झारखंडः 83 लाख वोट का रिकॉर्ड संभाल पाई बीजेपी, तो विस चुनाव में धाराशायी होगा विपक्ष

झारखंडः 83 लाख वोट का रिकॉर्ड संभाल पाई बीजेपी, तो विस चुनाव में धाराशायी होगा विपक्ष
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नीरज सिन्हा ,   May 28, 2019

एकीकृत बिहार के जमाने से और अलग राज्य गठन के बाद बीजेपी इस इलाके की सभी चौदह सीटों पर कभी जीत दर्ज नहीं कर सकी है. इस बार भी वही हुआ. बीजेपी झारखंड में लोकसभा की सभी 14 सीटें नहीं जीत सकी. बीजेपी गठबंधन के खाते में 12 सीटें आई. लेकिन अहम बात यह रही कि 'प्रचंड मोदी लहर' पर सवार बीजेपी को झारखंड में रिकॉर्ड 82 लाख 72 हजार 582 वोट मिले हैं. 

हालांकि लोकसभा चुनाव के दौरान बीजेपी में निचले से शीर्ष स्तर पर अंत तक खम ठोके जाते रहे कि सभी चौदह सीटों पर पार्टी जीत दर्ज करेगी. बीजेपी को छोड़कर विपक्षी दलों, जमीनी मुद्दों पर संघर्ष करने वाले जन संगठनों और सियासत के समीकरण भांपने वाले जानकारों को बीजेपी के इन दावों पर यकीन नहीं था.

लेकिन नतीजे जब सामने आए , तो कई सीटों पर बीजेपी उम्मीदवारों को अप्रत्याशित छप्पर फाड़ वोट मिले. अब तक बीजेपी को लोकसभा चुनाव में मिले वोट के ये आंकड़े सबसे अधिक है. जाहिर है बीजेपी को इस जीत ने उत्साह से लबरेज कर दिया है. अगले कुछ महीनों के बाद इसी साल राज्य में विधानसभा चुनाव होने हैं.

दो दिन पहले रविवार को मुख्यमंत्री रघुवर दास ने जमशेदपुर में भरोसे के साथ दावा किया है कि विधानसभा चुनाव में दो तिहाई से बहुमत हासिल करेंगे. दरअसल लोकसभा चुनाव में मिली सफलता से रघुवर दास शीर्ष नेतृत्व को भरोसा दिलाने में और कामयाब हुए हैं कि उनके नेतृत्व में चुनावी मोर्चा संभाला जा सकता है. 

बीजेपी के उत्साह और मुख्यमंत्री के दावे के बीच चर्चा और समीक्षा की जा सकती है कि क्या वाकई बीजेपी विधानसभा चुनाव में वोट का यह रिकॉर्ड बचाएगी. अगर बीजेपी इस रिकॉर्ड के आस पास भी ठहर गई, तो विपक्ष का दम फूलता नजर आएगा. साथ ही सत्ता से वह दूर नजर आएगा. 

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परत दर परत तफ्सील से पहले थोड़ा पीछे लौटते हैं.  

35 लाख का उछाल

2014 के लोकसभा चुनाव में भी झारखंड में बीजेपी ने 12 सीटें जीती थी. इस बार 12 सीटों में एक गिरिडीह संसदीय क्षेत्र में बीजेपी की सहयोगी आजसू को जीत मिली है. बीजेपी के वोटों के रिकॉर्ड में गिरिडीह सीट पर आजसू को मिले वोट भी जोडे गए हैं. 

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गौरतलब है कि 2014 के चुनाव में बीजेपी को 47 लाख 44 हजार 315 वोट मिले थे. यानी इस बार बीजेपी को 35 लाख 28 हजार 267 वोट अधिक मिले हैं. बीजेपी और आजसू को 63 विधानसभा क्षेत्रों में विपक्षी दलों के उम्मीदवारों से अधिक वोट मिले. जबकि राज्य में 81 विधानसभा क्षेत्र हैं और विपक्ष में विधायकों की संख्या 32 है. 

