परत दर परतः क्या झारखंड में मोदी लहर कायम है और 47 लाख वोटों का रिकॉर्ड बचा पाएगी भाजपा?

परत दर परतः क्या झारखंड में मोदी लहर कायम है और 47 लाख वोटों का रिकॉर्ड बचा पाएगी भाजपा?
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नीरज सिन्हा ,   Feb 21, 2019

मध्य प्रदेश, राजस्थान और छत्तीसगढ़ में कांग्रेस की सरकार बनने के बाद बीजेपी हिंदी पट्टी इलाकों को लेकर बेहद सतर्क  है. इसी सिलसिले में बीजेपी झारखंड में भी किसी नुकसान का सामना नहीं करना चाहती. और इसके लिए पार्टी हर स्तर पर अपनी सीटें बचाने की कवायद कर रही है.

निचले से शीर्ष स्तर तक दावे किए जा रहे हैं कि इस बार झारखंड में बीजेपी सभी 14 सीटों पर जीत दर्ज करेगी. लेकिन कड़वा सच यह भी है कि एकीकृत बिहार के जमाने से और अलग झारखंड राज्य गठन के बाद बीजेपी इस इलाके की सभी चौदह सीटों पर कभी जीत दर्ज नहीं कर सकी है. साल 2014 का परिणाम ही उसके लिए रिकॉर्ड रहा, जब बीजेपी ने 14 में से 12 सीटों पर जीत दर्ज की और रिकॉर्ड 47 लाख 44 हजार वोट लाए. नरेंद्र मोदी की लहर का यह नतीजा था. 

लेकिन क्या मोदी की लहर अभी झारखंड में कायम है. क्या बीजेपी 47 लाख 44 हजार 315 वोटों का रिकॉर्ड बचा पाएगी. क्या बीजेपी अपनी 12 सीटें बचा लेगी. सभी 14 सीटें जीत लेने के खम का राज क्या है. 

सवाल और भी हैं. इन सवालों पर तफ्सील से चर्चा करने से पहले प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के हाल में झारखंड दौरे पर गौर किया जा सकता है. दरअसल नरेंद्र मोदी और बीजेपी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह की सीधी नजर झारखंड पर पहले से रही है. और वो इसलिए कि बीजेपी अभी एक- एक सीट जोड़ने के लिए कोई रणनीति खाली नहीं छोड़ना चाहती.

बिहार में जदयू के सामने झुक कर और तामिलनाड़ु में एआईएडीएमके के साथ बीजेपी के तालमेल को उदाहरण के तौर पर देखा जा सकता है. 

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डेढ़ महीने के दौरान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी दो बार झारखंड के दौरे पर आए हैं. इस दौरान कई महत्वपूर्ण योजनाओं का उन्होंने उदघाटन किया. और हजारों करोड़ की परियोजनाओं की आधारशिला रखी. पांच जनवरी को वे पलामू आए थे. और 43 दिनों बाद और 17 फरवरी को हजारीबाग. 

हजारीबाग में भाषण शुरू करने के साथ ही पीएम मोदी ने कहा कि वे पहले भी यहां आए हैं. और जब भी हजारीबाग आते हैं, भीड़ का रिकॉर्ड टूट जाता है. बेशक, झारखंड में नरेंद्र मोदी की सभा, रैली जोरदार होती रही है. 

लेकिन 17 फरवरी के दौरे में पीएम मोदी बिल्कुल बदले- बदले से नजर आए. हजारीबाग की सभा में उन्होंने विरोधी दलों पर कोई टिप्पणी नहीं की और न ही किसी नेता पर निशाने साधे. अलबत्ता पीएम मोदी ने लाभुकों और आम लोगों के साथ सरकारी योजना पर बातें की. बच्चों को पुचकारा. और भाषण के अंत में कहा- आप सभी का आशीर्वाद बना रहे.  

इधर रांची में भी आयुष्मान योजना के लाभुकों के साथ उन्होंने बातें की. हाल- चाल पूछा . जाहिर है मोदी इस दौरे के जरिए मोदी झारखंड में बीजेपी और सरकार के लिए बेहतर पिच तैयार करना चाहते थे. और चुनावों में वे इसी पिच पर बल्लेबाजी भी करेंगे. 

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वैसे भी केंद्र में सत्ता की बागडोर संभालने के बाद पीएम की नजरें झारखंड पर विशेष तौर पर इनायत रही है. और केंद्र ने हजारों करोड़ की योजनाएं झारखंड को दी है. 

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वोटों का समीकरण

लेकिन चुनावों में वोटों के समीकरण और एंटी इनकंबेसी हवाओं के साथ कई दफा रणनीति, विकास के तमाम दावे और नेताओं के नाम, ब्रांड पीछे छूट जाते हैं. भारतीय राजनीति ने इसे देखा- परखा है. 

