झारखंडः 2004 में क्यों बीजेपी की करारी हार हुई थी और कैसे बजा था यूपीए का डंका

झारखंडः 2004 में क्यों बीजेपी की करारी हार हुई थी और कैसे बजा था यूपीए का डंका
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नीरज सिन्हा ,   Mar 16, 2019

अलग राज्य गठन के बाद झारखंड लोकसभा के चौथे चुनाव में भाग लेगा. पंद्रह नवंबर 2000 को अलग राज्य का गठन हुआ था. इसके बाद 2004 में झारखंड ने लोक सभा का पहला चुनाव देखा. तब केंद्र और राज्य में बीजेपी की सरकार थी. लेकिन सत्ता में रहते झारखंड में बीजेपी की करारी हुई थी. यूपीए ने राज्य की 14 में से 13 सीट झटक लिए थे.

पुराने पन्ने पलटने के साथ ये पूछा जा सकता है कि 2004 में भारी उलटफेर हुआ कैसे. केंद्र और राज्य में सत्तारूढ़ रहने के बाद भी झारखंड में बीजेपी की करारी हार क्यों हुई. 

बीजेपी से सिर्फ बाबूलाल मरांडी ने कोडरमा की सीट जीत कर पार्टी की लाज बचाई थी. अलबत्ता हजारीबाग से यशवंत सिन्हा और खूंटी से कड़िया मुंडा जैसे दिग्गज भी चुनाव हारे और पूरे पंद्रह सालों बाद सुबोधकांत सहाय ने रांची में बीजेपी से सीट छीन ली थी. 

शाइनिंग इंडिया

वरिष्ठ पत्रकार और बीजेपी को लंबे समय तक कवर करते रहे चंदन मिश्रा बताते हैं कि बीजेपी अति आत्मविश्वास में थी. पार्टी में शाइनिंग इंडिया का शोर था. और रणनीतिकार से लेकर उम्मीदवार तक फीलगुड महसूस कर रहे थे. लेकिन देश स्तर पर अंदर से उनकी जमीन खिसकती जा रही थी. चुनावों में उन्हें इसका अंदाजा उन्हें नहीं लगा. झारखंड भी इससे अलग नही था.  

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इसके अलावा झारखंड में कई सीटों पर बीजेपी के उम्मीदवारों को भितरघात का सामना करना पड़ा. कई सीटों पर जदयू ने भी उम्मीदवार खड़े कर दिए थे. उधर यूपीए में गठबंधन का असर जोरदार साबित हुआ.

2004 में बीजेपी से बाबूलाल अकेला जीत सके थे (Publicbol)

चंदन मिश्रा आगे कहते हैं कि झारखंड में बीजेपी विरोधी वोट का समीकरण प्रभावी है, इससे इनकार नहीं किया जा सकता. 2004 में जब सभी लोग मिल गए, तो परिणाम उनके पक्ष में गया. इसके अलावा यूपीए ने चुनाव संजीदगी से लड़ा था और बीजेपी के खिलाफ माहौल बनाने में उसके नेता- रणनीतिकार सफल रहे. जबकि बीजेपी में सांगठनिक ढांचा बिखरा सा दिखा और चुनावी प्रबंधन के मोर्चे पर भी उनकी विफलता उजागर हुई. लेकिन 2004 के बाद के चुनावों में बीजेपी संभलती चली गई. 

वो गठबंधन 

2004 के चुनाव में झारखंड में गठबंधन के तहत कांग्रेस ने छह, जेएमएम पांच, राजद दो और भाकपा एक सीट पर चुनाव लड़ी थी. जेएमएम से चंपा देवी कोडरमा की सीट हार गई थी. बाकी तेरह सीटों पर यूपीए के सभी उम्मीदवार जीत गए. 

हजारीबाग में भाकपा के भुवनेश्वर मेहता ने यशवंत सिन्हा को हराया था. तब यशवंत सिन्हा वाजपेयी जी की सरकार में मंत्री थे. 2004 के चुनाव में सोनिया गांधी, लालू प्रसाद, शिबू सोरेन, एबी बर्धन, डॉ शकील अहमद सरीखे नेता यहां मोर्चा संभाल रहे थे. 

दुमका में परचम लहरा था शिबू सोरेन का (Publicbol)

अलग राज्य गठन के बाद झारखंड में सत्ता की बागडोर संभालने का मौका नही मिलने का गुस्सा जेएमएम में पहले से था. सो जेएमएम  झारखंड के इस पहला पहला चुनाव में बीजेपी से बदला लेना चाहता था. लिहाजा संतालपरगना और कोल्हान में जेएमएम ने बीजेपी की घेराबंदी कर दी थी. 

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उस समय राजद के भी झारखंड में नौ विधायक थे. और लालू प्रसाद यूपीए के बड़े रणनीतिकार माने जा रहे थे. लिहाजा पलामू और चतरा की सीट जीतकर राजद ने अपना दबदबा दिखाया. 

इधर सरकार में शामिल जेडीयू और आजसू ने कई सीटों पर उम्मीवार खड़े कर दिए थे. हालांकि आजसू बीजेपी का कुछ बिगाड़ नहीं सकी, लेकिन पलामू और चतरा में जदयू ने बीजेपी की जरूर बाट लगा दी.  

