झारखंडः सूरजदेव भुइंया की आंखों में मनरेगा का दर्द, 171 रुपए पर मजदूर मिलता नहीं, कुआं बने कैसे

झारखंडः सूरजदेव भुइंया की आंखों में मनरेगा का दर्द, 171 रुपए पर मजदूर मिलता नहीं, कुआं बने कैसे
Publicbol (सूरजदेव भुइंया अपनी बेबसी बताते)
पीबी ब्यूरो ,   Feb 13, 2020

झारखंड में मनरेगा का दर्द गहरा है. इसे मजदूरों और लाभुकों की आंखों में देखा जा सकता है. लातेहार जिले के सूरजदेव भुइयां भी इसी में शमिल हैं.

मनरेगा से जब उन्हें कुआं मिला, तो सूरजदेव समेत दलित टोला के कई परिवारों की आस जगी कि अब फसलों का पटवन कर घर- गृहस्थी चलाने का जरिया मजबूत कर सकेंगे. लेकिन यह हो नहीं सका. मनरेगा में मजदूरी 171 रुपए है. कोई मजदूर काम करना नहीं चाहता. जाहिर है कुआं का काम कैसे पूरा हो. 

सूरजदेव भुइयां बरवाडीह प्रखंड के छीपादोहर गांव के ललमटिया टोला के रहने वाले हैं. ललमटिया टोला में भुइंया (दलित समुदाय) के लगभग 30 परिवार रहते हैं. सिंचाई के लिए यह टोला तालाब पर निर्भर है. लेकिन तालाब सूख गया है. पानी के अभाव में फसलें उगाना बेहद संकट बना है. 

सूरजदेव भुइंया ने मनरेगा से कुआं के लिए सरकारी दफ्तरों की दौड़ लगाई. बाबुओं को दरख्वास्त दिया. बताया कि यह काम मिल जाए, तो खेती-बाड़ी करना आसान होगा. 12 मार्च 2018 को उनके नाम पर एक कुआं निर्माण योजना की स्वीकृति मिली. यह काम तीन लाख रुपए में होना है. 

लेकिन सूरजदेव भुइंया अब आवेदन देकर कुआं बंद कराना चाहते हैं. कुआं में 15 फीट तक काम हो गया है. सूरजदेव भुइंया बताते हैं कि उनकी कोशिश रही कि बरसात से पहले कुआं का काम हो जाए, लेकिन मनरेगा में 171 रुपए मजदूरी तय है. और 171 रुपए में मजदूर मिलते नहीं. मजदूर कम से कम 250 रु मजदूरी मांग रहे हैं.

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अब तक कुआं के काम में उन्हें 48 हजार 726 रुपए मजदूरी के तौर पर भुगतान किया गया है. लेकिन अब वे हिम्मत हारते दिख रहे हैं. 

सुरजदेव भुइयां का कहना है कि कुआं बन जाता, तो हमारे टोला के ही  कामता भुइयां, देवन भुइयां, बेचू भुइयां, नंदू भुइयां, दिनेश भुइयां, महेश भुइयां समेत अन्य 20 घरों की 4 एकड़ में लगे चना, लोटनी, मसूर की फसल के लिए भी सिंचाई की सुविधा हो जाती. लेकिन सिंचाई के अभाव में ये फसलें भी चौपट हो सकती हैं. 

मनरेगा और भोजन के अधिकार पर लंबे दिनों से काम कर रहे सामाजिक कार्यकर्ता धीरज ने भुइंया टोला का दौरा किया है. वे बताते हैं कि नरेगा के नाम पर टोला में सिर्फ सुरजदेव भुइयां को कुआं मिला है.

नरेगा का कोई दूसरा काम नहीं हुआ है. मजदूरी को लेकर सूरजदेव भुइंया की बेबसी साफ नजर आती है. 

टोला के सभी परिवार भोजन के लिए खेती और राशन पर ही निर्भर हैं.कमाई का कोई स्थानीय जरिया नहीं है.

धीरज कहते हैं कि झारखंड में मनरेगा मजदूरी बढ़ाने के लिए लंबे दिनों से आवाजें उठती रही हैं. मजदूरी कम होने की वजह से मजदूरों का पलायन जारी है. स्थानीय स्तर पर रोजगार के अभाव और कम मजदूरी के कारण ही ललमटिया टोला से लगभग 30 महिला-पुरुष बनारस एवं डेहरी ईंट भट्ठा में काम करने चले गए हैं.

जबकि लातेहार जिले के सुदूर इलाकों से आदिवासियों और दलितों के पयालन करने वालों की संख्या और बड़ी हो सकती है. 

धीरज बताते हैं कि वैसे भी 14 दिनों में मजदूरी भुगतान करने की प्रक्रिया है. जबकि दिहाड़ी खटने से मजदूरों को रोजाना अथवा हफ्ता में दाम मिल जाता है. यही वजहें हैं कि अब 171 रुपए में मजदूर खटना नहीं चाहते. 


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