बेबसी की इंतिहाः वृद्धा पेंशन को तरसता लातेहार का आदिवासी दंपती, बोले, 'जीते जी नसीब नहीं होगा'

बेबसी की इंतिहाः वृद्धा पेंशन को तरसता लातेहार का आदिवासी दंपती, बोले, 'जीते जी नसीब नहीं होगा'
Photo- Sanjay Ram
पीबी ब्यूरो ,   May 29, 2020

पेंशन के लिए कागज तो कई दफा भरा. पर वह जाता कहां है पता नहीं चलता. अब सरकारी बाबू से जाकर रोज- रोज पूछने की हिम्मत नहीं. लॉकडाउन की बेबसी सामने है. चार महीने से से पति खाट पर पड़े हैं. हाथ में पैसे नहीं. साधन नहीं. सुविधा नहीं. कहां जाएं. किससे कहें. इलाज के लिए पैसे भी तो चाहिए. राशन मिलता है, तो किसी तरह नून- भात पर जिंदगी टिकी है. 

गंवई लहजे में यह कहते हुए गंदरी देवी का गला रूंध जाता है. उनकी निगाहें खाट पर पड़े बीमार पति नागो उरांव पर जा टिकती है. मानो बेबसी की इंतिहा में पल- पल उनका दुखों के पहाड़ तले दबा हो. 

नागो उरांव बहुत बोल नहीं पाते. चार महीने से बीमारी ने देह की अस्थि-पंजर हिला कर रख दिया है.

पहले मजदूरी करते थे. अब काया साथ नहीं देता. गरीबी की चादर ओढ़ें या बिछाएं समझ नहीं पाते. लिहाजा मौत और जिंदगी के बीच जारी जंग में 

झारखंड में लातेहार जिले के बरियातू प्रखंड के सुदूर पुराना सिबला गांव के इस आदिवासी दंपती की कसक भी है- ' लगता है जीते जी पेंशन नसीब नहीं होगा'. जबकि वृद्धा पेंशन पाने को वे सीधे हकदार हैं. 

इसे भी पढ़ें: झारखंडः 3 लाख 58 हजार लोग अब तक वापस लौटे, प्रवासी मजदूरों का डेटाबेस तैयार करा रही सरकार

आदिवासी दलित बहुल इस गांव में कई परिवारों के सामने बेबसी है, पर नागो उरांव की जिंदगी बेहद मुश्किलों में पड़ी है. पत्नी जब तब रोती हैं. कभी वह पति की नब्ज टटोलती हैं और कभी पेट. रातों में नींद नहीं आती.

बेटा लखन उरांव दिहाड़ी मजदूर है. वो खुद अपनी जिंदगी की उलझनों में फंसा है. 

नागो उरांव और गंदरी को दिन तारीख याद नहीं, पर इतना जरूर जानते हैं कि पांच वर्षों से वृद्धा पेंशन पाने की कोशिश करते रहे हैं. तीन साल पहने नागो उरांव ने कर्ज लेकर ग्रामीण बैंक में खाता भी खुलवाए. आस लगी रही कि पेंशन के पैसे मिलेंगे, लेकिन खाता खाली रहा.  

बरियातू प्रखंड के स्थानीय पत्रकार संजय राम गुरुवार को इस आदिवासी परिवार का हाल जानने पहुंचे थे. संजय राम बताते हैं कि नागो उरांव ने पेंशन के लिए कागज भरे थे. बैंक में खाता खुलवाने में खुद उन्होंने मदद की थी. लेकिन नागो उरांव की आस धरी रह गई. संजय बताते हैं कि इस परिवार की बेबसी से प्रखंड के अधिकारियों को भी उन्होंने वाकिफ कराया है. और मदद की गुजारिश की है. 

मुखिया मुनिया देवी कहती हैं कि पीडीएस से राशन दिलाकर मदद कर सकते हैं. आगे यह पता करेंगे कि किन वजहों से पेंशन नहीं मिल रहा.  

 


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