झारखंड जनाधिकार महासभा की चुनौती, बीजेपी सरकार राष्ट्रवाद नहीं जन मुद्दों पर चुनाव लड़ कर दिखाए

झारखंड जनाधिकार महासभा की चुनौती, बीजेपी सरकार राष्ट्रवाद नहीं जन मुद्दों पर चुनाव लड़ कर दिखाए
Siraj Dutta
पीबी ब्यूरो ,   Oct 30, 2019

कई जन संगठनों और सामाजिक कार्यकर्ताओं का मंच झारखंड जनाधिकार महासभा ने विधानसभा चुनाव से पहले सरकार की नीतियां, कामकाज और फैसलों पर नजरिया सामने रखा है. इसके साथ ही महासभा ने बीजेपी की सरकार को चुनौती दी है कि वो राष्ट्रवाद और ध्रुवीकरण की राजनीति नहीं, जन मुद्दों पर विधान सभा चुनाव लड़ के दिखाए

दरअसल, झारखंड में भी भाजपा, अपनी नाकामियों को छुपाने के लिए, एनआरसी और 370 को मुद्दा बनाकर लोगों का ध्रुवीकरण करने की कोशिश कर रही है.

महासभा से जुड़े अंबिका यादव, भारत भूषण चौधरी, कुमार चंद्र मार्डी, तारामणि साहु, पल्लवी प्रतिभा और जियाउल ने रांची में प्रेस कांफ्रेस करते कहा है कि रघुवर दास की नेतृत्व वाली भाजपा सरकार झारखंड की पहली सरकार है जिसने अपने पांच सालों का समय पूरा किया. यह एक मौका था राज्य को नई दिशा देने एवं न्याय और समानता आधारित विकास की ओर ले जाने का. लेकिन भाजपा शासन के पांच सालों में भ्रष्टाचार और जन-विरोधी विकास को बढ़ावा मिला. 

महासभा के प्रतिनिधियो ने आरोप लगाया कि सत्ता में आने के कुछ दिनों में ही भाजपा सरकार ने छोटानागपुर और संथाल परगना काश्तकारी अधिनियमों को बदलने की कई कोशिशें की. इसका मुख्य उद्देश्य था खेती-योग्य भूमि को गैर-खेती (व्यावसायिक) इस्तेमाल में बदलना एवं इंफ्रास्ट्रक्चर परियोजनाओं के लिए भूमि अधिग्रहण को आसान करना. लेकिन व्यापक जन विरोध के कारण सरकार इन कानूनों को बदलने में सफल नहीं हुई. इसके बाद सरकार ने भूमि अधिग्रहण कानून में ग्राम सभा द्वारा अनुमोदन एवं सामाजिक व पर्यावरण प्रभाव आंकलन के प्रावधानों को कमज़ोर कर दिया.

सरकार ने गोड्डा में अडानी परियोजना के लिए  आदिवासियों की सहमति के बिना उनकी ज़मीन को अधिग्रहित कर ली. 

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भाजपा सरकार द्वारा आदिवासियों और मूलवासियों की सार्वजनिक ज़मीन (जैसे नदी, सड़क, तालाब, धार्मिक स्थल आदि) को “लैंड बैंक” में डालना भी कंपनियों के लिए बिना ग्राम सभा की सहमति के ज़मीन अधिग्रहित करने का एक तरीका है. पूर्ण बहुमत के बावज़ूद भी पेसा और पांचवी अनुसूची के प्रावधानों और कानूनों को लागू नहीं किया.

साथ ही इस सरकार की एक और प्रमुख पहचान रही कि अल्पसंख्यकों पर लगातार हमले होते रहे एवं धार्मिक ध्रुवीकरण की कोशिशें की गईं. पिछले पांच वर्षों में कम-से-कम 21 लोगों को भीड़ द्वारा पीट-पीट कर मारा गया है. इनमें मुस्लिम और आदिवासियों की संख्या 13 तक है.  भाजपा शासन में लोकतान्त्रिक अधिकारों पर दमन में काफी बढ़ौतरी हुई है. 

खूंटी के ही कम-से-कम 14000 ग्रामीणों पर देशद्रोह के आरोप पर प्राथमिकी दर्ज की गई है. कई सामाजिक कार्यकर्ताओं पर केवल फेसबुक पर पत्थलगड़ी गावों में सरकारी दमन पर सवाल उठाने के लिए देशद्रोह का मामला दर्ज किया गया है.  

भोजन का अधिकार

महासभा के प्रतिनिधियों का कहना है कि पिछले पांच सालों में लोगों के  सामाजिक-आर्थिक अधिकारों का भी व्यापक उल्लंघन हुआ है. सरकार ने लाखों योग्य परिवारों का राशन कार्ड, सामाजिक सुरक्षा पेंशन व नरेगा जॉब कार्ड रद्द कर दिया क्योंकि वे आधार से जुड़े नहीं थे.

जन वितरण प्रणाली में आधार आधारित बायोमेट्रिक प्रमाणीकरण व्यवस्था के कारण अनेक कार्डधारियों को राशन लेने में कठिनाओं का सामना करना पड़ता है.

लाखों योग्य परिवार अभी भी राशन से वंचित हैं क्योंकि सरकार ने राशन कार्ड की सूचि, जो 2011 के सामाजिक-आर्थिक जनगणना पर आधारित है, को अपडेट नहीं किया है. वृद्ध, विधवा व विकलांग लोगों की लगभग आधी आबादी सामाजिक सुरक्षा पेंशन योजनाओं के दायरे से बाहर हैं.

मनरेगा की हालत

महासभा ने कहा है कि काम की अनुप्लब्द्धता और मज़दूरी भुगतान में देरी के कारण नरेगा की स्थिति बेहद ख़राब है. पिछले कई सालों से नरेगा में मज़दूरी दर के वास्तविक स्तर में बढौतरी नहीं हुई है. पिछले पांच वर्षों में आदिवासी और दलित परिवारों का कुल नरेगा मज़दूरी में हिस्सा 50% से गिर कर 36% हो गया है. इन उल्लंघनों और नीतियों के कारण रघुवर दास के कार्यकाल में कम-से-कम 22 लोगों की भूख से मौतें हुई हैं.


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