झारखंड के पठारों में शिद्दत से याद किए गए महिषासुर, मनाया शहादत दिवस

झारखंड के पठारों में शिद्दत से याद किए गए महिषासुर, मनाया शहादत दिवस
Photo- Deepak Ranjit
पीबी ब्यूरो ,   Oct 07, 2019

देश भर में दुर्गोत्सव के साथ दशहरा की धूम है. पर झारखंड के कई आदिवासी इलाकों और पहाड़ियों पर बसने वाले लोग खासकर आदिम जनजाति असुर शोक के साथ शहादत दिवस मना रहे हैं. 

अलबत्ता कई जगहों पर महिषासुर पूजे जाते रहे हैं. दरअसल महिषासुर को अपना पुरखा मानने वाले असुरों को इसका दुख है कि उनके पूर्वज को छल से मारा गया. 

महिषासुर का शहादत दिवस झारखंड के सिंहभूम इलाके में भी मनाया जा रहा है. 

इसी सिलसिले में नवरात्र के नवमी पूजन के दिन यानी सोमवार को  चिलगु-चाकुलिया, चांडिल में देशज संस्कृति मंच के बैनर तले आयोजित शहादत दिवस कार्यक्रम में आदिवासी-मूलवासी और भूमिज शामिल हुए. इस कार्यक्रम में सबसे पहले आदिम होड़ महिषासुर की तस्वीर पर फूल माला चढ़ाया गया. इसके बाद सभा कर महिषासुर के चरित्र का बखान किया गया. 

देशज संस्कृति मंच के संरक्षक कपूर बागी कहते हैं, ''हमारा इतिहास लिखा हुआ नहीं है. आदिवासी पूर्वज आदि काल से हमारे वीर लड़ाके को अपनी भाषा, संस्कृति, सभ्यता, गीत के माध्यम से इतिहास को जिंदा रखा है. आदिवासी समुदाय दस दिनों तक शोक मनाते है. दशाई नृत्य का आयोजन भी आदिवासी समुदाय अपने राजा के याद में करते है. इस नृत्य  में हमलोग के इतिहास के पन्ने छुपे हैं. इस नृत्य का दुर्गोत्सव से कोई वास्ता नहीं था.'' 

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सुमन मुखी कहते हैं कि असुर राजा कभी महिलाओं पर हाथ नहीं उठाते थे. जिनको राक्षस बोला गया वास्तव में वो राक्षस नहीं थे. इसलिए देशज संस्कृति मंच यह निवेदन करता है कि हमारे आदिम होड़ महिषासुर को मारते हुए नहीं दिखाए जाएं. 

बिरश्पती सिंह सरदार का कहना है, ''असुर आज भी झारखंड के पलामू, नेतरहाट में क्षेत्र निवास करते है. असुर समुदाय ने ही दुनिया में पहली बार लोहा गलाने-बनाने का महारत हासिल किया था. लेकिन असुरों का चित्रण जिस तरीके से किया जा रहा है, उससे हमलोग दुखी हैं. हम अपने पुरखों को यादों में बनाए रखना चाहते हैं''. 

महिषासुर शहादत दिवस के सवाल पर दीपक रंजीत कहते हैं, ''आप इसे पूर्वज-पंरपरा को याद रखने के तौर पर देख सकते हैं. बेशक आदिवासियों को अपनी संस्कृति, पंरपरा और इतिहास को जानने के लिए गहराई में जाने की जरूरत है, ताकि एक ठोस नतीजे पर पहुंचा जा सके, क्योंकि कई चीजें गुम होती जा रही है और कई विषयों को अलग-अलग तरीके से उनके सामने रखा जाता रहा है. 

कार्यक्रम में दिनकर कच्छप, सुमन मुखी, चंदन  सिंह, बिरश्पती सिंह सरदार, सुदाम हेंब्रम, प्रकाश महतो,  सुनील हेंब्रम, घनश्याम महतो, देवनाथ शर्मा, ओम प्रकाश, चंदन महतो आदि लोग मुख्य रूप से उपस्थित थे.


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