नजरियाः मौकापरस्ती की यह पटकथा लोकसभा चुनाव के वक्त से ही लिखी जा रही थी

नजरियाः मौकापरस्ती की यह पटकथा लोकसभा चुनाव के वक्त से ही लिखी जा रही थी
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नीरज सिन्हा ,   Oct 23, 2019

झारखंड की चुनावी सियासत में आज बड़ा उलटफेर हुआ. विपक्ष के पांच विधायक एक साथ भारतीय जनता पार्टी में शामिल हुए. इनमें जेएमएम और कांग्रेस से दो-दो तथा भवनाथपुर से नौजवान संघर्ष मोर्चा के विधायक भानूप्रताप शाही शामिल हैं. जाहिर है बीजेपी में जश्न है. और विपक्ष में खदबदाहट. खास कर कांग्रेस के दो बड़े नेताओं का जाना उसके लिए सन्नाटे से कम नहीं. यह उलटफेर जल्दीबाजी में लिया गया फैसला नहीं है. इसकी पटकथा लोकसभा चुनाव के वक्त से ही लिखी जा रही थी. और एकतरफा एकदम नहीं. अगर विपक्षी विधायक पाला बदलने के लिए उतावले थे, तो बीजेपी भी इसे रणनीतिक सफलता के तौर पर निपटाने में जुटी थी. 

आखिरी वक्त तक रणनीतिकारों ने इसके पत्ते तक नहीं खोले. उधर विपक्ष को पकती इस खिचड़ी की महक थी, लेकिन चाहकर भी वो बीजेपी के चूल्हे से हांडी नहीं उतार सका. यूं कहें यह होना ही था और आगे भी विपक्ष के कुछ विधायक बीजेपी का दामन थामें, तो आश्चर्य जैसा कुछ नहीं.  

राजनीति अभी उस दौर में है जहां चुनाव के मौके पर इस तरह के उलफेट बहुत हैरान करने वाले नहीं होते. मौका ताड़कर पाला बदलना और सत्ता के करीब जाना या हिस्सा बनना राजनीति का अहम हिस्सा है. 

लेकिन इस तरह के उलटफेर और आपाधापी में रणनीति, दलीय निष्ठा, सब्र, स्वार्थ, नीति सिद्धांत जरूर परखे जाते हैं. बहुत दिनों तक याद रखे जाते हैं.

भले ही सियासतदां को बहुत फर्क नहीं पड़ते. इसलिए कि उनके कार्यकर्ता और समर्थक भी इतना भर चाहते हैं कि हैसियत बनी रहे. और जिस दल का डंका पूरे देश में बज रहा हो, वहां यह हैसियत हासिल हो जाए, इससे बढ़कर बात क्या होगी.  

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जाहिर है इस राजनीतिक परिदृश्य की धार में बहने और संघर्ष में तपने के बीच जो फासले थे उसके मिटने के खतरे भी बढ़ सकते हैं. 

विपक्ष के जिन विधायकों ने पाला बदला है उनके नाम को लेकर अटकलें पहले से लग रही थीं. जेपी पटेल, भानूप्रताप शाही तो बीजेपी के गलियारे में ही नजर आ रहे थे. अलबत्ता लोकसभा चुनाव में इन दोनों ने बीजेपी का प्रचार किया. 

लेकिन इस किस्म के तानाबाने के धागे निकालने पर यह जरूर दिखाई पड़ेंगे कि यह पटकथा लोकसभा चुनाव के वक्त से लिखी जानी शुरू थी. इसमें मौकापरस्ती की स्याही लगी थी. 

अपने दल से नाराजगी का छौंक था. सांगठनिक तौर पर शिराजा बिखरने का डर था. और सीटें सुरक्षित रखने के साथ अगले पांच साल तक इत्मिनान रहने की इच्छाएं भी. 

