खाली थैलियां और नंगे पांवः क्यों सरकारी दफ्तर घेरने निकले आदिम जनजाति परिवार

खाली थैलियां और नंगे पांवः क्यों सरकारी दफ्तर घेरने निकले आदिम जनजाति परिवार
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पीबी ब्यूरो ,   Jul 04, 2019

खाद्य सुरक्षा कानून के लागू किए जाने से भर से गांव-गिराव के गरीबों की भूख नहीं मिटती. क्या हुआ दरवाजे पर अनाज पहुंचाने वाली डाकिया योजना का. राशन लेने के लिए मीलों दूर जाना होता है. पेंशन और आवास के लिए आदिम जनजाति परिवार तरसते हैं. इसलिए खाली थैलियां लेकर निकले हैं. सरकार और अफसरों को बताने. अब इस आवाज की चाहे जो असर हो. जंगलों- पहाड़ों से घिरे गांवों में लोग पैदा ही लेते हैं संघर्ष करने के लिए.

मु्ट्ठियां भींचे खरीदन परहिया जब यह कह रहे होते हैं, तो लगनी देवी, सुरेश परहिया, जमुना परहिया हामी भरते हैं. 

झारखंड में लातेहार जिले के अमवाटीकर, कटिया, जोबे, चुरहवा टोला के सैकड़ों आदिम जनजाति परिवारों ने बुधवार को बरवाडीह प्रखंड कार्यालय का घेराव किया. इससे पहले बाल- बुतरू और बुजुर्गों के साथ महिलाएं और पुरूष जुलूस के शक्ल में निकले. पसीने की परवाह किए बिना लोगों ने नारे लगाएः राशन दो-पेंशन दो और झूठे दावे बंद करो. 

जुलूस का नेतृत्व माले नेता कन्हाई सिंह और सामाजिक कार्यकर्ता जेम्स हेरेंज, धीरज कुमार कर रहे थे. बीडीओ और सीओ के प्रखंड मुख्यालय में मौजूद नहीं रहने की वजह से लोगों ने बरवाडीह अंचल के सीआई को मांग पत्र सौंपा. 

इस बीच अंचलाधिकारी के निर्देश पर बरवाडीह के अंचल निरीक्षक शंभु राम ने लोगों को भरोसा दिलाया है कि सात जुलाई को गणेशपुर पंचायत में पेंशन के लिए शिविर लगाया जाएगा. 

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खाद्य सुरक्षा कानून, भोजन के अधिकार तथा मनरेगा पर जमीनी स्तर पर और लंबे समय से काम करते रहे जेम्स हेरेंज बताते हैं कि चुंगरू और गणेशपुर पंचायत के कई लोगों को राशन लेने के लिए दूसरे प्रखंड गारू के करवाई पंचायत जाना पड़ता है. वह दूरी 35 किलोमीटर है. आने- जाने में गरीबों को पैसे खर्च करने पड़ते हैं. और समय भी जाया होता है. कई मौके पर वे राशन लेने से वंचित हो जाते हैं. आदिम जनजातियों की आम शिकायत रही है कि डीलर राशन और केरोसिन में कटौती करता है. इसके अलावा परहिया-कोरबा गांवों के लोग पेंशन और आवास योजना से वंचित हैं. 

कन्हाई सिंह कहते हैं कि दूरदराज के इलाकों में गरीबों की हकमारी हो रही है. उधर राजधानी में सरकार रोज बड़े दावे करती रही है. लेकिन गांवों की तस्वीर बेहद तकलीफदेह है. गांवों से बच्चे, बुजुर्ग, महिलाएं सब गोलबंद होकर अधिकारियों को आगाह कराने निकली हैं कि आंदोलन इससे भी बड़ा होगा. फिलहाल पंद्रह दिनों का वक्त दिया गया है. 

धीरज कुमार कहते हैं कि दूरदराज के इलाके में सामाजिक सुरक्षा योजना दम तोड़ रही है. कई इलाकों में वृद्धा और विधवा पेंशन का तीन-चार महीने से भुगतान नहीं हुआ है. खेती का समय है और रोजगार के बिना लोग हाथ पर हाथ धरे बैठे हैं. मनरेगा वैसे भी बेहद कमजोर पड़ रहा है. आदिम जनजाति परिवारों की मुश्किलें कहीं ज्यादा है. आवास योजना का लाभ इन परिवारों को बहुत कम मिला है.

धीरज आगे बताते हैं कि 35 किलोमीटर दूर जाकर राशन लेने में जब गरीबों के पास पैसे नहीं होते हैं, तो उन्हें पैदल चलना होता है. जंगलों में हाथी का डर होता है. आदिम जनजातियों के गांव में अब तक बिजली नहीं पहुंची है. स्कूल के विलय होने से बच्चों की परेशानी बढ़ी है. और इन सबके बीच ज्यादा मुश्किलें हैं कि आदिम जनजातियों की आवाज शासन और नुमाइंदे के बीच नहीं पहुंचती. 

सुरेंद्र सिंह कहते हैं कि डाकिया योजना के तहत आदिम जनजाति परिवारों के दरवाजे पर अनाज पहुंचाना है. पर लातेहार के कई गांवों में ये योजना नाकाम रही है.कटिया और चुड़हरवा टोला के आदिम जनजाति परिवारों को राशन लेने के लिए 70 किलोमीटर का सफर  तय करना होता है. इन्हीं हालात में लोगों ने आंदोलन का रुख अख्तियार किया है. 


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