क्या विधायक प्रदीप यादव की धार खत्म कर रही है कांग्रेस?

क्या विधायक प्रदीप यादव की धार खत्म कर रही है कांग्रेस?
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पीबी ब्यूरो ,   Sep 27, 2020

इस साल की वो तारीख थी 17 फरवरी. रांची में बाबूलाल मरांडी बीजेपी में शामिल होने के साथ अपनी पार्टी झारखंड विकास मोर्चा का बीजेपी में विलय कर रहे थे. बीजेपी के राष्ट्रीय अध्यक्ष (तब) अमित शाह बाबूलाल को शामिल कराने रांची आए थे. उधर बाबूलाल मरांडी की पार्टी के दो कद्दावर विधायक प्रदीप यादव और बंधु तिर्की दिल्ली जाकर कांग्रेस में शामिल हो रहे थे. मुमकिन हो कि उन पलों प्रदीप यादव ने यही सोचा होगा कि झारखंड में सत्तारूढ़ कांग्रेस के साथ उनकी नई राजनीतिक पारी नए तेवर के साथ शुरू होगी.

लेकिन आठ महीने में अंदर-बाहर जो परिस्थितियां बनी है, उसमें पूछा जा सकता है कि क्या कांग्रेस, विधायक प्रदीप यादव की धार खत्म कर रही?

जबकि कांग्रेस का हाथ थामने के बाद कयास लगाए जा रहे थे कि आदिवासी चेहरा होने के नाते पार्टी बंधु तिर्की को प्रदेश अध्यक्ष और प्रदीप यादव को मंत्रिमंडल में शामिल कर सकती है.  

लेकिन दल-बदल के पेच में प्रदीप यादव और बंधु तिर्की के साथ महीनों से मुश्किलें बनी है कि अब तक विधानसभा में उन्हें कांग्रेस विधायक के तौर पर मान्यता नहीं दी गई है.

हालांकि विधानसभा ने बाबूलाल मरांडी को भी फिलहाल बीजेपी का विधायक नहीं माना है. 

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जबकि बीजेपी ने 24 फरवरी को उन्हें विधायक दल का नेता चुना है और विधानसभा को पत्र देकर नेता प्रतिपक्ष की मान्यता देने को कहा है. 

चुनाव आयोग ने भी जेवीएम का बीजेपी में विलय को सही ठहराया है.

पिछले 19 जून को राज्यसभा की दो सीटों के लिए हुए चुनाव के सिलसिले में भी चुनाव आयोग ने बाबूलाल मरांडी को बीजेपी विधायक के तौर पर सूचीबद्ध करने को कहा था. तब वे बीजेपी के वोटर थे. 

इधर प्रदीप यादव और बंधु तिर्की को झारखंड विधानसभा का सदस्य माना गया, लेकिन कांग्रेस का नहीं.

हालांकि इन दोनों विधायकों ने कांग्रेस उम्मीदवार के पक्ष में ही वोट किए. वैसे कांग्रेस उम्मीदवार की हार हुई. इसलिए कि कांग्रेस के पास आंकड़े नहीं होने के बाद भी उसने उम्मीदवार उतारे थे. 

जाहिर है दोनों विधायकों के सामने फिलहाल बड़ी मुश्किल यह है कि सत्तारूढ़ दल के साथ रहते हुए भी कांग्रेस उनकी सदस्यता को लेकर गंभीर दिखाई नहीं पड़ती. 

अब बात बंधु तिर्की की. कांग्रेस में रहकर भी वे पुराने दिनों की राह पर चलते दिखाई पड़ रहे हैं.

फिलहाल उन्होंने अंचल कार्यालयों में अफसर- जमीन माफया गठजोड़ और जमीन की लूट के खिलाफ आंदोलन का रुख अख्तियार कर लिया है. 

इसमें कई आदिवासी संगठन उनका साथ दे रहे हैं. कई मौके पर वे रोजगार और नियुक्तियों को लेकर सरकार को पत्र लिखते रहे हैं. 

प्रदीप की पहचान 

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झारखंड में कांग्रेस की राजनीति पर गौर करें, तो वैसे भी जो विधायक या मंत्री हैं, उन्हें पता है कि प्रदीप यादव को ज्यादा तवज्जो मिला, तो उनका कद छोटा पड़ता जाएगा. 

