राजनीति के इतिहास में याद रखा जाएगा. उदाहरण के तौर पर भी गिनाया जाएगा. 

 तीन राज्यो में बीजेपी की हार के बाद जिस तरह के आंकड़े और तस्वीरें सामने हैं उसमें कहा जा सकता है कि इस पराजय की पटकथा पहले से तय थी. और इसका अंदाजा बीजेपी के रणनीतकारों को था, लेकिन उन्होंने बहुत परवाह नहीं की होगी. दरअसल यह स्वभाविक राजनैतिक सिद्धांत है.  

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वैसे भी परिवर्तन के दो आयाम होते हैं. एक सकारात्मक और दूसरा स्वाभाविक. जिस तरह केंद्र में नरेंद्र मोदी और यूपी में योगी आदित्यनाथ का आना सकारात्मक बदलाव का नतीजा था उसी तरह छत्तीसगढ़ और राजस्थान में सकारात्मक बदलाव समझा जा सकता है. 

इन नतीजों के केंद्र में देखा जाना चाहिए - कहीं अहंकार, कहीं अति आत्मविश्वास, कहीं एकछत्र लंबे शासन से लोगों का उबना. और ये कारण बहुत स्वाभाविक हैं. दरअसल सत्ता हासिल होने के बाद अहंकार का होना, दुनिया को मुट्ठी में रखने का भरम पालना आम स्वभाव है. तब इससे उपर होना राजनीति में परमहंस होना ही कहा जाएगा. 

पहचान की लड़ाई 

थोड़ा पीछे लौटते हैं. बंगाल में दो दशक से अधिक शासन करने वाली कैडर आधारित वामपंथी पार्टियां आज पहचान और पैर जमाने की लड़ाई लड़ रही हैं. ध्यान रहे 1984 में कांग्रेस को जब 404 सीटों पर जोरदार सफलता मिली थी, तो तेलुगु देशम पार्टी संसद में दूसरी बड़ी और ताकतवर पार्टी बनकर उभरी थी. एनटी रामा राव और फिर उनके दामाद चंद्रबाबू नायडू इस पार्टी को नई उंचाइयों पर लेकर गए. एक दौर था जब चंद्रबाबू नायडू को युवा राजनीतिकों में सबसे तेज माना जाता था. बाद में तेलुगु देशम पार्टी का विस्तार भी किया गया. 

वक्त के साथ टीडीपी एनडीए- यूपीए दोनों फोल्डर में अपनी मजबूत उपस्थिति दर्ज कराती रही है. तेलुगु नेताओं को लगता था कि वे धीरे -धीरे अजेय हो जाएंगे. लेकिन ताजा परिदृश्य सामने है. तेलंगाना के परिणाम इसके संकेत हैं कि वहां की जनता ने टीडीपी को सिर्फ आंध्र प्रदेश तक ही सीमित कर दिया है. 1995 के बाद बिहार में भी एक दौर आया कि लालू प्रसाद और उनकी पार्टी को जनता ने औकात बताई थी. भारतीय राजनीति में इस किस्म के और कई उदारहण हैं.  
 
राज्यों से इतर राष्ट्रीय परिप्रेक्ष्य में देखें, तो कांग्रेस ही पिछले पांच दशकों में खुद को अपरिहार्य समझने लगी थी लेकिन एक ही बार मे ही इतनी दुर्गति  हुई कि मौका ताड़कर बीजेपी ने कांग्रेस मुक्त भारत बनाने का जुमला खड़ा कर दिया. 

ताजा परिणाम 

अब मध्य प्रदेश का हाल समझें. यहां शिवराज सिंह ने लगातार 15 सालों तक शासन किया. इन परिस्थितियों में मामूली अंतर से बीजेपी की हार को स्वाभाविक बदलाव के तौर पर देखा जा सकता है. यहां जनता यह आजमाना चाहती थी कि क्या शिवराज सरकार से भी बेहतर कोई होगा ? जनता का यही धीरे से झटका बीजेपी को जोर से लगा। इसलिए कुछ राजनैतिक पंडित कहते रहे हैं कि यह परिणाम कांग्रेस की जीत नही केवल बीजेपी की हार भर है. जनता जानती है कि चमत्कार जैसा कुछ नहीं होगा, लेकिन आजमा कर देखा जाए. 

राजस्थान में साल 2013 में प्रचंड बहुमत से जीत कर सत्ता में आई बीजेपी की दीवार इस बार अगर भरभरा कर गिर गई, तो सवाल भी लाजिम है कि जनता का मोह कैसे भंग हुआ. हालांकि चुनाव की तिथि नजदीक आने के साथ बीजेपी ने एंटी इंकमबसी को पाटने की भरसक कोशिशें जरूर की थी, लेकिन अंहकार के खिलाफ अंदर ही अंदर चलती हवाओं का असर चुनाव परिणाम सामने आने के बाद दिखा. 

 किसान, आरक्षण, भितरघात जैसे मुद्दों को संभालना भी वसुंधरा राजे सिंधिया के लिए मुश्किल पड़ा. साथ ही दिल्ली और जयपुर के बीच जो दूरी बन रही थी, उस पर केंद्रीय नेतृत्व बहुत टकराव लेने से बचता रहा. गुंजाइश है कि नेतृत्व ने किसी बदलाव से बचने की कोशिश इसलिए भी की होगी कि राज्य का रैजनीतिक गणित गड़बड़ न हो जाए. लेकिन शीर्ष नेतृत्व को वक्त और जनता के मिजाज के हिसाब से नकेल कसकर रखने की महारत तो दिखानी ही पड़ेगी. यह भी बताना पड़ेगा कि देश की बड़ी आबादी ने अगर उसे जनमत दिया है. तो राज्यों की जिम्मेदारी जिन पर है वे भी जनभावना का कद्र करें.   

छत्तीसगढ़ पर गौर करें, तो लगता है कि रमन सिंह अति आत्मविश्वास के शिकार हुए. रमन सिंह भी को भी जोगी फैक्टर और चावल वाले बाबा की चमत्कारी पहचान की चमक के वहम से बाहर  निकलना था. फिर आदिवासियों, दलितों, किसानों की गोलबंदी भी रमन सरकार के खिलाफ जाता दिख रहा है. केंद्रीय और राज्य के नेतृत्व दोनों को ये साझा तौर पर इन फैक्टर को समझने की दरकार है. तब इन परिणामों से इनकार नहीं किया जाना चाहिए कि  बीजेपी में प्रदेशों के नेता भी हारे हैं. 

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तीन राज्यों के चुनाव परिणाम के बाद अब झारखंड, उत्तराखंड और हरियाणा सरीखे राज्यों को लेकर कई कयास लगाए जाने लगे हैं. विपक्ष भी मानकर चल रहा है कि बीजेपी में सत्ता का गुमान ही उसका बेड़ा पार लगाएगा. 

आगे 2019 के आम चुनाव से पहले इन तीन राज्यो में कांग्रेस की सरकार प्रशासननिक ढांचा में अपने हिसाब से फेरबदल करना चाहेगी.. तब बीजेपी अपनी रणनीति में तब्दीली करेगी. लेकिन इस हार पर ज्यादा हाय तौबा मचाने से बेहतर है कि सहजता से मान लीजिए कि यह आपके वश की बात नही बल्कि सामान्य सिद्धांतो का ही परिणाम है. अच्छा होगा कि बीजेपी सहजता और खुलूस से स्वीकार करके सोचे कि कोई भी अपराजेय नही है तभी उसे तसल्ली होगी.

( लेखक चुनावों में तीन राज्यों के दौरे पर भी थे ) 


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