'दिहाड़ी खटने गए थे, दरवाजे पर लौटी लाश, अब न कोई मजदूर कहेगा और न ही परदेसी'

 'दिहाड़ी खटने गए थे, दरवाजे पर लौटी लाश, अब न कोई मजदूर कहेगा और न ही परदेसी'
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पीबी ब्यूरो ,   May 15, 2020

मंगलवार के दिन कहले रहन जल्दी लौट जाइब. ई जानकर जी के संतोष रहे. अब केकरा भरोसा जियब. कैसे पोसाई बाल-बुतरू और पेट. कौन लोगन कही मजदूर और के कही परदेसी. ई कईसन तालाबंदी जे गरीबन, मजदूरन के जान पर बन आईल. 

गंवई लहजे में यह कहते हुए अनिता देवी का सब्र टूट जाता है और वे दहाड़ मार रोने लगती हैं. इस बीच मासूम बच्चों को संभालने की उनकी कोशिशें आसपास के लोगो को भी रूला देती है.

मजदूर के इन मासूम बच्चों को जिंदगी की दुश्वारियों और पारिवारिक जिम्मेदारियों का पता नहीं, पर उनकी आंखों में वे तमाम सवाल हैं जो मुश्किलों की घड़ी में तलाशे जा सकते हैं. 

अनिता देवी झारखंड में गढ़वा जिले के मझिआंव प्रखंड के करकटा गांव निवासी बिहारी राम की पत्नी हैं. बिहारी राम दिहाड़ी खटने तेलंगाना गए थे. सेटरिंग के काम में हाथ बैठा हुआ था, सो रोजी रोटी का इंतजाम कर लेते थे. 

पिछले 11 मई को तेलांगना से कम से कम 21 मजदूरों का जत्था गांव लौटने के लिए निकल पड़ा. कभी गाड़ी का सहारा लेकर. कभी पैदल. 

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इस सफर में एक पिकअप वैन के दुर्घटनाग्रस्त होने पर चार लोगों की मौत हो गई और दर्जन भर लोग घायल हो गए. मारे गए मजदूरों में बिहारी राम समेत तीन लोग गढ़वा के थे. 

ये वे लोग थे, जिनके पास रोजगार न था. और न ही सरकारी इमदाद. भविष्य की कोई आस न देख घर लौटना मजबूरी थी. उनके जेहन में कई सवाल थे, जो उन्हें डराते थे. फिर क्या वे घरों को जिस हाल में थे जैसे थे, निकल पड़े.

बेचैनी के पल

तेलंगाना के रंगारेड्डी से लौटने के दौरान दुर्घटना की खबर मिलने के बाद से अनिता देवी पिछले 48 घंटों से बेचैनी के बीच वक्त गुजार रही थीं.

लेकिन उन्हें उन पलों का सामना करना था, जिसके बारे में रत्ती भर सोचा नहीं था.

मजदूर पति की लाश दरवाजे पर पहुंची, तो वे लिपट कर रो पड़ीं. उनकी चित्कार से पास पड़ोस के लोग जुट गए. माथे पर धूप चढ़ती रही. फिर आंखो में आंसू सूखे, तो बुत्त बनकर बैठ गईं. 

इस महिला के बेसुध होने पर गांव के लोग पानी का छींटा मारते. जैसे ही उनकी आंखें खुलती, वे दूधमुंहे बच्चे को गोद में समेट लेती. सामने पति की लाश का स्याह पड़ा चेहरा.  

इस हादसे में मझिआंव प्रखंड के ही कामत गांव के सुदेश्वर राम भी मारे गए हैं. बिहारी राम के साथ उनकी लाश भी दरवाजे पर लौटी, तो घर में कोहराम मच गया.

सुदेश्वर राम की पत्नी प्रियंका देवी कहती हैं- ''उधर पति फंसे थे. इधर हर दिन हमलागों का भारी कट रहा था. जब यब खबर मिली कि सभी कमिया (मजदूर)  वहां से साथ चल पड़े हैं, तो राहत हुई. पर नियती को कुछ और मंजूर था. मजदूर और गरीबन का इस दुनिया में कोई नहीं देखनहारा. लॉकडाउन ने इनके रोज़गार पर लात मार दी फिर जान भी ले ली.''

बिहारी राम, सुदेश्वर राम के अलावा मेराल थाना क्षेत्र के छपरवार कला गांव निवासी संजय राम भी इस हादसे में जान गंवा बैठे. 