विपक्ष के विधायक प्रदीप यादव अपने विधानसभा क्षेत्र पोड़ैयाहाट में जगरनाथ महतो डुमरी में और सुखदेव भगत लोहरदगा विधानसभा क्षेत्र में बीजेपी-आजसू के उम्मीदवार से बढ़त नहीं ले सके. ये तीनों विधायक चुनाव लड़ रहे थे. 

2019- बीजेपी और आजसू गठबंधन को मिले 82 लाख 72 हजार 582 वोट

2014- भारतीय जनता पार्टी को मिले थे 47 लाख 44 हजार 315 वोट 

2019-विपक्ष को मिले 47 लाख 49,657 वोट (जेएमएम, आरजेडी, कांग्रेस, जेवीएम)

2014- विपक्ष को मिले थे 47 लाख वोट (जेएमएम, आरजेडी, कांग्रेस, जेवीएम)

विपक्ष को झटका

वोटों के पैमाने पर विपक्ष को इस लोकसभा चुनाव में झटका का सामना करना पड़ा है. और उसके रणनीतकारों को वोट के आंकड़े चुनाव के नतीजे आने के साथ ही परेशान कर रहे हैं.

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दरअसल इस बार विपक्ष ने गठबंधन के तहत चुनाव लड़ा था. इस चुनाव में कांग्रेस, जेएमएम, जेवीएम और राजद को कुल 47 लाख 49 हजार 657 वोट मिले हैं. 

जबकि 2014 में भी विपक्ष को लगभग 47 लाख वोट मिले थे. हालांकि 2014 में जेवीएम अपने दम पर चुनाव लड़ा था. समझा जा सकता है कि वोटों के बंटवारे रोकने की गरज से एक साथ चुनाव लड़ने के बाद भी विपक्ष के वोट नहीं बढ़े और न ही वे दल अधिक सीट जीत सके. 

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फर्क इतना है कि 2014 में जेएमएम दो सीटों पर जीता था. इस बार कांग्रेस एक और जेएमएम को एक- एक सीट पर जीत मिली है. साथ ही इस बार के चुनाव में वाम दल औंधे मुंह गिरते नजर आए हैं. कोडरमा से माले के विधायक राजकुमार यादव को करारी हार का सामना करना पड़ा है. पिछले चुनाव में वे दूसरे नंबर पर थे.  

करिश्मा सिर्फ एक 

वोट के विशाल स्कोर के साथ बीजेपी के इतराने की बड़ी वजह यह भी है कि विपक्ष में शिबू सोरेन, सुबोधकांत सहाय, बाबूलाल मरांडी, चंपई सोरेन, मनोज यादव सरीखे बड़े नेताओं को हार का सामना करना पड़ा है. 

चुनाव नतीजे आने के बाद बीजेपी और विपक्ष दोनों को बखूबी अहसास है कि यह विशाल वोट बैंक नरेंद्र मोदी के करिश्माई प्रभाव के नतीजे हैं.  

नतीजे ये भी बता रहे हैं कि मोदी की 'प्रचंड लहर’ पर सवार भारतीय जनता पार्टी ने राष्ट्रवाद, हिंदू गौरव और ‘नये भारत’ के मुद्दों को लोकसभा चुनाव में उछालने के साथ भुनाने में पूरी तौर पर सफल रही.

जबकि क्षेत्रीय सवाल या मुद्दे इस चुनाव में कहीं से प्रभावी नहीं हो सके. एक और फैक्टर सामने दिख रहा है - 'साइलेंट वोटर'. जिसने बीजेपी को बड़ा लाभ पहुंचाया. 

कारगर रणनीति 

इससे पहले मध्य प्रदेश, राजस्थान और छत्तीसगढ़ में कांग्रेस की सरकार बनने के बाद बीजेपी हिंदी पट्टी इलाकों को लेकर बेहद सतर्क हो गई थी. खुद बीजेपी अध्यक्ष अमित शाह ने रणनीति का ब्लू प्रिंट तैयार कर झारखंड में बीजेपी नेताओं की जिम्मेदारी तय कर दी थी.  

