आधार अनिवार्य, संकट में अनाज का अधिकार, आदिवासियों का कौन है देखनहार

आधार अनिवार्य, संकट में अनाज का अधिकार, आदिवासियों का कौन है देखनहार
Photo-Siraj Dutta (पचाए मुंडुंइया)
सिराज दत्ता ,   Mar 20, 2019

झारखंड के कोल्हान क्षेत्र के हो आदिवासियों के संघर्ष का इतिहास लंबा और जानदार रहा है. चाहे छोटानागपूर के राजा के विरुद्ध हो या अंग्रेजों के खिलाफ़, उन्होंने शोषण और दमन को हमेशा चुनौती दी है. वक्त बदला. दौर बदला. अलग राज्य भी बना. लेकिन अपने ही राज्य में वही हो समुदाय भोजन के अधिकार के लिए महज़ कंप्यूटर सर्वर की रफ़्तार का मोहताज हो गया है. अलबत्ता जन वितरण प्रणाली में आधार की अनिवार्यता के कारण कार्डधारियों को होने वाली समस्याओं का यह एक उदहारण मात्र है. 

राशन के अधिकार पर आधार का पहला प्रहार वैसे परिवार की परेशामी का सबब है जिनका राशन कार्ड समय पर उनके आधार से न जुड़ने के कारण रद्द कर दिया गया. राशन कार्ड से आधार जुड़वाने के लिए बिचौलियों, राशन डीलरों, प्रज्ञा केंद्रों और सरकारी मुलाजिमों द्वारा द्वारा कथित तौर पर पैसे लेना अथवा बार-बार दौड़ाना आम बात है.

ऐसे अनेक परिवार अभी भी अपने राशन से वंचित हैं. 2017 में राशन कार्ड रद्द हो जाने के बाद आज तक हाटगम्हरिया प्रखंड के  रहने वाले वृद्ध आदिवासी पचाए मुंडुईया राशन से वंचित हैं.

पिछले दो वर्षों से राज्य की अधिकांश राशन दुकानों पर पॉस मशीन में आधार-आधारित बायोमेट्रिक प्रमाणीकरण के बाद ही कार्डधारियों को राशन दिया जा रहा है. 

 बायोमेट्रिक प्रमाणीकरण व्यवस्था के कारण हर महीने बड़ी तादाद में लोग राशन से वंचित हो रहे हैं एवं मुश्किलों का सामना करने के लिए विवश हैं. खूंटपानी प्रखंड के अरगुंडी गांव के लोगों को बायोमेट्रिक प्रमाणीकरण के लिए गांव से 2.5 किमी दूर जाना पड़ता है जबकि उनके गांव में ही राशन दुकान है.

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गांव में नियमित  इंटरनेट नेटवर्क नहीं होने के कारण वहां पॉस मशीन काम नहीं करती. प्रमाणीकरण के बाद डीलर द्वारा दी गयी अगली तारीख पर राशन दुकान जाकर अनाज लेना पड़ता है.

कई बार सर्वर की समस्याओं के कारण दिनभर इंतज़ार करने के बाद भी प्रमाणीकरण नहीं हो पाता और वैसे लोगों को फिर अगले दिन पैसे खर्च करके और दैनिक मज़दूरी का नुकसान करके आना पड़ता है. केवल आरगुंडी नहीं, बल्कि राज्य के कई इलाकों में कमोबेश यही कहानी है.

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गौरतलब है कि जन वितरण प्रणाली में बायोमेट्रिक व्यवस्था लागू होने से पहले परिवार का कोई भी सदस्य अथवा पड़ोसी भी राशन ला सकता था. लेकिन अब परिवार के वही सदस्य अनाज ला सकता है जिसकी उँगलियों के निशान पॉस मशीन में दर्ज होते हैं. 

