यादेंः खेत-खलिहान, संघर्ष के मैदान, जनता के अरमान में जिंदा हैं कॉमरेड महेंद्र

यादेंः खेत-खलिहान, संघर्ष के मैदान, जनता के अरमान में जिंदा हैं कॉमरेड महेंद्र
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भुवनेश्वर केवट ,   Jan 16, 2020

वो जनवरी महीने की 16 तारीख थी. और साल 2005. हम रांची स्थित पार्टी के दफ्तर में सुबह से ही अपनी जिम्मेदारी संभाल रहे थे. चुनाव का वक्त था. सो, कई काम जल्दी निपटाने थे. साथ में कुछ साथी भी थे. सब कुछ सामान्य चल रहा था. लेकिन दोपहर एक खबर ने अचानक से हमारी बेचैनी बढ़ा दी. दफ्तर के एक कोने में चालू एक पोर्टेबल टीवी से साथी बिल्कुल सट गए. फोन की घंटी बार- बार घनघना रही थी. और हम कतई मानने को तैयार नहीं थे कि कॉमरेड महेंद्र सिंह नहीं रहे.

बिल्कुल सन्न सा माहौल था, जो यह जाहिर करता रहा कि कोई अनहोनी जरूर है. कुछ ही पलों में खबर पुख्ता थी कि कॉमरेड महेंद्र सिंह हमारे बीच नहीं हैं. बगोदर विधानसभा क्षेत्र के दुर्गीधवैया में उनकी हत्या कर दी गई थी.

मन में गम और गुस्से का ज्वाला धधकने लगा. मानो सब कुछ तहस-नहस कर दूं . लेकिन यह कैसे, क्यों और किसके लिए करता. अभी तो हाल ही में लड़कर झारखंड को बनाया था. अब इसके संवारने और जुल्मों के पसरने से रोकने का वक्त था.

हत्या का बदला आगजनी, लूटपाट खून-खराबा नहीं हो सकता. प्रतिक्रिया की आड़ में अपने ही झारखंड को आग में हम नहीं झोक सकते थे. इस तरह के बहाने महेंद्र सिंह की नीति और सिद्धांत में भी कभी नहीं रहे.

लेकिन यकीन मानिए उस वक्त हमारे मन में एक बात जरूर कचोटती रही, ''यह राजनीतिक हत्या है और इसका बदला राजनीतिक तौर पर ही लिया जा सकता है. हमारा मन बार- बार कहता रहा, बदला लेकर रहेंगे कॉमरेड. आपके संघर्ष के लौ जलाए रखेंगे. लड़ेंगे जुल्म, दमन के खिलाफ. और वंचितों के इंसाफ के लिए. आपके उसूलों पर चलकर''. 

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हत्या की खबर पाते ही बहुत से लोग माले कार्यालय पहुंच रहे थे. आंखों में आंसू और चेहरे के भाव से ये झलक रहा था कि  झारखंड ने एक लड़ाका खो दिया है, जो गरीब, मेहनतकश, किसान, मजदूर, नौजवान, आम-आवाम की आवाज था. जुल्म का प्रतिकार था.

दोपहर बाद सभी लोग अलबर्ट एक्का पहुंचे थे. देखते ही देखते पूरा चौराहा जाम हो गया. महेंद्र के समर्थन में नारे गूंज रहे थे. मुट्ठियां तनी हुई थी. लाल झंडे और तख्तियां लहरा रहे थे.  

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जिंदगी की दांव पर चढी जिंदगी कभी खत्म नहीं होती. इसलिए अब बात महेंद्र सिंह की. और खरी-खरी.

वे बिकाऊ राजनीति के खिलाफ जन राजनीति का मॉडल थे. विधानसभा में माननीय सदस्यों के लिए बेशकीमती उपहारों, वेतन भत्ता और बेशुमार सुविधाओं में बढ़ोतरी के प्रस्ताव के खिलाफ अगर किसी शख्स की आवाज सदन में गूंजती थी तो वे महेंद्र सिंह थे.

महेंद्र सिंह के ईमान को कोई ताकत डिगा नहीं सकी. उन्होंने जीते जी पूंजी लगाकर पूंजी उगाहने की राजनीति नहीं की. अलबत्ता कॉरपोरेट की गिरफ्त में जाती राज्य की सियासत को बचाने की वे इमानदार कोशिश करते रहे.

महेंद्र सिंह शिद्दत से महसूस करते थे कि धनबल से प्रभावित राजनीति का खिलाफत जरूरी है. इसलिए उन्हें जहां और जिस मंच पर मौका मिलता, मुखरता से अपनी बात रखते.

वे चाहते थे कि ग्रामीण समाज उन्नति और आत्मनिर्भरता के लिए हमेशा तत्पर रहे. आम- अवाम, राज्य की समृद्धि को जन समृद्धि में बदलने के लिए ही सरकार को जन एजेंडे पर काम करने के लिए मजबूर करे.

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औरों में नहीं

झारखंड में लगभग 30 वर्षों से पंचायत चुनाव नहीं कराए गए थे. ग्राम सभाएं भी निरस्त थी. सरकार इस मामले में बहुत फिक्रमंद नहीं थी. उस दौर में महेंद्र सिंह ने गिरिडीह जिले में सर्वमान्य तरीके से पंचायत के चुनाव कराए. और पंचायत प्रतिनिधियों को सरकार से मान्यता दिलाने की लड़ाई करते रहे. सदन के अंदर-बाहर इस सवाल को उठाते रहे.

