'भोट डाले दिन कागज में नाम चढ़ल रही, पर राशन झोंके घरी कार्ड में नाम कट जाई, ई जुलुम ना सहाई'

'भोट डाले दिन कागज में नाम चढ़ल रही, पर राशन झोंके घरी कार्ड में नाम कट जाई, ई जुलुम ना सहाई'
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पीबी ब्यूरो ,   Sep 16, 2020

भोट (वोट) डाले दिन कागज में नाम चढ़ल रही, पर राशन झोंके घरी कार्ड में नाम कट जाई. भोट देवे घरी सब कहियन कि वैजे डालियह, सब कुछ मिलतवs.बाद में कुछो ना मिले ला... कोई तरह जिनगी कटत बा. लइकन के हाथ भी कामधाम नइखे. केरल में काम करत रहन, पर लॉकडाउन बा. अब केकरो भोट ना देब. 

गंवई भाषा में अपनी पीड़ा जाहिर करती मसोमात जिरवा देवी पल भर के लिए खामोश हो जाती हैं. 

उनका कहना है, ''वोट के लिए सरकारी कागज में नाम चढ़ा रहता है. लेकिन राशन लेने जाती हूं, तो बताया जाता है कि कार्ड में नाम नहीं चढ़ा है.यही गम है. उनके तीन लड़के हैं. सबके हाथ खाली हैं. गांव में रोजगार नहीं और परदेस जाने की जुगत नहीं. ताला जो लगा है''. 

झारखंड के लातेहार जिले के बरवाडीह प्रखंड के सामने आज संयुक्त ग्राम सभा मंच के बैनर तले धरना प्रदर्शन किया जा रहा है. रोजगार और राशन की मांग को लेकर संघर्ष की इस मुनादी की अगुवाई कन्हाई सिंह और नरेगा वाच के जेम्स हेरेंज कर रहे हैं. 

जिरवा देवी भी इसी कार्यक्रम में शामिल हुई हैं. उम्मीदों की पोटली बांधे. माथे पर पसीने की उन्हें परवाह नहीं. वे जब अपनी बेबसी बता रही होती हैं, तो बगल में बैठी दूसरी महिलाएं हामी भरती हैं. 

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धरना में आदिवासी और दलित महिलाएं भी पहुंची हैं. कुछ युवा भी हैं, जो गीतों के जरिए सरकार तक अपनी आवाज पहुंचाने की जद्दोजहद कर रहे हैं. खेतवा में माचल हाहाकार हो, जागल मजदूर-किसनवा...गीत के जरिए आखिरी कतार में शामिल लोगों को गोलबंद करने की कोशिशें की जा रही है.

अरूण भुइंया कहते हैं "साहब लोगन गांव कब जाते हैं. गांव जाएं, तब तो आम लोगों की मुश्किलें सुन- समझ पाएंगे. अब गांव के लोग ही उनके दप्तर के करीब चले आएं हैं अपनी मुश्किलें बताने." े 

सभी लोग विधायक, सांसद और हेमंत सरकार से जवाब मांग रहे हैं. आखिर उनके (ग्रामीणों) के हाथ और पेट क्यों खाली हैं.योजनाएं गरीब- गुरबों और जरूतमंदों तक क्यों नहीं पहुंचतीं.   

कन्हाई सिंह कहते हैं कि लातेहार के दूरदराज इलाकों में हालात अच्छे नहीं हैं. कानून बना देने भर से गरीबों की तो भूख नहीं मिट सकती. वे आरोप लगाते हैं कि गांवों में खाद्य सुरक्षा कानून का उल्लंघन हो रहा है. जिला स्तर पर 2300 राशन कार्ड लंबित है. जबकि हजारों लोगों ने ऑनलाइन आवेदन किया है. कागज कहां है और क्या कार्रवाई की गई है, इसका पता नहीं.

जिनके पास राशन कार्ड है, तो परिवार के सभी सदस्यों का नाम नहीं है. इसलिए मुख्यमंत्री के नाम मांग पत्र भेजा जा रहा है. कन्हाई सिंह बताते हैं कि बररवाडीह प्रखंड के कई गांवों के लोग यहां जुटे हैं. इस गोलबंदी को बड़ा किया जाएगा. 

जवाब किनसे मांगे जा रहे हैं, इस सवाल पर कन्हाई सिंह कहते हैं, ''कोरोना के नाम पर घर में रहें सुरक्षित रहें की बात कर केंद्र एवं राज्य सरकार गरीबों को तंगहाल बनाने एवं ठगने का काम कर रही है. गाँव-टोला में भुखमरी एवं बेरोजगारी की स्थिति बनी हुई है. न जन प्रतिनिधी और न ही प्रशासन के अधिकारी कर्मचारी वंचित जरुरतमंदों के हालत की मुकम्मल सुध ले रहे हैं. हर हाथ को रोजगार के दावे कागजों पर सिमटे हैं. इसलिए जरुरी है कि जनता अब सवाल करे एवं घर से बाहर सड़क पर उतरे. विधायक, सांसद  और सरकार से जवाब मांगें. ''

नरेगा वाच के संयोजक जेम्स हेरेंज का कहना है कि सरकारी महकमा आंकड़ों की बाजीगरी में जुटी है. मनरेगा के तहत तहत 24 घंटे में रोजगार देने की बात कर रहे हैं लेकिन जमीनी हकीकत इसके उलट है.

लातेहार के दूरदराज इलाके में आदिवासी, दलित काम मांग रहे हैं, लेकिन उन्हें समय पर काम नहीं मिलता. प्रशासनिक अधिकारियों को पुख्ता प्रमाण के साथ इसके दस्तावेज समय- समय पर भेजे जाते रहे हैं. लॉकडाउन के चलते उपजे असाधारण स्थिति में मनरेगा और खाद्य सुरक्षा कानून के पालन कराए जाने के लिए पारदर्शिता और सख्ती की जरूरत है. 

लगातार जमीनी स्तर पर मनरेगा और भोजन के अधिकार पर काम कर रहे सामाजिक कार्यकर्ता धीरज बताते हैं कि इस इलाके में ग्रामीण दो मोर्चे पर संघर्ष कर रहे हैं- भोजन और काम का अधिकार. कागजों में विसंगतिया तमाम हैं और मनरेगा में पारदर्शिता नहीं है. 

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