चतरा से इंदर सिंह नामधारी जदयू के उम्मीदवार थे. एक लाख 2663 वोट लाकर वे दूसरे नंबर पर रहे. जबकि बीजेपी के उम्मीदवार नागमणि को 99 हजार 659 वोट मिले थे और वे तीसरे नंबर पर थे. जबकि चुनाव जीते धीरेंद्र अग्रवाल को एक लाख 21 हजार 459 वोट ही मिले थे. 

दिग्गज यशवंत सिन्हा हजारीबाग से हार गए थे (Publicbol)

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हम क्या करते

उन दिनों की बात याद करते हुए इंदर सिंह नामधारी कहते हैं ''हम क्या करते. जदयू ने बीजेपी से लोकसभा में दो सीट मांगी थी. बीजेपी को यह लगा कि जदयू गुनाह कर रहा है. पार्टी ने चुनाव लड़ने का फैसला लिया. हमें चतरा में उतारा गया. हम महज 19 हजार वोटों से हारे. तभी मैंने ठान ली थी कि चतरा से फिर लड़ूंगा. 2009 में बीजेपी और राजद दोनों को हराया''.  

नामधारी कहते हैं कि गुंजाइश है कि इन्हीं बातों से संभलने की फिराक में बीजेपी ने पांच बार के सांसद को बैठाकर आजसू को गिरिडीह की सीट देकर खुश रखने का प्रयास किया है. दूसरे राज्यों में भी बीजेपी छोटे दलों की तरफ हाथ बढ़ा रही है. 

इन सबके बावजूद झारखंड में अगर विपक्ष एकजुट हो गया, तो बीजेपी की नींद हराम हो जाएगी. नामधारी बताते हैं कि 2004 में यूपीए ने कई विधायकों को लोकसभा के मैदान में उतारा था और वे पहले से फॉर्म में थे. साथ ही बेजेपी को एंटी इनकंबेसी का सामना करना पड़ा. 

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2019 के चुनाव में क्या यूपीए का कोई मजबूत गठबंधन बना, तो बेजीपी को खतरा होगा, इस सवाल पर नामधारी कहते हैं बेशक बीजेपी की नींद उड़ जाएगी. 

लेकिन 2014 में बीजेपी ने विशाल वोट बैंक बनाया. और अब उनके पास प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का ब्रांड है और अमित शाह जैसे खेवनहार तथा रणनीतिकार हैं, इस सवाल पर नामधारी कहते हैं, विपक्षी दलों के वोट बैंक भी देखा जाना चाहिए. बीजेपी के 47 लाख हैं तो उनके मिल जाने पर पचास लाख पार हो गए थे. नामधारी कहते हैं कि बीजेपी में अंहकार आया है इसे भी नहीं भूलना चाहिए. चुनावों में इसका असर हो सकता है. साथ ही पिछले चुनावों में किए गए वादों का हिसाब भी देना होगा. 

अबकी वही होगा

जेएमएम के केंद्रीय महासचिव सुप्रियो भट्टाचार्य कहते हैं कि 2004 में बीजेपी की लाज बचाने वाले बाबूलाल मरांडी भी अब हमारे साथ हैं. जाहिर है अबकी बार बीजेपी की झारखंड में ढिबरी भी नहीं जलेगी. 2004 के चुनाव में बीजेपी की करारी हार को उस गुस्से के तौर पर भी देखा जाना चाहुए जब अलग राज्य गठन के बाद गुरुजी को सरकार में आने का मौका नहीं नहीं दिया गया. जिसके वे हकदार थे.

सुप्रियो कहते हैं कि हाल के उपचुनावों के परिणाम देख लीजिए झारखंड बीजेपी को हराने के लिए तैयार बैठा है. बस विपक्ष को एक साथ आना है. 

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वोट के आइने में 

बीजेपीः लड़े 14 सीटों पर. वोट मिले 30 लाख 90 हजार 198 ( 33.01 प्रतिशत)  जीत एक 

जदयूः  लड़े 5 पर, वोट मिले तीन लाख 56 हजार 106 (3.80 प्रतिशत) सभी पर हार 

यूपीएः लड़े 14 पर, वोट मिले 38 लाख 84 हजार 259 ( 45.03 प्रतिशत)   जीते 13 सीट

वो दौर पीछे छूट गया

जबकि बीजेपी के प्रदेश प्रवक्ता प्रवीण प्रभाकर कहते हैं कि वो दौर ( 2004) बहुत पीछे छूट गया है. पिछले लोकसभा चुनाव में बीजेपी ने 47 लाख से अधिक वोट लाकर विपक्ष को अहसास करा दिया है कि बीजेपी का सामना करने की स्थिति में वेलोग नहीं हैं. 

देश का मिजाज नरेंद्र मोदी जी के साथ है. केंद्र और राज्य की सरकार ने जो काम किए हैं वह झारखंड में दिखता है और बोलता भी. बीजेपी का चुनावी प्रबंधन इतना सशक्त होगा कि कोई फैक्टर काम नहीं करेगा. 2009 और 2014 का परिणाम ही देख लीजिए, झारखंड के चुनावी परिदृश्य से कांग्रेस, राजद और वाम दलों का सफाया हो गया है. इस बार जेएमएम की दो सीटें भी छीन ली जाएगी. विपक्ष में नेता कौन हैं, नीति क्या है यह झारखंड समेत देश जानना चाहता है. विपक्ष का कोई पैंतरा काम नहीं आना वाला है. 

 


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