प्रचार युद्ध और रणनीति में भी बीजेपी ने झारखंड में विपक्षी दलों को थका कर रख दिया. इसी सिलिसले में नरेंद्र मोदी ने लोहरदगा, चाईबासा, जमुआ और देवघर में चुनावी रैलियां की. रांची में पीएम मोदी ने रोड शो किया. 

इनके अलावा अमित शाह, राजनाथ सिंह, पीयुष गोयल, बाबुल सुप्रियो, मनोज तिवारी, हेमा मालिनी, साक्षी महाराज, भूपेंद्र यादव सरीखे नेताओं ने भी प्रचार किया. 

मुख्यमंत्री रघुवर दास सभी 14 उम्मीदवारों के नामांकन में शामिल हुए और चुनावी सभा की. आजसू प्रमुख सुदेश महतो भी अधिकतर जगहों पर मंच साझा करते रहे. जबकि संगठन मंत्री धर्मपाल, झारखंड प्रभारी मंगल पांडेय और भूपेंद्र यादव की रणनीति पर संगठन के कार्यकर्ता बूथ स्तरों पर लगे रहे. संघ ने भी प्रत्यक्ष-परोक्ष तौर पर काफी काम किया. 

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उज्जवला, आयुष्मान, पीएम आवास, किसान सम्मान योजना और स्वच्छ भारत मिशन के लाभुकों तक संगठन और संघ के कार्यकर्ता पहुंचने में सफल रहे. आदिवासी इलाकों में बीजेपी को मिले वोट इसके साफ संकेत माने जा सकते हैं.  

मुख्यमंत्री रघुवर दास ने अपने विधायकों को अलग ही आगाह करा दिया था कि अगर वे अपने क्षेत्र में पिछड़ें, तो विधानसभा चुनाव में मुश्किल होगी.

अब बीजेपी यह जिममेदारी सांसदों को देने जा रही है कि विधानसभा चुनाव में उन्होंने जिम्मेदारी और वोट नहीं संभालें, तो दिक्कत होगी. 

विपक्ष का प्रचार 

इधर विपक्ष के पास स्टार प्रचारक के तौर पर एक ही हेमंत सोरेन का चेहरा था. हालांकि हेमंत सोरेन ने धुआंधार प्रचार किया. जबकि राहुल गांधी सिमडेगा और चईबासा में ही प्रचार करने आए. नवजोत सिद्धू ने धनबाद और चाईबासा में प्रचार किया.  कोडरमा से चुनाव लड़ने के बाद भी बाबूलाल मरांडी कई जगह प्रचार करने जरूर जाते रहे. बाद में सुबोधकांत सहाय न मेर्चा संभाला. 

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लेकिन वोट खत्म होने के बाद तक विपक्षी दलों के रणनीतिकारों और उम्मीदवारों को इसका अभास नहीं था कि ईवीएम खुलेगा, तो एकतरफा जिन्न ही निकलेगा.

मसलन 2014 के चुनाव में धनबाद में बीजेपी के उम्मीदवार पीएन सिंह को रिकॉर्ड 5 लाख 43 हजार 491 वोट मिले थे. और कांग्रेस को उन्होंने लगभग तीन लाख वोट से हराया था.

जबकि इस बार पीएन सिंह को धनबाद में रिकॉर्ड 8 लाख 27 हजार 234 वोट मिले हैं. और उन्होंने कांग्रेस के कीर्ति आजाद को 4 लाख 86 हजार 194 वोट से हराया है. जानकार मानते हैं कि कीर्ति आजाद की जगह कांग्रेस से कोई दूसरा उम्मीदवार भी होता, तो शायद इसी तरह की हार होती. 

लालू ने कहा

इसी सिलसिले में राजद प्रमुख लालू यादव ने आज द टेलीग्राफ में छपी एक खबर का लिंक ट्वीटर पर साझा किया है. लालू ने कहा है, ''हर चुनाव की अपनी अलग कहानी होती है. बीजेपी के पास नरेंद्र मोदी के रूप में एक नेता थे. लेकिन विपक्षी पार्टियां किसी एक चेहरे पर सहमति नहीं बना पाईं. ये बात उनके खिलाफ गई. बीजेपी को उखाड़ फेंकने का विपक्षी पार्टियों का मकसद था लेकिन राष्ट्रीय स्तर पर यह धारणा बनाने में हम असफल रहे.''

