तीसरी बार सीएम बनने जा रहे केजरीवाल के पास गाड़ी नहीं, नकद और एफडी सिर्फ 9.65 लाख रुपए

तीसरी बार सीएम बनने जा रहे केजरीवाल के पास गाड़ी नहीं, नकद और एफडी सिर्फ 9.65 लाख रुपए
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पीबी ब्यूरो ,   Feb 12, 2020

बीजेपी की तमाम घेराबंदी को तोड़ते हुए दिल्ली चुनाव में शनदार तरीके से जीत का परचम लहराने वाले आम आदमी पार्टी के प्रमुख अरविंद केजरीवाल 16 फरवरी के सत्ता की बागडोर संभालेंगे. 

अरविंद केजरीवाल तीसरी बार मुख्यमंत्री बनने जा रहे हैं. लेकिन उनके पास कोई गाड़ी नहीं है. जबकि नकदी और एफडी के तौर पर मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल के पास 9.65 लाख हैं. 

अरविंद केजरीवाल ने पर्चा भरने के समय जो शपथ पत्र दाखिल किया है, उसके मुताबिक उनके पास कोई गाड़ी नहीं है. हालांकि उनकी पत्नी के पास 6.20 लाख लाख रुपए की मारूति बेलोनो है. 

इससे पहले 2015 में अरविंद केजरीवाल के पास नकदी और एफडी में 2015 में 2.26 लाख रुपए थे. 

खबरोंके मुताबिक नामांकन के समय दिए गए हलफनामा में केजरीवाल ने बताया था कि उनके पास 3.4 करोड़ रुपए की संपत्ति है और वर्ष 2015 से इसमें 1.3 करोड़ रुपए का इजाफा हुआ है. 2015 में उनकी कुल संपत्ति 2.1 करोड़ रुपए की थी.

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केजरीवाल की पत्नी सुनीता केजरीवाल के पास 2015 में नकदी और सावधि जमा (एफडी) 15 लाख रुपए की थी जो 2020 में बढ़कर 57 लाख रुपये हो गया. 

मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक पार्टी के एक पदाधिकारी ने कहा था कि स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति लाभ (वीआरएस) के तौर पर सुनीता केजरीवाल को 32 लाख रुपए और एफडी मिले बाकी उनका बचत धन है. 

उनकी पत्नी की अचल संपत्ति के मूल्यांकन में कोई बदलाव नहीं हुआ है जबकि केजरीवाल की अचल संपत्ति 92 लाख रुपये से बढ़कर 177 लाख रुपये हो गई. 2015 में केजरीवाल की जितनी अचल संपत्ति थी, उसके भाव में बढोतरी के कारण यह यह वृद्धि हुई है.

राजनीति में आठ साल का सफर 

अरविंद केजरीवाल इस बार नई दिल्ली से चुनाव जीते हैं और चांदनी चौक में वोटर के तौर पर उनका नाम दर्ज है. दिल्ली में आम आदमी पार्टी की यह हैट्रिक है और उसने दूसरी बार प्रचंड बहुमत के साथ सत्ता में वापसी की है.

साल 2010 में अरविंद केजरीवाल ने समाजसेवी अन्ना हजारे के साथ भ्रष्टाचार के खिलाफ मुहिम शुरू की थी. लोकपाल को लेकर आंदोलन में केजरीवाल सुर्खियों में आए.

बाद मे अन्न हजारे से मतभेद के वजह से केजरीवाल अलग हुए और साल 2012 में उन्होंने आम आदमा पार्टी का गठन किया. 

तब राजनीति में आने का ऐलान करते हुए केजरीवाल ने कहा, "आज इस मंच से हम ऐलान करना चाहते हैं कि हां हम अब चुनाव लड़ कर दिखाएंगे. आज से देश की जनता चुनावी राजनीति में कूद रही है और तुम अब अपने दिन गिनना चालू कर दो."

2013 के विधानसभा चुनाव आप ने 28 सीटों पर जीत दर्ज की. और कांग्रेस के साथ मिलकर अरविंद केजरीवाल के नेतृत्व में सरकार बनाई.

लेकिन कांग्रेस को लेकर केजरीवाल असहज स्थिति का सामना करते रहे. नौबत इस्तीफा पर आ पहुंचा. उन्होंने 47 दिन तक सरकार चलाने के बाद मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा दे दिया.