गुंजाइश पूरी है कि बीजेपी इन पांचों को विधानसभा चुनाव में उम्मीदवार बनाए. इन विधायकों के बीजेपी में शामिल होने की यही पहली शर्त रही होगी.

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हाल ही में लातेहार से जेवीएम के विधायक प्रकाश राम का बीजेपी में शामिल होना भी इसी कड़ी का हिस्सा है. काफी समय से वे बीजेपी की राह तलाश रहे थे. और वक्त भी. 

इन हालात में पूछा जा सकता है कि मौकापरस्ती और मजबूरियां क्या रही होंगी.

तफ्सील से इन बातों की चर्चा से पहले इसका जिक्र कर सकते हैं कि नरेंद्र मोदी की प्रचंड लहर पर सवार बीजेपी ने लोकसभा चुनाव में जब झारखंड में भी विपक्ष को झकझोर कर रख दिया, तो अपने क्षेत्र के समीकरणों को लेकर विपक्ष के कई बड़े नेताओं को भी डर सताने लगा. 

उन्हें लगता है कि बीजेपी में बैकिंग है. वोटरों का रूझान है. नेताओं की फौज है. तेवर और तल्खियां हैं. तरकस में तिकड़म के तमाम तीर हैं. लिहाजा मोदी की लहर पर सवार होकर नैया पार लगाई जा सकती है.   

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उधर लोकसभा चुनाव के वक्त अन्नपूर्णा देवी के बीजेपी में शामिल होने, कोडरमा से विजय पताका लहराने तथा गिरिडीह से बीजेपी के समर्थन से चंद्रप्रकाश चौधरी की शानदार जीत के बाद से कई विधायकों को यह लगने लगा है कि भगवा धारण करना ही विधानसभा, लोकसभा पहुंचने की गारंटी हो सकती है. 

हजारीबाग से कोडरमा का नेटवर्क

जाहिर है मनोज यादव और सुखदेव भगत जैसे कांग्रेस के बड़े नेताओं को भी भविष्य की राजनीति के लिए नया ठौर तलाशना पड़ा. यह एकतरफा झुकाव नहीं था. बीजेपी के रणनीतिकार इसी बहाने एक तीर से दो शिकार कर लेना चाहते थे. 

पहला- कांग्रेस को झारखंड में बड़ा झटका और दूसरा-लोहरदगा और बरही से जीत की राह आसान करना. अब कांग्रेस के लिए इन दोनों सीटों पर वापसी बहुत आसान नहीं हो सकती है.  

मनोज यादव बरही से तीन बार चुनाव जीते हैं. और उनकी जमीनी पैठ रही है. चतरा से उन्हें इस बार लोकसभा चुनाव लड़ाया गया, तो उन्हें विपक्ष से खट्टा अनुभव मिला. राजद के उम्मीदवार दिए जाने से वे परेशान हुए. साथ ही कांग्रेस के लगातार कमजोर पड़ते सांगठनिक ढांचा और चुनाव लड़ने की लचर रणनीति से वे जूझते रहे. 

इधर हजाराबीग से कोडरमा तक उन्हें बीजेपी का नेटवर्क मजबूत होते हुए दिखा. हजारीबाग में बीजेपी के सांसद जंयत सिन्हा, विधायक मनीष जायसवाल, उससे आगे बढ़ने पर बरकट्ठा में बीजेपी विधायक जानकी यादव और आगे बढ़ने पर कोडरमा में विधायक नीरा यादव तथा सांसद अन्नपूर्णा देवी. यानी सभी बीजेपी के. 

समीकरणों को लिहाज से और वक्त की नजाकत देखते हुए यादवों के इस नेटवर्क और जयंत सिन्हा के प्रभावों के बीच उन्होंने खुद को जोड़ लेना सुरक्षित समझा. बीजेपी नेताओं से उनके संपर्क बढ़े. फिर नई तस्वीर सामने हैं. 