उन्होंने कहा है, ''यह सच्चाई है कि मोदी के नेतृत्व वाली बीजेपी के खिलाफ विपक्ष चुनाव हार गया. सभी विपक्षी पार्टियों को यह सामूहिक तौर पर स्वीकार करना चाहिए और आत्मनिरीक्षण करना चाहिए कि सांप्रदायिक और फासीवादी ताकतों को हटाने में क्या गलती हुई.''

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लालू यादव ने यह भी कहा कि सभी विपक्षी पार्टियों को कंफर्ट जोन से निकलना चाहिए. उन्होंने कहा, ''भारत एक बड़ा और विविधता वाला देश है. चुनाव लगातार होते हैं. विपक्षी दलों को अपने राज्य में रणनीति के तहत काम करना चाहिए. उन्हें अपने कार्यकर्ताओं और उन लोगों का मनोबल बढ़ाना चाहिए जिन्होंने लगातार लड़ाई लड़ी है.''

असली सवाल 

लिहाजा इन आंकड़ों और तथ्यों के बीच असली सवाल यही है कि क्या पांच महीने बाद होने वाले विधानसभा चुनाव में बीजेपी इस तरह का परिणाम दोहराएगी. क्योंकि बीजेपी के रणनीतिकार अब से ही विधानसभा चुनाव की तैयारियों में जुट गए हैं. इधर विपक्ष भी इस सेटबैक से संभलने में जुटा है. 

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वरिष्ठ पत्रकार और राजनीतिक विश्लेषक रजत कुमार गुप्ता कहते हैं कि अगर बीजेपी के खाते  विशाल वोट बैंक का रिकॉर्ड दर्ज हो गया है, तो विधानसभा चुनाव में बेशक विपक्ष को परेशान कर सकता है. इसलिए विपक्ष इसे सिरे से खारिज करने के बजाय समीकरण और जमीनी हालात को समझने की कोशिश करे.  

बगोदर के पूर्व विधायक और माले के नेता विनोद सिंह कहते हैं कि वोटों का यह समीकरण बीजेपी को अधिक ऊर्जा, उत्साह दे सकता है, लेकिन विधानसभा चुनाव में यह रिकॉर्ड नहीं दोहराया जा सकता.

विनोद सिंह कहते हैं कि 2014 में भी बीजेपी ने 12 सीटें जाती थी. लेकिन विधानसभा चुनाव में अपने दम पर बहुमत हासिल नहीं कर सकी. आजसू के सहयोग से बीजेपी की सरकार बनी और जेवीएम के छह विधायकों को उसने तोड़ा. 

विधानसभा के चुनाव में क्षेत्रीय सवाल और जमीनी मुद्दे, राज्य सरकार के कामकाज का आंकलन जरूर होगा.

बीजेपी डबल इंजन की सरकार को विकास का पैमाना पहले से बनाती रही है, इसका प्रभाव पड़ सकता है, इस सवाल पर विनोद सिंह कहते हैं कि  जनता को तय करना है. जनता ही तय करेगी कि कौन पांच साल उसकी नुमाइंदगी कर सकता है और जन सवालों पर संघर्ष करने का माद्दा रखता है. 

जेएमएम

केंद्रीय महासचिव सुप्रियो भट्टाचार्य कहते हैं कि चुनाव लड़ने की रणनीति या तैयारियां में हम पीछे नहीं रहे. हेमंत सोरेन की चुनावी सभा बीजेपी के दिगगजों की सभा से ज्यादा भीड़ होती रही. गांव- गिराव के लोग जुटे.

रही बात वोटों समीकरण के, तो पिछले बार से जेएमएम को ज्यादा वोट मिले हैं. पिछले चुनाव में चार सीटों पर जेएमएम को 12 लाख 50 हजार वोट मिले थे जबकि इस बार चार सीटों पर 17 लाख 22 हजार वोट मिले हैं. 

