वीडियो: जेपीएससी देख, सारी उम्र निकली जाए, पांच साल में एक परीक्षा, नतीजे का पता नहीं

वीडियो: जेपीएससी देख, सारी उम्र निकली जाए, पांच साल में एक परीक्षा, नतीजे का पता नहीं
Publicbol -File Photo (राजधानी रांची में विरोध प्रदर्शन करते छात्र)
नीरज सिन्हा ,   Jul 27, 2019

एक परीक्षा की तैयारी में दो साल. अगर सफल नहीं हुए, तो अगली परीक्षा के लिए पांच साल का इंतजार. और जो परीक्षाएं पहले हो चुकी हैं उनमें  जिस किस्म की गड़बड़ियां सामने आई, यकीन मानिए भरोसा हिल जाता है. इसलिए झारखंड लोक सेवा आयोग से मुंह ही मोड़ लिया. हालांकि इसका गम भी रहा. उम्र के साथ पारिवारिक परिस्थितियों का तकाजा भी है. लिहाजा एक अदद नौकरी तो चाहिए होगी. इसके लिए बैकिंग की तैयारी में जुटा हूं. और इस  राह में हम अकेले भी नहीं. झारखंडी युवाओं की बड़ी तादाद है, जिन्होंने जेपीएससी से तौबा कर लिया है. 

राजधानी रांची के निकटवर्ती कांके ग्रामीण इलाके के शमशाद अंसारी एक सांस में यह बोल कर खामोश हो जाते हैं. अपने पीछे बैठे एक युवा आयुष की ओर इशारा करते हुए शमशाद बताने लगे कि उनसे बात कीजिए. जेपीएससी के दर्द का अंतहीन सिलसिला वो तफ्सील से बताएंगे. 

लोकसभा चुनाव के बाद झारखंड में विधानसभा चुनाव का शोर शुरू है. लेकिन रखंड लोक सेवा आयोग की परीक्षा, नौकरियां,नियुक्तियां, शिक्षण संस्थानों के हालात मुद्दे बनकर उछाले जाएंगे, यह परखा जाना बाकी है. दरअसल एक अदद नौकरी की आस में लाखों युवा हैरान- परेशान हैं.

इधर झारखंड लोकसेवा आयोग की छठीपरीक्षा पांच साल में ली तो गई, तो छह महीने से युवा रिजल्ट के इंतजार में हैं. क्या होगा, क्या नहीं इसे लेकर चिंता की लकीरें भी उनके माथे पर झलकती है. बहुत युवाओं ने जेपीएससी के नाम से तौबा कर ली है. 

इसी सिलसिले में हम युवाओं का मिजाज टटोलने निकले थे कि नौकरी की आस में वे कहां खड़े हैं और उनके जेहन में क्या सवाल हैं. 

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शमशाद अंसारी ने गणित प्रतिष्ठा की पढ़ाई पूरी की है. शमशाद कहते हैं कि घर वालों की उम्मीदें लगी है कि बेटा ने बीएससी की पढ़ाई मेहनत के साथ अच्छे अंकों से पास की है, तो एक अदद नौकरी भी हासिल करे. शमशाद अंसारी प्रतियोगिता परीक्षा की तैयारी करने सेंट्रल लाइब्रेरी आते हैं. उसने मुलाकात वहीं पर हुई थी. 

बानगी

हालांकि यह बानगी भर है. जमींदोज होता सिस्टम और नौकरी की आस में तबाह होती लाखों युवा ज़िंदगी का दर्द झारखंड में बेहद करीब से देखा-समझा जा सकता है. काफी विरोध प्रदर्शन, सवाल और युवाओं में हताशा-निराशा के बीच छठी जेपीएससी की परीक्षा के छह महीने गुजरे, पर अब तक नतीजे नहीं निकले. खबरों के मुताबिक कॉपियां जांचने की कोशिशें जारी है.

विवादों और आरोपों से घिरे जेपीएससी की परीक्षाओं पर राज्य का कोई होनहार युवा जब यह कहता है, 'किसी को यह बताने पर कि जेपीएससी की तैयारी कर रहा हूं, तो शक़ की नज़रों से देखा जाता हूं. लोग टिप्पणी करने से बाज़ नहीं आते कि वही घपले-घोटाले वाली परीक्षा ना'? जाहिर है यह पीड़ा मामूली नहीं.

दरअसल अलग राज्य गठन के 18 साल हो गए हैं. इन 18 सालों में झारखंड सिविल सेवा की सिर्फ़ पांच परीक्षाएं ली जा सकी हैं. अधिकतर परीक्षाएं जांच और सवालों के घेरे में रही हैं. झारखंड लोक सेवा आयोग की दूसरी परीक्षा परिणाम पर तो सीबीआई जांच बैठाई गई है. परीक्षाओं में कथित धांधली को लेकर आयोग के कई पूर्व सदस्य और अधिकारी जेल भी जा चुके हैं.