वैसे भी लोकसभा चुनाव में बरही में जयतं सिन्हा को करीब सवा लाख वोट मिले जबकि कांग्रेस के उम्मीदवार गोपाल साहु को महज 36 हजार 937 वोट मिले. यह समीकरण मनोज यादव को दिन न सही रातों में जरूर डराता होगा. जाहिर है कांग्रेस के साथ सालों पुराने रिश्ते को उन्होंने यहीं पर छोड़ कर भगवा धारण कर लिया. 

एक तीर से दो निशाने

कमोबेश सुखदेव भगत ने भी लोकसभा चुनाव परिणाम के साथ ही मौका ताड़ लिया था कि बीजेपी का दामन थाम लेना ही आगे की राजनीति के लिए अच्छा होगा. सुखदेव भगत कांग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष भी रहे हैं. और लोकसभा चुनाव में डॉ अरूण उरांव, डॉ रामेश्वर उरांव जैसे बड़े चेहरों की दावेदारी के बीच कांग्रेस ने लोहरदगा में उन्हें मैदान में उतारा.

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सुखदेव भगत को बीजेपी के सुदर्शन भगत ने लोहरदगा संसदीय सीट से 10 हजार 363 वोटों से हराया है. सुदर्शन भगत ने कांग्रेस से सुखदेव भगत के कब्जे वाली लोहरदगा विधानसभा सीट पर ही11 हजार 121 वोटों की बढ़त बनाई. अगर अपनी सीट से सुखदेव भगत लीड ले पाते, तो तस्वीर कुछ और होती. 

पिछले साल ही सुखदेव भगत की पत्नी अनुपमा भगत लोहरदगा नगर पर्षद की अध्यक्ष बनी हैं. इसके बाद भी लोहरदगा में कांग्रेस उम्मीदवार अपना किला हिलने से नहीं बचा सके. 

लोकसभा चुनाव में ही लोहरदगा में बीजेपी और संघ के कैडरों ने पूरा जोर लगाया था. दरअसल सुदर्शन भगत की संघ और संगठन दोनों जगह छवि अच्छी है. 

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राज्य प्रशासनिक सेवा की नौकरी छोड़ सुखदेव भगत कांग्रेस में शामिल हुए थे. 2005 में लोहरदगा विधानसभा क्षेत्र से पहली दफा विधानसभा का चुनाव जीते थे. इसके बाद 2009 

और 2014 में आजसू के कमलकिशोर भगत ने उन्हें हराया. हालांकि दोनों दफा एक हजार से कम वोटों से सुखदेव भगत की हार हुई. 

2014 की जीत के बाद कमलकिशोर भगत के एक आपराधिक मामले में सजायाफ्ता होने के बाद उनकी सदस्यता समाप्त हो गई. 2015 में हुए उपचुनाव में सुखदेव भगत ने आजसू से चुनाव लड़ीं कमलकिशोर भगत की पत्नी नीरू शांति को हराया. 

बीते दो अक्तूबर को कमलकिशोर भगत सजा पूरी कर निकले हैं. उनकी पत्नी नीरू शांति चुनाव की तैयारी कर रही हैं. सुखदेव भगत के बीजेपी में आने से संकेत साफ हैं कि बीजेपी आजसू की इस सीट पर वाजिब दावेदारी को खारिज करेगी. 

इन समीकरणों को भांपते हुए ही सुखदेव भगत ने बीजेपी की ओर हाथ बढ़ाए. जाहिर है नई कहानी के साथ दलीय निष्ठा की बात पुरानी हो गई. नीति सिद्धांत की दुहाई के बीच मौकापरस्ती भी जिंदाबाद है.

अब वे राष्ट्रवाद और विकास का राग अलाप रहे हैं. इधर बीजेपी ने भी एक तीर से दो निशाने साधती दिख रही है. सुखदेव भगत के आने से सीट जीत लेने की प्रबल संभावना और गठबंधन की सहयोगी आजसू के एक बड़े नेता को झटका देना  

मांडू से जेएमएम के विधायक जेपी पटेल ने लोकसभा चुनाव के समय जिस तरह से पार्टी के खिलाफ बगावत का झंडा उठाया उसके मायने भी साफ थे.