सुप्रियो कहते हैं कि राष्ट्रवाद, हिन्दू गौरव और पुलवामा की घटना को बीजेपी ने जमकर उछाला और लोगों पर उसका प्रभाव पड़ा. लेकिन विधानसभा चुनाव में इसका असर नहीं होगा. क्षेत्रीय सवाल, जमीनी मुद्दों पर बात होगी और लोग सुनेंगे तथा सरकार चलाने वालों से पूछेंगे.

सुप्रियो कहते हैं कि इस तरह की लहर अंदर ही अंदर चल रही थी. जिसे बहुत दल भांप नहीं सके. पब्लिक को नरेंद्र मोदी और अमित शाह की ही बातें अच्छी लगती रही. 

विधानसभा चुनाव में जेएमएम पूरा जोर लगाएगा और हमारा जहां बेस है उस पर बीजेपी लाख कोशिशें करेगी, स्पेस नहीं देंगे.  

सुप्रियो कहते हैं कि पिछले लोकसभा चुनाव में चाईबासा सीट से बीजेपी के लक्ष्मण गिलुआ जीते थे, लेकिन संसदीय क्षेत्र के पांच विधानसभा सीटों पर जेएमएम की जीत हुई. इसलिए यह कोई प्रभावी फैक्टर नहीं होगा. 

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अन्नपूर्णा

हाल ही में बाबूलाल मरांडी ने एक इंटरव्यू में कहा है कि लोगों ने प्रधानमंत्री के तौर पर नरेंद्र मोदी के नाम को समर्थन दिया. जबकि इस तरह के परिणाम आने का भरोसा बीजेपी वालों को भी नहीं रहा होगा.  

कोडरमा में बीजेपी की अन्नपूर्णा देवी ने बाबूलाल मरांडी को 4 लाख 55 हजार वोटों से हराया है. अन्नपूर्णा देवी को रिकॉर्ड 7 लाख 53 हजार 16 वोट मिले हैं. 

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जबकि 2004, 2007 और 2009 में बाबूलाल कोडरमा से चुनाव जीते हैं और 2007 में वे निर्दलीय लड़कर जीते थे.

विस्थापन के सवाल पर आदिवासियों के बीच लंबे समय से काम कर रहे जेरोम जेरॉल्ड कुजूर कहते हैं कि बीजेपी सरकार की नीतियों से सुदूर इलाके और जंगल- पहाड़ के लोगों में गुस्सा था. लेकिन विपक्ष के उम्मीदवार इतने बड़े अंतर से कैसे हारते गए, यही अचरज करता है. जबकि कई सीटों पर बिल्कुल कांटे की टक्कर की तस्वीर उभरी थी. 

कांग्रेस विधायक दल के नेता आलमगीर आलम कहते हैं कि कांग्रेस को जीत एक ही सीट पर मिली है, पर हमारे वोट बढ़े हैं. और लोहरदगा, खूंटी में बहुत मामूली अंतर से हारे. रही बात विधानसभा चुनाव की, तो बीजेपी इस तरह का प्रदर्शन कतई नहीं कर दोहरा सकेगी.  

बीजेपी के प्रवक्ता प्रवीण प्रभाकर कहते हैं कि 2014 के चुनाव में क्या हुआ था, विपक्ष उसे भूल जाए तो अच्छा. केंद्र और राज्य में बीजेपी की स्थायी और पूर्ण बहुमत वाली सरकार ने झारखंड में लंबी लकीर खींच दी है.

लोगों को पता है कि दोनों जगह बीजेपी की सरकार रहने से तेज गति से विकास होगा. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी विश्वास के प्रतीक बनकर सामने हैं. लिहाजा विधानसभा चुनाव में बीजेपी को पूर्ण बहुमत मिलना तय है. इस बार जेएमएम के कब्जे वाली कई सीटों पर बीजेपी ने हजारों वोट से उन्हें पीछे छोड़ा है. नाला में जेएमएम का कब्जा है और वहां शिबू सोरेन 31 हजार वोटों से पीछे रहे हैं. लिहाजा विधानसभा चुनाव में विपक्ष की और बुरी हार होगी.  


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