झारखंडः क्या चुनावी मुद्दे बनेंगे, जब प्रसव पीड़िता को खाट पर लाद कर सात किलोमीटर पैदल चलते रहे

झारखंडः क्या चुनावी मुद्दे बनेंगे, जब प्रसव पीड़िता को खाट पर लाद कर सात किलोमीटर पैदल चलते रहे
Prashant
पीबी ब्यूरो ,   Mar 15, 2019

आदिवासी महिला चमेली कुमारी उन पलों को ताउम्र भूलना नहीं चाहेंगी. प्रसव पीड़ा से कराहती यह महिला और उन्हें खाट पर लाद कर पैदल चलते उनके परिजन. वे तेज कदमों से सात किलोमीटर चलते रहे और झुमरा पहाड़ पहुंचे. 

इसी पहाड़ पर बसे गांवों के विकास और लोगों को आखिरी कतार से निकालने के लिए करोड़ों रुपए का 'झुमरा एक्शन प्लान' बनाया गया है. और इस प्लान को लेकर सरकार से लेकर सिस्टम बड़े- बड़े दावे करता रहा है. 

जबकि चमेली और उनके परिजन बताते हैं कि गांव का गांव इसी हाल में जीता है. 

यह जगह झारखंडी का राजधानी रांची से करीब सवा सौ किलोमीटर दूर है. बोकारो जिले के गोमिया प्रखंड के पचमो पंचायत का झुमरा पहाड़ नक्सलियों के बसेरा के लिए भी जाना जाता रहा है. साथ ही इस इलाके में आदिवासियों की बड़ी आबादी आखिरी कतार में शामिल रही है. चमेली कुमारी सिमराबेड़ा गांव की रहने वाली हैं. और सिमराबेड़ा से झुमरा तक सड़क नहीं है. 

खेत- पगडंडी

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लिहाजा खेतों- पगडंडियों में पैदल चलने के बाद प्रसव पीड़िता को लेकर उनके परिजन झुमरा पहाड़ पर पहुंचे थे. यहां से एक निजी वाहन लेकर साठ किलोमीटर दूर गोमिया पहुंचे. गोमिया में उन्हें प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र में भर्ती कराया गया. चमेली देवी ने एक बच्ची को जन्म दिया है. और अभी जच्चा- बच्चा दोनों ठीक हैं. 

हालांकि झारखंड में इस तरह की तस्वीर कोई पहली नहीं है और न ही आखिरी. स्वास्थ्य व्यवस्था को लेकर दूरदराज के गांवों में सिस्टम दम तोड़ता नजर आता है और लोग अपने नसीब पर जीते हैं. 

मुखिया की मदद

झुमरा पहाड़ के सिमराबेड़ी गांव की रहने वाली चमेली की मदद में मुखिया रेणुका देवी और उनके प्रतिनिधि आनंद सागर मददगार बन सके. मुखिया को चमेली की हालत की जानकारी मिली, तो वे झुमरा पहाड़ पर पहुंची. इसके बाद रेणुका देवी ने इधर- उधर संपर्क करना शुरू किया और एक निजी वाहन उपलब्ध कराने में सफल रही. मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक मुखिया ने बताया है कि पचमो पंचायत में ममता वाहन उपलब्ध नहीं है. दो साल पहले एक्शन प्लान के तहत झुमरा पर अस्पताल तो बनाए गए, लेकिन अब तक उसे चालू नहीं किया जा सका है. पचमो पंचायत में आठ गांव हैं. और इन आठ गावों के लोग एक एनएनएम के भरोसे हैं. 

वो सात घंटे

गुरुवार अहले भोर करीब तीन बजे आदिवासी महिला को प्रसव पीड़ा हुई. घर और गांव की महिलाएं संभालने की स्थिति में नहीं थीं. इसके बाद घर के लोगों ने खाट पर लादकर घर से निकल पड़े. सिमराबेड़ा से झुमरा और झुमरा से गोमिया. पूरे सात घंटे के बाद वेलोग अस्पताल पहुंचे. यह उस राज्य की तस्वीर है जिसे चलाने के लिए 90 हजार करोड़ का भारीभरकम बजट बनता है. और केंद्रीय सहायता अलग से. 

हालात

राज्य के स्वास्थ्य विभाग का योजना मद का बजट 2600 करोड़ है. इसमें दवाओं पर 90 करोड़ खर्च होते हैं. पिछले दिनों प्रभात खबर की पड़ताल करती एक रिपोर्ट में ये तथ्य सामने आए थे कि झारखंड में 3000 से अधिक अस्पताल ऐसे हैं, जहां न बिजली है और न ही पानी. वहीं, लगभग 1000 के अस्पताल किराये के भवन में चल रहे हैं.

यह हाल झारंखड के सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र (सीएचसी) और स्वास्थ्य उपकेंद्र (हेल्थ सब सेंटर) का है. राज्य में इस समय में 188 सीएचसी और 3958 हेल्थ सब सेंटर हैं. इनमें से 3000 में बिजली नहीं है. वहीं, 2200 उपकेंद्रों में पानी की सुविधा भी नहीं है.

हमला

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कांग्रेस के वरिष्ठ नेता और पूर्व केंद्रीय मंत्री सुबोधकांत सहाय कहते हैं कि ये तस्वीर और हालात सरकार को न डराती है और ही दुख पहुंचाती है. इसके बावजूद अस्पतालों में दवाएं नहीं मिलती हैं. सरकार आंकड़ों की बाजागरी तथा रैंकिग, इंडैक्स का दंभ जरूर भरती है. चुनावों में हमारे लिए ये मुद्दे हैं.  

झाविमो विधायक प्रदीप यादव कहते हैं कि पिछले साल गोड्डा के एक सुदूर गांव की तस्वीर देखते ही देखते सोशल मीडिया पर वायरल हो गई थी जिसमें मरीज को खाट पर लादकर लोग नदी पार कर रहे थे. उनका कहना है कि स्वास्थ्य और शिक्षा के क्षेत्र में सरकार की विफलता लगातार सामने आती रही है. 

वहीं जेएमएम के केंद्रीय महासचिव सुप्रियो भट्टाचार्य बताते हैं कि एक- एक चीज हमारे जेहन में है. हम चुनावों में जनता की ही बात करेंगे. 

इस तस्वीर और हालात को लेकर स्वास्थ्य मंत्री से संपर्क करने का प्रयास किया गया है. उनका पक्ष मिलते ही शामिल किया जाएगा. 


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