जेपी पटेल ने गिरिडीह या हजारीबाग से लोकसभा का टिकट नहीं दिए जाने पर हेमंत सोरेन के खिलाफ मोर्चा खोला था. गिरिडीह से टिकट मिल जाने पर शायद जेपी पटेल आज मुलम्मा नहीं बदलते.  

हालांकि जेएमएम ने जेपी पटेल को भी बहुत कुछ दिया. टेकलाल महतो के निधन के बाद उपचुनाव लड़ाया. और तुरंत सरकार में मंत्री बनाया. लेकिन जेपी पटेल के लिए वो बाते अब पुरानी हो गई है.

उनकी जुबां पर जय बीजेपी और अबकी बार 65 पार का नारा चढ़ गया है. जेएमएम को झटका देने के लिए वे अड़े हैं. हालांकि इम्तिहान बाकी है. 

वैसे भी मांडू विधानसभा सीट बीजेपी के लिए अहम होने के बाद भी जीत से वह दूर रही है. इस दफा सीट निकल गई, तो बीजेपी को पूरा फायदा.

अब बीजेपी को जेएमएम के खिलाफ बोलने वाला एक नेता भी मिल गया है. और जेपी पटेल को भी बड़ा ब्रांड. 

भानू प्रताप शाही की पहचान बेबाक बोलने और संघर्ष के बूते राजनीति में जमीनी पैठ बनाने की रही है. भवनाथपुर से वे दो बार 2005 और 2014 में चुनाव जीते हैं. झारखंड में विपक्ष की सरकार में वे मंत्री भी रहे. 

उन पर आय से अधिक संपत्ति हासिल करने और भ्रष्टाचार के मुकदमे भी हैं. इसके लिए उन्हें जेल भी जाना पड़ा है. भानूप्रताप दवा घोटाले के भी आरोपी हैं. केस मुकदमे में फंसे होने की वजह से परेशान होते रहे हैं. साथ ही संशय में कि न जाने कब लपेटे में आ जाएं. बदली परिस्थितियों में समझा जा रहा है कि अब वे राहत महसूस कर सकते हैं. 

2014 के चुनाव में बीजेपी के अनंतप्रताप देव से 2651 वोटों से ही जीत सके थे. इन दिनों क्षेत्र में अनंत प्रताप देव और भानू के बीच भारी राजनीतिक टसल है. आगे अनंत प्रताप देव का रुख क्या होगा यह देखने लायक होगा. वैसे भी देव भानू पर लगे आरोपो को गाहे- बगाहे उछालते रहे हैं. 

इससे काफी पहले भानू बीजेपी के संपर्क में आ गए थे. लोकसभा चुनाव 2019 में पलामू में बीजेपी की जीत के लिए उन्होंने जमकर काम किया. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और बीजेपी अध्यक्ष अमित शाह के प्रचार में शामिल हुए.

कुछ ही दिनों पहले उनसे बात हुई थी. एक सवाल के जवाब में भानू ने कहा था, आगे हमारी भूमिका क्या होगी, बड़े भाई के तौर पर बीजेपी को तय करना है. भानू सीधे रघुवर दास के संपर्क में रहे हैं. और बीजेपी ने भी उनकी जमीनी कुंडली खंगाल ली है. लोकसभा चुनाव के वक्त से ही भानू इस मौका को किसी सूरत मे हाथ से निकलने नहीं देना चाहते थे. 

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बात कुणाल षाड़ंगी की

विदेश में पढ़े लिखे बहरागोड़ा से जेएमएम के विधायक कुणाल षाड़ंगी का बीजेपी में शामिल होने की अटकलें पिछले कई महीनों से लग रही थी.