दरअसल प्रदीप यादव को संगठन संभालने का अनुभव रहा है. सरकार में मंत्री भी रहे हैं. 

योजनाओं और फाइलों की पकड़ है. और दस्तावेजों के साथ नौकरशाही या सरकार से सवाल- जवाब या पत्राचार करते हैं. 

 पूर्व की सरकारों को सदन और सदन के बाहर घेरते रहने के चलते भी उन्हें तेवर वाला माना जाता है. 

अब सत्तारूढ़ दल के साथ होने के चलते वे सरकार का बचाव करने और प्रमुख विपक्षी दल बीजेपी के हमलों का जवाब निकालने के लिए सामने आते रहे हैं.

इन दिनों कृषि बिल को लेकर प्रदीप यादन बीजेपी और केंद्र सरकार पर वार करते नजर आ रहे हैंं. 

प्रदीप यादव लगातार चार बार पोड़ैयाहाट विधानसभा क्षेत्र से चुनाव जीते हैं.

वे पहले बीजेपी में थे. बाबूलाल मरांडी ने 2006 में जब बीजेपी छोड़ी थी, तो प्रदीप यादव भी बाबूलाल के साथ हो चले थे. 

लगभग 14 साल बाबूलाल के साथ वे जेवीएम की अगली कतार में शामिल रहे और बीजेपी से दो- दो हाथ करते रहे. 2014 के चुनाव में जेवीएम से आठ लोग चुनाव जीते थे. 

इनमें छह विधायक नतीजे आने के कुछ ही दिन बाद बीजेपी में शामिल हो गए थे. प्रदीप यादव और प्रकाश राम जेवीएम में रह गए. 2019 के विधानसभा चुनाव के वक्त प्रकाश राम भी बीजेपी में चले गए. 

2019 के नतीजे आने के बाद बाबूलाल मरांडी की बीजेपी से नजदीकी बढ़ी और उन्होंने पार्टी का विलय का फैसला लिया.

इस दौरान प्रदीप यादव और बंधु तिर्की को पार्टी विरोधी गतिविधियों के आरोप में दल से बाहर किया गया.

इससे बाबूलाल के साथ इनके संबंधों में खटास भर आए.. और फिर वह वक्त भी आया जब  दोनों के बीच हिसाब खत्म होने के साथ राहें भी अलग हो गई. 

आलाकमान की दिलचस्पी

मार्के की बात यह भी कांग्रेस आलाकमान ने इन दोनों विधायकों को पार्टी में शामिल कराने के लिए जितनी दिलचस्पी दिखाई थी, बाद में असर कम पड़ता गया.

2019 में कांग्रेस 16 सीटों पर चुनाव जीती. बेरमो के विधायक राजेंद्र सिंह के निधन के बाद अभी उसके पास 15 विधायक हैं. 

प्रदीप यादव और बंधु जब कांग्रेस में शामिल हो रहे थे, तो पार्टी को इसका भी गुमान हुआ कि अब उसके 18 विधायक होंगे और सत्ता में जेएमएम के बहुत दबाव में वह नहीं रहेगी. 

17 फरवरी को आधिकारिक तौर पर कांग्रेस में शामिल होने से पहले 23 जनवरी को प्रदीप यादव और बंधु तिर्की ने दिल्ली में कांग्रेस की राष्ट्रीय अध्यक्ष सोनिया गांधी और राहुल गांधी से मुलाकात की थी.

इस मौके पर कांग्रेस के राष्ट्रीय महासचिव केसी वेणुगोपाल और झारखंड कांग्रेस के प्रभारी आरपीएन सिंह मौजूद थे. जाहिर है इस मुलाकात के मायने निकाले जाने लगे थे.

अंदरखानेे की खबर है कि कांग्रेस नेतृत्व ने इन नौ महीने में कभी प्रदीप यादव और बंधु तिर्की का हाल नहीं जाना. दोनों विधायकों को यह खटकता भी रहा है. 

उधर बीजेपी सदन के अंदर और बाहर बाबूलाल को नेता प्रतिपक्ष की मान्यता दिए जाने के सवाल पर शुरू से मुखर रही है. अलबत्ता बीजेपी ने स्पीकर और सरकार दोनों को इस सवाल पर निशाने पर लेती रही है. 