सामान्य सीट से चुनाव जीतने वाले महेंद्र सिंह की खासियत रही कि उन्होंने अनुसूचित क्षेत्रों में परंपरागत आदिवासी समाज की व्यवस्था को सुदृढ़ करने की पुरजोर वकालत की. यही कारण रहा होगा कि जब दर्जन भर आदिवासी संगठनों ने विधायकों का पुतला जलाया था उस समय सिर्फ महेंद्र सिंह ऐसे विधायक थे, जिनका पुतला नहीं जलाया गया और ना ही उन्हें कभी किसी ने निशाने पर लेने की कोशिश की.

मॉडल पुलिस स्टेट की आड़ में जब झारखंडी जन आकांक्षाओं को कुचलने को कोशिश हुई, तो तपकरा, डोरंडा, कोयलकारो लेवाटांड से लेकर मरकच्चो, चिचांकी गोलीकांड के विरोध में और दोषी पुलिसकर्मियों पर कार्रवाई के लिए उन्होंने आवाज मुखर की. और इसका असर भी देखा गया. कई मामले में सरकार को कार्रवाई करनी पड़ी. जबकि कई मामले में शासन- प्रशासन की जन विरोधी नीति-नीयत उजागर हुई.

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दरअसल महेंद्र सिंह कथनी और करनी में समानता के प्रतीक पुरुष थे. यही वजह रही होगी कि उन्हें मौत भी डिगा नहीं सकी. जब सरिया के दुर्गीधवैया में जनसभा के दौरान हथियारबंद ने पूछा  ''कौन है महेंद्र सिंह, तो कड़ाके की आवाज में जन नेता ने कहा कि कहो क्या बात है मैं महेंद्र सिंह हूं''.

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महेंद्र सिंह की हत्या की साजिश करने वालों ने सोचा था कि हत्या के साथ एक राजनीतिक धारा को नष्ट  कर देंगे. पर उनकी सोच धरी रह गई. वैसे लोगों के लिए माले की राजनीति और सक्रियता पहाड़ से भी ज्यादा भारी है. 

हम यकीन करते हैं कि झारखंड ही नहीं देश में वे इकलौते नेता हो सकते हैं, जिनकी शहादत के 14 वर्षों के बाद भी बरखी पर उन्हें याद करने के लिए हजारों लोग उमडते हैं.

यह कारवां एक संकल्प के साथ आगे बढ़ता है. वैश्विक पूंजीवाद के दौर में भी महेंद्र सिंह जैसे शख्स को राजनीति का अद्भुत मॉडल मानकर.

महेन्द्र सिंह सिर्फ व्यवहारिकता के भी अद्भुत धनी थे. मुझे याद है कि मरकच्चो पुलिस फायरिंग के बाद मरकच्चो से सरिया आने के दौरान रास्ते में पुआल से लदा बैलगाड़ी  लेकर एक किसान घर लौट रहा था. सड़क की चौड़ाई बेहद कम थी. अचानक बैल बिदक कर सड़क किनारे खोदे गड्ढे में जा गिरा. बैल की गर्दन जुआंठ में फस गई.

महेंद्र सिंह दौड़कर आगे बढ़े और जुआंठ पकडकर दोनों हाथों से उठा दिया. किसान से टांगी झपटते हुए बैल की गर्दन में फंसी रस्सी को काट डाला. किसान ने एहसान मानते हुए पैर छूने की कोशिश की, लेकिन महेंद्र सिंह ने मना करते हुए उसे गले लगाया .

उनसे जुड़ी यादें अनेक हैं. चौकी पर सोना, साधारण सा शर्ट, पैंट पहनना, काली चाय पीना, अहले भोर में भात- तरकारी खाकर घर से निकलना, हमेशा किताबें पढ़ना और सिस्टम की कारगुजारियों को उजागर करने के लिए हमेशा सरकारी दस्तावेजों से जूझते रहना, मुंह पर बेलाग-बेलौस बोलना ये सब उनकी आदतों में शुमार था.

उनकी हत्या के बाद जब अंत्येष्टि कार्यक्रम में हम सभी शामिल होने के लिए बगोदर जा रहे थे. भूख तो थी नहीं. लेकिन प्यास से हलक सूखे थे. 

रास्ते में टाटीझरिया के सामने हम सभी रूके थे. होटल वाले से पूछा कि गाड़ियां चलती हुई नहीं दिख रही. उसने कहा, पता नहीं है क्या? महेंद्र सिंह की हत्या कर दी गई है.

हमने पूछा-कौन थे महेंद्र सिंह. दुकानदार ने अखबार सामने रखते हुए तंज भरे लहजे में कहा कि देख लीजिए. हो सके, तो पढ़ लीजिए, कौन थे महेंद्र सिंह पता चल जाएगा. हम सोचते रहे जनपक्ष राजनीति का यही असर होता है.

आज उनकी बरखी पर बगोदर में फिर बड़ा जुटान होने वाला है. बीसियों हजार लोग जुटेंगे. इन विचारों के साथ कि खेत-खलिहान, संघर्ष के मैदान, जनता के अरमान में महेंद्र सिंह अभी जिंदा है.

(लेखक भाकपा माले की स्थायी राज्य कमेटी के सदस्य हैं)


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