दरअसल लोकसभा चुनाव के बाद से ही कुणाल के राजनीतिक हावभाव बदलने लगे थे. कुणाल के पिता डॉ दिनेश षाड़ंगी बहरागोड़ा से 2000 में बीजेपी से चुनाव जीते थे. अलग राज्य गठन के बाद सरकार में वे स्वास्थ्य मंत्री थे. बाद में बीजेपी ने उन्हें टिकट नहीं दिया. 

इधर बहरागोड़ा से जेएमएम के विधायक विद्युतवरण महतो के बीजेपी में शामिल होने और जमशेदपुर से लोकसभा चुनाव जीतने के बाद जेएमएम को कुणाल में संभावनाएं दिखी. पिता के विरासत और जेएमएम के वोट बैंक से कुणाल क्लीक कर गए. फिर जेएमएम ने उन्हें पूरा मौका दिया. विधानसभा में पार्टी का सचेतक बनाया. संगठन में प्रवक्ता का ओहदा दिया. कोर कमेटी में शामिल किया. 

कुणाल, हेमंत के बेहद नजदीकी रहे. लोकसभा चुनाव में कुणाल जमशेदपुर से जेएमएम उम्मीदवार चंपई सोरेन की जीत के लिए जोर लगाते रहे. सोशल साइट पर वे काफी सक्रिय रहे हैं. मुद्दों पर बहस करते और सरकार के कामकाज पर सवाल खड़े करने से कुणाल तेजी से उभरे. जेएमएम में अगली कतार के नेता के तौर पर उन्हें देखा जाने लगा. 

लेकिन लोकसभा चुनाव परिणाम आने के साथ ही कुणाल की गतिविधियां बदलती दिखी. और अटकलें तेज होने लगी कि वे सीधे तौर पर बीजेपी के संपर्क में हैं. 

वोटों के समीकरण और विपक्षी दलों के हालात तथा बीजेपी की रणनीतियां भांपने में कुणाल देर नहीं करना चाहते थे. उन्हें इसका भी अहसास होने लगा था कि बीजेपी से बहरागोड़ा में चुनाव लड़ना सेफ साइड होगा. लेकिन कुणाल ने अपनी पांच साल की पारी के लिेए जेएमएम का भी आभार जताया है. यह उनका पारदर्शी होना हो सकता है या फिर राजनीति का हिस्सा भी. 

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बहुत कम वक्त में कुणाल ने बीजेपी को समझते हुए चुन लिया. लगता है कि सीट बचाने और बड़े फलक पर राजनीति करने का मौका वे गंवाना नहीं चाहते थे. लेकिन यह सब कुछ चुपके- चुपके चल रहा था. चार दिन पहले ही वे जेएमएम की बदलाव रैली में शामिल हुए थे.

आगे बीजेपी की यह रणनीति और विपक्षी विधायकों का पालाबदल क्या रंग लाएगा, यह देखा जा सकता है. 

वैसे बीजेपी में शामिल होने के साथ ही अधिकतर विधायकों ने इन बातों पर जोर दिया है कि क्षेत्र के विकास को लेकर जिम्मेदारी निभाने और केंद्र तथा राज्य में बीजेपी सरकार के बेहतरीन काम को देखते हुए यह कदम उठाया है.

जबकि मुख्यमंत्री रघुवर दास का कहना है कि ये विधायक खुद के लिए नहीं स्थानीय सरकार बनाने आए हैं. लेकिन सच यह भी है कि वे चुनाव जीतने भी आए हैं. बीजेपी में उन्हें भरोसा दिखता है. 

सुखदेव भगत ने तो यह भी कहा कि विकास और राष्ट्रवाद दूध में शक्कर जैसा है. मतलब पल भर में रिश्ते बदले. बोल-वचन बदले और दिल भी बदले. कुछ नहीं बदला, तो फिक्र कि विधानसभा चुनाव हर हाल में जीता जा सके. कह सकत हैं राजनीति इसी का नाम है. और मौकापरस्ती इसकी पहचान है. 


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