लोहरदगाः अपना विधानसभा क्षेत्र बचा लेते, तो बाजी मार जाते सुखदेव भगत

लोहरदगाः अपना विधानसभा क्षेत्र बचा लेते, तो बाजी मार जाते सुखदेव भगत
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पीबी ब्यूरो ,   May 25, 2019

झारखंड में लोहरदगा संसदीय क्षेत्र में हुई हार कांग्रेस उम्मीदवार सुखदेव भगत को लंबे समय तक अखर सकता है. सुखदेव भगत को बीजेपी के सुदर्शन भगत ने 10 हजार 363 वोटों से हराया है. सुखदेव भगत लोहरदगा से विधायक हैं. जबकि लोहरदगा विधानसभा क्षेत्र में ही सुदर्शन भगत ने कांग्रेस से 11 हजार 121 वोटों की बढ़त ली है. 

लोहरदगा संसदीय क्षेत्र में बीजेपी के सुदर्शन भगत को कुल 3 लाख 71 हजार 595 वोट मिले हैं. जबकि सुखदेव भगत को 3 लाख 61 हजार 232 वोट हासिल हुए हैं. वोटों की गिनती के दौरान भी बीजेपी और कांग्रेस आखिरी तक आगे- पीछे होती रही. लेकिन आखिरी के तीन राउंड में खासी बढ़त ने सुदर्शन भगत की लगातार तीसरी जीत पक्की कर दी. 

लोहरदगा के अलावा बीजेपी ने सुखदेव भगत को विशुनपुर और मांडर विधानसभा क्षेत्र में पीछे छोड़ा है. हालांकि मांडर में बीजेपी को बहुत मामूली वोटों की बढ़त मिली है. मांडर विधानसभा क्षेत्र से सुदर्शन भगत को 91 हजार 442 और कांग्रेस के सुखदेव भगत को 90 हजार 254 वोट मिले हैं. 

मांडर के पूर्व विधायक और जेवीएम के महासचिव बंधु तिर्की कांग्रेस की जीत के लिए मांडर में जुटे थे. इधर बीजेपी की विधायक गंगोत्री कुजूर किसी हालत में पीछे नहीं रहना चाहती थीं. 

विशनपुर विधानसभा क्षेत्र ने भी कांग्रेस उम्मीदवार का साथ नहीं दिया. जबकि यह सीट जेएमएम के कब्जे में है. चमरा लिंडा यहां से विधायक हैं. विशुनपुर विधानसभा क्षेत्र में सुखदेव भगत को सुदर्शन भगत ने 13 हजार 303 वोटों से पीछे छोड़ा. 

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बीजेपी के क्षेत्र

इधर बीजेपी के कब्जे वाली विशनपुर और गुमला से सुखदेव भगत ने लगभग 20 हजार वोटों की बढ़त ली. लेकिन लोहरदगा और विशनपुर में ज्यादा वोटों से पिछड़ने की वजह से खुद को संभाल नहीं पाए. सुदर्शन भगत को पोस्टर वोट भी कांग्रेस से ज्यादा मिले हैं. सुदर्शन भगत को 2068 और सुखेदव भगत को 1164 पोस्टल वोट मिले हैं. 

लोहरदगा की टीस 

गौरतलब है कि सुखदेव भगत 2005 में लोहरदगा विधानसभा क्षेत्र से पहली दफा विधानसभा का चुनाव जीते थे. इसके बाद 2009 और 2014 में आजसू के कमलकिशोर भगत ने उन्हें हराया. हालांकि दोनों दफा एक हजार से कम वोटों से सुखदेव भगत की हार हुई. 

2014 की जीत के बाद कमलकिशोर भगत के एक आपराधिक मामले में सजायाफ्ता होने के बाद उनकी सदस्यता समाप्त हो गई. 2015 में हुए उपचुनाव में सुखदेव भगत ने आजसू से चुनाव लड़ रही कमलकिशोर भगत की पत्नी नीरू शांति को हराया. आजसू को भाजपा ने समर्थन दिया था. इसक बाद भी सुखदेव भगत 23 हजार वोटों से जीत गए. 

पिछले साल ही सुखदेव भगत की पत्नी अनुपमा भगत लोहरदगा नगर पर्षद की अध्यक्ष बनी हैं. इसके बाद भी लोहरदगा में कांग्रेस उम्मीदवार अपना किला हिलने से नहीं बचा सके.

माना जा रहा है कि लोहरदगा में ही प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की चुनावी रैली से भी सुदर्शन भगत के पक्ष में हवा चली. साथ ही लोहरदगा में बीजेपी और संघ के कैडरों ने पूरा जोर लगाया. दरअसल सुदर्शन भगत की संघ और संगठन दोनों जगह छवि अच्छी है. आजसू के कार्यकर्ता भी बीजेपी का साथ देते दिखे.

इधर जेएमएम के चमरा लिंडा आखिरी तक चुनाव लड़ने के लिए तैयार थे. और जब चुनाव नहीं लड़े, तो साथी दल के लिए खासी दिलचस्पी नहीं दिखाई. अंदरखाने की खबर यह भी है कि चमरा को यह लगता रहा कि लोकसभा चुनाव वे दो बार लड़े हैं और इस बार सुखदेव भगत विपक्ष के साझा उम्मीदवार बने हैं. तो नैया भी खुद पार लगाएं. चुनाव की तारीख नजदीक आने के साथ हेमंत सोरेन सुखदेव भगत के समर्थन में प्रचार करने पहुंचे थे, तो चमरा लिंडा भी साथ थे. 

साथ ही रामेश्वर उरांव, धीरज साहु, अरूण उरांव सरीखे नेता भी सुखदेव भगत से बहुत करीब नहीं दिखे. कांग्रेस के एक नेता नाम न छापने की शर्त पर बताते हैं कि पद और कद को लेकर लोहरदगा में इगो प्रॉब्लम बहुत रहा. 

इधर सुखदेव भगत के प्रचार में कांग्रेस का कोई शीर्ष नेता नहीं पहुंचा और न ही विपक्ष के आला नेताओं ने वक्त दिया. हांलाकि सुखदेव भगत ने अपने दम पर ही बीजेपी को थकाया बहुत. फिर भी सुखदेव भगत लोहरदगा से नहीं पिछड़ते, तो जीत की राह आसान हो जाती. 


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