Photo-Siraj Dutta

इन विकट परिस्थतियों के बीच राज्य सरकार का निर्देश है कि पॉस मशीन में उंगलियों के निशान काम नहीं करने की अवस्था में डीलर को अपवाद पंजी के माध्यम से राशन देना है. लेकिन यह कहीं होते हुए नहीं दिखता.

जाहिर है पॉस मशीन का फांस लोगों के भोजन के अधिकार से वंचित करने की व्यवस्था बनती जा रही है. बायोमेट्रिक प्रमाणीकरण होने के बावज़ूद डीलर कई बार कार्डधारियों को यह बोल कर लौटाते हैं कि मशीन में उनकी उँगलियों के निशान काम नहीं किए और कथित तौर उनके नाम से राशन निकाल लिया जाता है.

कई जगह लोगों की शिकायत है कि डीलर पॉस मशीन में एक से ज्यादा महीने का राशन दर्ज कर देते हैं लेकिन कार्डधारी को केवल एक महीने का अनाज ही देते हैं.

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वर्तमान में जन वितरण प्रणाली में कई समस्याएं हैं, जैसे डीलर द्वारा कार्डधारी के कोटे से राशन की कटौती करने की शिकायत आम है. 

इसके अलावा राशन कार्ड में परिवार के सभी सदस्यों का नाम शामिल नहीं होने से भी संकट बढ़ा है. कई वंचित परिवारों के पास कार्ड नहीं होने तथा शिकायत निवारण प्रणाली को चुस्त दुरूस्त करने के बजाय सरकारी मशीनरी ने अपनी पूरी उर्जा जन वितरण प्रणाली को आधार से जोड़ने में लगा रखी है. 

सरकार दावा करती है कि आधार से जोड़ने के कारण जन वितरण प्रणाली से बड़े पैमाने पर फ़र्ज़ी और डुप्लीकेट लाभुकों को हटाया गया है. लेकिन आज तक केंद्र व राज्य सरकार फ़र्ज़ी और डुप्लीकेट कार्डों की स्पष्ट संख्या बता नहीं पाई है और न ही इसकी सूची सार्वजानिक की गई है. 

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सिमडेगा की 11-वर्षीय संतोषी और दुमका के कलेश्वर सोरेन की भूख से मौत इन वजहों की बानगी भर है. भले ही सरकारों ने नहीं माना है कि झारखंड में भूख से किसी की मौत हुई है. 

जन वितरण प्रणाली झारखंड के लोगों के लिए जीवनरेखा सामान है. पिछले दो वर्षों में राज्य के कम-से-कम 19 लोग भूख के शिकार हुए. अधिकांश व्यक्ति राशन से वंचित थे जिसका एक प्रमुख कारण आधार सम्बंधित समस्याएं थी.

पिछले तीन सालों से आधार के कारण लोगों को हो रही समस्याओं पर विभिन्न प्रकार के सबूतों (जैसे, सरकारी आंकड़े, स्वतंत्र शोध, कार्डधारियों की गवाही, ग्रामीणों द्वारा विरोध) की कमी नहीं है. इसके बावज़ूद राज्य सरकार लोगों पर आधार की अनिवार्यता थोपे जा रही है.

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इस मुद्दे पर मुख्य विपक्षी दलों का रवैया भी उदासीन है. अब तक कुछ ट्वीट व मीडिया में बयान के अलावा किसी भी दल में जन वितरण प्रणाली में आधार की अनिवार्यता के विरुद्ध स्पष्ट राजनैतिक प्रतिबद्धता नहीं दिखी है. आधार का प्रहार केवल जन वितरण प्रणाली तक ही सिमित नहीं है, बल्कि अन्य जन कल्याणकारी योजनाओं जैसे सामाजिक सुरक्षा पेंशन, मनरेगा आदि की कहानी भी कुछ ऐसी ही है. क्या इस चुनावी मौसम में राजनैतिक दल आधार के विरुद्ध और लोगों के पक्ष में खड़े दिखेंगे?


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