लेकिन कांग्रेस ने कभी शीर्ष स्तर पर यह नहीं कहा कि प्रदीप यादव और बंधु तिर्की को भी पार्टी का सदस्य माने जाने के मामले को और नहीं लटकाया जाए. 

हेमंत सोरेन की सरकार में कांग्रेस के चार मंत्री हैं. इनमें रामेश्वर उरांव मंत्री के साथ प्रदेश अध्यक्ष और आलमगीर आलम विधायक दल के नेता की जवाबदेही भी संभाल रहे हैं. 

इधर प्रदीप यादव ने कांग्रेस का हाथ थामा है तो कई मौके पर सरकार का उन्हें बचाव भी करना होता है. 

हालांकि बचते- बचाते भी वह हिसाब मांग लेते हैं. लेकिन वजन के हिसाब से कांग्रेस में उनका कद छोटा पड़ता जा रहा है. 

विधानसभा के मानसून सत्र में अनुपूरक बजट के कटौती प्रस्ताव के समर्थन में बोलते हुए उन्होंने सरकार से कुछ जरूरी जवाब भी मांगे.

लेकिन उन्हें जानने- सुनने वालों को यह पता चल जाता है कि प्रदीप यादव की धार बदली सी नजर आने लगी है. 

और प्रदीप यादव के सामने धर्म संकट यह है कि वे अपनी पीड़ा बता नहीं पाते. हालांकि उनके जेहन में कई सवाल जरूर चलते रहते हैं. 

इससे पहले 17 फरवरी को कांग्रेस का हाथ थामने के बाद उन्होंने ट्वीट किया था, ''अंदाज़ कुछ अलग है मेरे सोचने का. सब को मंज़िल का शौक है मुझे रास्ते का.''

लेकिन कुछ ही महीनों में कांग्रेस की गलियों में वे कांटों का सामना करते दिखाई पड़ रहे हैं, भले ही अपनी बेबसी बताते नहीं. हालांकि इसे वे जाहिर होने नहीं देना चाहते. कांग्रेस के कई मंत्री उनसे कामकाज पर रायशुमारी जरूर करते रहे हैं.

लेकिन इससे उनकी राजनीतिक हैसियत नहीं बढ़ती. फिलहाल विधानसभा में काग्रेस का विधायक माना जाना ज्यादा अहम है, जो नहीं हो सका है. 

हालांकि कांग्रेस के मंत्री आलमगीर आलम कहते हैं कि प्रदीप यादव झारखंड कांग्रेस की अगली कतार के नेता हैं.

पार्टी की बैठकों और रणनीतिक मामलों में उनसे रायशुमारी की जाती रही है, तो धार खत्म करने का सवाल कहां उठता. विधानसभा में जो मामले चल रहे हैं उसे स्पीकर देख रहे हैं. 

कांग्रेस में आने का मलाल है या बीजेपी में नहीं जाने का, इस सवाल पर वे कहते हैं, ''हमें बीजेपी मे नहीं जाना था. नहीं गए. रही बात कांग्रेस में शामिल होने की, तो हाथ दोनों ओर से बढ़े थे. अब पार्टी देखेगी कि हम किस हैसियत में रहेंगे. यहां के मूलावासी, झारखंडियों को हक और अधिकार दिलाने के लिए हमारी आवाज कम नहीं पड़ेगी. सत्तारूढ़ दल के साथ रहने पर जनता के प्रति जवाबदेही और बढ़ जाती है. अभी जरूरी है कि बीजेपी और केंद्र की सरकार के खिलाफ आवाज बुलंद करने का.'' 

इधर बीजेपी में विलय को लेकर विधानसभा ने बाबूलाल मरांडी से कुछ जानकारी मांगी है. उन्होंने सब कुछ विधानसभा को बता दिया है. प्रदीप .यादव और बंधु तिर्की से भी पूछा गया है. 

जो हालात बने हैं उसमें इतना स्पष्ट पता चलता है कि जब तक विधानसभा में बाबूलाल मरांडी को बीजेपी विधायक के तौर पर मान्यता नहीं मिलती, प्रदीप यादव का मामला भी लटका रहेगा. 

और यह मामला सलट भी गया, तो कांग्रेस में प्रदीप यादव की हैसियत क्या होगी, यह भी देखने लायक होगा.

जेवीएम से अलग होने के बाद अब तक वे जहां हैं और जैसे हैं बिल्कुल अपमे दम पर. 

 


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