जेपीएससी-6

फिलहाल जेपीएसी छह की मुख्य परीक्षा के परिणाम का युवाओं का इंतजार है. 326 पदों पर भर्ती के लिए यह प्रक्रिया वर्ष 2015 से ही चल रही है.

मुख्य परीक्षा इसी साल काफी विवादों के बीच 28 जनवरी को ली गई थी. इससे पहले जेपीएससी छह की परीक्षा को लेकर विरोध प्रदर्शन का लंबा दौर चलता रहा. विरोध प्रदर्शन की वजहों के अलावा कुछ और अहम बातों की चर्चा आगे की जाएगी. फिलहाल बात युवाओं की बेबसी और उनके जेहन में घूमते सवालों पर. 

आयुष भी झारखंड लोक सेवा आयोग की परीक्षा देकर परिणाम के इंतजार में हैं. साथ ही दूसरी प्रतियोगिता परीक्षा की तैयारी में जुटे हैं.

आयुष बता रहे हैं कि मेहनत मारी जा रही और उम्र निकली जा रही

राजधानी रांची के डोरंडा इलाके के रहने वाले आयुष कहते हैं, '' आप इसे जुमला पब्लिक सर्विस कमीशन कह सकते हैं. 2015 में छठी परीक्षा के लिए विज्ञापन जारी होता है और 2019 में युवा परिणाम का इंतजार कर रहे हैं.  इससे पहले एक परीक्षा के लिए पांच सालों तक कई किस्म के फेरबदल, नोटिस का सामना करना आसान नहीं होता. भरोसा हिल जाता है.यूथ मेंटल ट्रॉमा के दौर से गुजरने को विवश हैं. उम्र निकली जा रही है. इस हाल में बेबसी समझ सकते हैं. पढ़ने का जुनून थम सा जाता है. अगर आप मेहनत कर रहे हैं, तो उसका आउटपुट निकलना चाहिए. और समय के साथ. आखिर लैप्सेस कहां हो रहे हैं, इस बारे में सिस्टम और सरकार को गंभीरता से सोचना चाहिए. जबकि दूसरे राज्यों में ये हालात नहीं हैं''. 

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गोड्डा की रहने वालीं सरिता ने दिल्ली स्थित करोड़ीमल कॉलेज से एमए की पढ़ाई पूरी की हैं. 12 वीं तक की पढ़ाई उन्होंने गोड्डा से की थी. सरिता यूपीएससी की परीक्षा में भी बैठीं, लेकिन सफल नहीं हो सकी. वो बताती हैं कि कुछ सालों पहले लगा अपने राज्य की प्रशासनिक सेवा में अवसर देखा जाना चाहिए. इसके बाद वो झारखंड आ गईं. और जेपीएससी की तैयारी में जुट गईं. फिलहाल जेपीएससी मुख्य परीक्षा के परिणाम का उन्हें इंतजार है.

सरिता कहती हैं, ''पांच साल में एक परीक्षा, बहुत कड़वा अनुभव रहा. इस बीच वे बिहार लोक सेवा आयोग की तैयारी में जुटी हैं. साथ ही पीएचडी के लिए भी पढ़ाई शुरू की है''. 

सरिता बताती हैं कि उनके साथ पढ़ने वाले कई साथी भी बिहार में आयोग की परीक्षा और टाइम बॉंड को झारखंड से ठीक स्थिति में देख रहे हैं. वो कहती हैं कि जेपीएससी की छठी परीक्षा को लेकर जिस तरह से विवाद हुआ और परीक्षा टाली जाती रही उससे युवाओं को नुकसान का सामना करना पड़ा है. पीएचडी करने के ख्याल के बारे में वो कहती हैं कि एकेडमिक करियर तो नहीं रोक सकती.  

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आंदोलन का एक लंबा दौर देखा है झारखंडी युवाओं ने 

ऐसे हुई जेपीएससी की परीक्षा

साल 2015 में विज्ञापन जारी हुआ और उसी साल प्रारंभिक परीक्षा के लिए फॉर्म भरवाए गए.

2016 के अगस्त महीने में पाठ्यक्रम में संशोधन हुआ, पहला विज्ञापन रद्द, नए सिरे से फॉर्म भरने के आदेश.

28 नवंबर 2016 को प्रारंभिक परीक्षा आयोजित, फरवरी 2017 में प्रारंभिक परीक्षा का परिणाम जारी.

इस रिजल्ट पर आरक्षित श्रेणी के छात्रों का विरोध,11 अगस्त 2017 को जारी होता है संशोधित रिजल्ट.