दिल्ली में फिर 2015 में विधानसभा चुनाव हुआ. और इस बार केजरीवाल का डंका बजा. इस चुनाव में उन्होंने ऐतिहासिक सफलता हासिल की. आम आदमी पार्टी (आप) को 70 में से 67 सीटों पर जीत मिली.करीब 15 साल तक सत्ता में रही कांग्रेस का सूपड़ा साफ हो गया, जबकि मोदी मैजिक भी दिलील में बेअसर रहा. बीजेपी को तीन सीटों पर संतोष करना पड़ा. 

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2020 के चुनाव नतीजे 11 फरवरी के सामने आए हैं. इसमें केजरीवाल ने प्रचंड बहुमत हासिल कर भारतीय राजनीति में एक धुरी बनकर उभरे हैं. हालांकि आप को 2015 की तुलना में 4 सीटें कम मिली हैं, लेकिन सत्ता में दोबारा वापसी और वोट में दबदबा कायम रखना उनके लिए बेहद अहम माना जा रहा है. 

दिल्ली विधानसभा की 70 सीटों में आप को 62 सीटों पर जीत मिली है. चुनाव आयोग के आंकड़ों के अनुसार, आप को दिल्ली विधानसभा चुनाव में 53.6 प्रतिशत वोट मिले हैं.

बीजेपी को 8 सीटों पर जीत मिली है. जबकि बीजेपी को 38.51 वोट मिले हैं. कांग्रेस का खाता नहीं खुला है. अलबत्ता कांग्रेस के 63 उम्मीदवारों की जमानत जब्त हो गई है. 

जब चाहा नौकरी छोड़ी

हरियाणा के हिसार में एक साधारण परिवार में जन्में अरविंद केजरीवाल पढ़ाई ने आईआईटी खड़गपुर से इंजीनियरिंग की पढ़ाई की है. इसके बाद टाटा स्टील में असिस्टेंट मैनेजर की नौकरी की. तीन साल तक नौकरी करने से ऊब जाने के बाद उन्होंने सिविल सर्विस की परीक्षा की तैयारी शुरू की. 

साल 1995 में वे आईआरएस बने. फिर इनकम टैक्स विभाग की नौकरी छोड़ी. साल 2002 में भारतीय राजस्व सेवा से छुट्टी लेकर दिल्ली के सुंदरनगरी इलाक़े में सामाजिक कार्यकर्ता की भूमिका में सामने आए. 

केजरीवाल ने एक ग़ैर-सरकारी संगठन स्थापित किया जिसे 'परिवर्तन' नाम दिया गया. केजरीवाल अपने कुछ दोस्तों के साथ मिलकर इस इलाक़े में ज़मीनी बदलाव लाना चाहते थे.

वक्त आगे बढ़ता रहा. फिर वह दौर आया जब करप्शन के सवाल पर आंदोलन का झंडा थामा और आगे बढ़ते हुए सफल राजनेता के तौर पर शुमार हो गए. 

साधारण वेशभूषा में रहना, नीली वैगनआर कार से चलना और शिक्षा, स्वास्थ्य के क्षेत्र में आमूलचूल परिवर्तन तथा बुनियादी सुविधाएं बहाल करने के लिए केजरीवाल का विजनरी चेहरा सामने आया.

शिक्षा की गुणवत्ता में सुधार के दावे को केेजरवाल की सरकार ने चुनावी मुद्दों में शामिल किया. 

आम आदमी का मिजाज के साथ राजनीतिक हवा का रुख भांपने में भी वे अव्वल होते रहे. इस बार के चुनाव में उन्होंने कांटा से कांटा निकालने का भी हुनर आजमाया.

बीजेपी केजरीवाल पर हमला करती रही और वे इन हमलों के बदले लोगों की सहानुभूति समेटने की कोशिश करते रहे. 

उन्होंने मन मिजाज के अनुसार अपनी टीम बनाई. राजनीति का दांव- पेंच भी बखूबी सीखी. मफलर मैन के नाम से उन्हें पुकारा जाने लगा. 

सरकार में रहकर उन्होंने जो काम किए उसका भी लाभ मिलता दिख रहा है.

जाहिर है बीजेपी की तगड़ी घेराबंदी को जन बल पर ध्वस्त करते हुए सत्ता में वापसी के लिए केजरीवाल को देश भर से बधाइयों का तांता लगा है. और वे सबका शुक्रिया अदा कर रहे हैं. 


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