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मजदूरों के साथ लौट रहे अरूण बताते हैं, ''हमलोग तेलंगाना के रेगरेड्डी जिला अंतर्गत शंकरपाली में सरिया सेटरिंग में काम कर रहे थे. लॉकडाउन के कारण काम बंद हो गया.रहने-खाने का संकट पैदा हो गया. 11 अप्रैल को सभी 21 मजदूर पैदल ही चल दिए. रास्ते में मैजिक वाहन भाड़े पर कर नागपुर हाईवे तक आए. वहां से सभी लोग एक लॉरी पर बैठकर रिंग रोड पहुंचे. इसके बाद एक पिकअप वैन लेकर आगे बढ़े. पिकअप वैन का टायर फटने से अनियंत्रित होकर पलट गया. इस हादसे में यूपी के भी एक मजदूर की मौत हुई है''.

इधर घटना की जानकारी मिलने पर मझिआंव प्रखंड विकास पदाधिकारी अमरेन डांग एवं अंचलाधिकारी राकेश सहाय मृतक मजदूरों के घर पहुंचे.

उन्होंने पीड़ित परिवार को ढांढस बंधाया और बिहारी राम तथा सुदेश्वर राम की पत्नी को परिवारिक लाभ योजना के तहत 10-10 हजार का चेक दिया.

इसके अलावा 40 किलो खाद्यान्न के साथ-साथ दो- दो हजार रुपए नगद अंतिम संस्कार के लिए दिए गए. अधिकारियों का कहना है कि सरकार की जनकल्याणकारी योजना का लाभ भी पीड़ित परिवारों को दिया जाएगा. 

अंतहीन सिलसिला

कोरोना वायरस के खतरे और लॉकडाउन को लेकर उपजे असाधारण संकट के बीच झारखंड के प्रवासी मजदूरों की बेबसी का अंतहीन सिलसिला जारी है.

इससे पहले गढ़वा में ही पिछले दो दिनों के दौरान दो घटना ने गांव के लोगो को परेशान कर दिया है. 

महाराष्ट्र के शोलापुर से एक घर लौटे एक युवा प्रवासी मजदूर से जब क्वारंटाइन सेंटर जाने को कह गया, तो उसने पेड़ पर फांसी लगाकर जान दे दी.

यह घटना बीते सोमवार की है. रंका थाना क्षेत्र के चुटिया पंचायत के हाटदोहर मझवार टोला के मुकेश कुमार दिहाड़ी खटने महाराष्ट्र गए थे. 

लॉकडाउन में कई दिनों तक फंसे रहे. इधर 11 मई को कई मजदूर साथियों के साथ वह जैसे- तैसे घर लौटने में सफल रहा.  

मुकेश के पिता नारायण गौड़ का कहना है कि जब बेटा घर लौटा, तो एहतियात के तौर पर हमलोग ने कुछ दिन क्वारंटाइन सेंटर में रहने को कहा.

प्रशासन वाले और गांव के मुखिया भी उसे समझाकर गए थे. लेकिन इससे पहले उसने जान दे दी. अच्छा होता बेटा गांव नहीं लौटता. कम से कम जिंदा रहता. 

मुकेश कुमार के साथ गांव के ही द्वारिका गौड़ का बेटा रामसूरत गौड़ भी महाराष्ट्र से लौटा है. रामसूरत बताते हैं कि महाराष्ट्र के शोलापुर की एक सीट निर्माण फैक्ट्री में काम करते थे. 

वहां से 7 मई को निकले थे. कभी पैदल तो कभी ट्रक के सहारे हमलोग यहां पहुंचे.

यहां पहुंचने पर हमसे कहा गया कि क्वारंटाइन सेंटर में जाना होगा. हम दोनों जाने को तैयार थे, पर न जाने मुकेश के मन में क्या कुछ चल रहा था कि क्वारंटाइन में जाने से पहले उसने जान दे दी. 

उधर गढ़वा जिले के मेराल प्रखंड के बनवरिया गांव में मातम पसरा है.

इस गांव के बाबूलाल सिंह खरवार रोजी-रोटी के लिए गांव के कई लोगों के साथ कर्नाटक गए थे. मंगलवार को उनकी लाश दरवाजे पर देख कर घर वालों का बुरा हाल था. 

दरअसल बाबूलाल खरवार कर्नाटक से मजदूर साथियों के साथ पैदल गांव लौट रहे थे. चिकोड़ी थाना की पुलिस ने झारखंड के मजदूरों को रोक लिया. इस बीच मजदूरों की जांच कराई जाने लगी.

बाबूलाल खरवार गिर पड़े और उनकी मौत हो गई. इसके बाद बाबूलाल की लाश घर भेज दी गई. जबकि दर्जन भर मजदूर वहीं फंसे हैं. 

 


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