फिर 7 नवंबर 2017 से मुख्य परीक्षा की घोषणा, बाद में परीक्षा की तिथि बढ़ाकर 29 जनवरी 2018.

इससे पहले  24 जनवरी को परीक्षा स्थगन की सूचना. तब जाकर 28 जनवरी 2019 को हुई मुख्य परीक्षा. और छह महीने से रिजल्ट का इंतजार

क्या हुआ था 27 जनवरी को 

गौरतलब है कि जेपीएससी की प्रारंभिक परीक्षा के परिणाम दो बार संशोधित किए गए हैं. 326 पदों के लिए 34 हजार से ज्यादा परीक्षार्थी मुख्य परीक्षा में शामिल हुए हैं. इससाल 27 जनवरी की देर रात तक छात्रों का एक हुजूम परीक्षी स्थगित किए जाने की मांग को लेकर जेपीएससी के दफ्तर के सामने प्रदरेशन कर रहे थे. सड़कों पर कतार में खड़े होकर छात्र मोमबत्तियां जलाए हुए तथा राष्ट्रगीत गाकर विरोध करते दिखे थे. 

प्रांरभिक परीक्षा में आरक्षण का प्रावधान लागू नहीं किए जाने, विज्ञापन के खिलाफ जाकर मुख्य परीक्षा के लिए 15 गुणा के बजाय 106 गुणा अभ्यर्थियों की सूची जारी करने समेत अन्य कई मांग को लेकर अभ्यर्थियों और छात्र प्रतिनिधि परीक्षा स्थगित करने के लिए आंदोलन का एक लंबा दौर रहा है. छात्रों का यह भी कहना है कि परीक्षा प्रक्रिया के बीच में ही नियमावली में परिवर्तन नहीं किया जा सकता है.

जब विधानसभा में 

झारखंड विधानसभा में भी जेपीएससी को लेकर सवाल उठते रहे हैं. इसी साल 28 जनवरी को बजट सत्र के दौरान इस मामले पर काफी शोर शराबा हुआ. विपक्ष के हंगामे के बीच सदन की कार्यवाही बार- बार स्थगित करनी पड़ी.

इन सबके बीच स्पीकर की एक टिपप्णी से सबको सन्न कर दिया, जब उन्होंने दुखित होकर कहा, 'इस समस्या/ विवाद का निदान नहीं निकाल सकते, तो विधानसभा को बंद क्यों नहीं कर दिया जाए'.

दरअसल राज्य की सबसे बड़ी पंचायत में बार- बार और भारी हंगामे के बीच स्पीकर का यह सवाल सिर्फ सरकार से नहीं विपक्ष से भी था.  

खिलवाड़ 

गौरतलब है कि सात फरवरी 2018 को सरकार ने मंत्रिमंडल (कैबिनेट) की बैठक में मुख्य परीक्षा में शामिल होने के लिए प्रारंभिक परीक्षा के कट ऑफ मार्क घटाने का फैसला लिया गया. इस फैसले के तहत प्रारंभिक परीक्षा में सामान्य वर्ग में 40 फीसदी, पिछड़ा वर्ग में 36.5 फीसदी, अति पिछड़ा वर्ग में 34 प्रतिशत तथा अनुसूचित जन जाति अनुसूचित जाति (एसटी/एसी) में 32 प्रतिशत अंक लाने वाले अभ्यर्थी अब मुख्य परीक्षा में शामिल हो सकेंगे.

सरकार के इस फैसले से लगभग 34 हज़ार अभ्यर्थियों के मुख्य परीक्षा में शामिल हुए जबकि पहले इनकी संख्या 6103 होती.कैबिनेट के इस फैसले के विरोध में भी आदिवासी छात्रों-संगठनों ने आंदोलन किया था. अजय टोप्पो सरकार पर तंज़ कसते हुए कहते हैं कि वे लोग आरक्षण के अनुपालन के साथ अधिकार, पारदर्शिता की मांग कर रहते रहे और सरकार हमारी उलझनें बढ़ाने में लगी रही. 

अजय के सवाल भी है, एक परीक्षा में पांच साल, आख़िर युवाओं के भविष्य से खिलवाड़ कौन कर रहा है. अगर आरक्षण नीति के प्रावधान का पालन होता तो आरक्षित वर्ग के वैसे अभ्यर्थी जो अनारक्षित वर्ग के समान या ज़्यादा अंक लाते हैं और उम्र सीमा का लाभ नहीं लेते हैं तो उन्हें अनारक्षित वर्ग भेजकर उत्तीर्ण किया जाता.

जाहिर है झारखंडी युवा नौकरी की आस में हताश, निराश नजर आते हैं, लेकिन चुनावों में ये मु्द्दे नहीं बनते. 


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