तभी तो झारखंड में बीजेपी 14 सीटों पर जीतने की कोशिशें और दावे कर रही है, लेकिन वोटों के समीकरण से रणनीतिकार मुंह नहीं मोड़ सकते. 

2014 के चुनाव में झारखंड में विरोधी दलों को 54 लाख वोट मिले थे. इनमें लगभग 47 लाख वोट कांग्रेस, झारखंड विकास मोर्चा, झारखंड मुक्ति मोर्चा और राजद के थे. और चार सीटों पर चुनाव लड़कर झामुमो ने 12 लाख 50 हजार 31 वोट लाए थे. पलामू में राजद दूसरे नबंर पर था. 

कांग्रेस और झामुमो ने गठबंधन के तहत चुनाव लड़ा था. राजद के लिए पलामू की सीट छोड़ी गई थी. जबकि जेवीएम ने अकेले लड़कर 15 लाख 12 हजार वोट हासिल किए थे. 

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हालांकि कांग्रेस, जेवीएम और राजद के अलावा वाम दलों को किसी सीट पर जीत हासिल नहीं हुई थी. लेकिन जेएमएम ने मोदी लहर में राजमहल और दुमका की सीट जीत कर जरूर बीजेपी को सकते में डाला था. और कोडरमा में भाकपा माले ने बीजेपी को आमने- सामने की चुनौती दी थी. मतलब माले के उम्मीदवार दूसरे नंबर पर थे और एक बार फिर माले ने कोडरमा में मजबूत चुनौती देने की कोशिशें शुरू की है. कोडरमा से जिन्हें भी चुनाव लड़ना है, उन्हें इसका अहसास है कि माले से भी टकराना पड़ेगा.  

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वैसे 2014 के चुनाव में हार के बाद इस बार बीजेपी अब दुमका और राजमहल की सीट जीतने के लिए कोई कसर नहीं छोड़ना चाहती. दरअसल दुमका में जेएमएम प्रमुख शिबू सोरेन लंबे समय से चुनाव जीतते रहे हैं. और संतलपरगना में शिबू आदिवासियों के बीच सर्वमान्य नेता हैं. 

बीजेपी यह शिद्दत से महसूस करती है कि संतालपरगना में जेएमएम की जड़ें कमजोर करके ही वे सत्ता पर काबिज रह सकती है. खुद मुख्यमंत्री रघुवर दास की नजरें संतालपरगना पर टिकी है. हाल ही में रघुवर दास ने संतालपरगना में चुन-चुन कर जेएमएम विधायकों- सांसदो के क्षेत्र में बीजेपी की चौपाल लगाई थी. 

गुमान और डर

2014 के चुनाव में धनबाद में बीजेपी के उम्मीदवार पीएन सिंह को रिकॉर्ड 5 लाख 43 हजार 491 वोट मिले थे. और कांग्रेस को उन्होंने लगभग तीन लाख वोट से हराया था. इसी तरह रांची में रामटहल चौधरी को 4 लाख 48 हजार 729 वोट मिले थे. झारखंड में कांग्रेस के दिग्गज माने जाने वाले सुबोधकांत सहाय रांची में लगभग दो लाख वोट से हार गए थे. 

उधर हजारीबाग में जयंत सिन्हा को 4 लाख 6 हजार 931 वोट और पलामू में बीजेपी के बीडी राम को 4 लाख 76 हजार 513 वोट मिले थे. दोनों उम्मीदवारों ने अपने निकटतम प्रतिद्वंद्वी को लगभग दो-दो लाख वोटों के अंतर से हराया था. 

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लेकिन नरेंद्र मोदी की लहर में भी लोहरदगा में बीजेपी के सुदर्शन भगत महज 6489 और गिरिडीह में रवींद्र पांडे 40 हजार 313 और गोड्डा में निशिकांत दूबे 60 हजार 613 वोटों से चुनाव जीते थे. वोटों का यह समीकरण बीजेपी उम्मीदवारों को अब भी डराता है. 

चाईबासा में गीता कोड़ा को कांग्रेस ने अगर उतार दिया, तो बीजेपी के प्रदेश अध्यक्ष लक्ष्मण गिलुआ हांफते हुए नजर आ सकते हैं. गीता कोड़ा ने पिछले चुनाव में अपने दम पर बीजेपी की सीधी चुनौती दी थी. 

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2004 का परिणाम 

झारखंड में बीजेपी 2004 के चुनाव परिणाम को भी नहीं भूलना चाहेगी. उस चुनाव में यूपीए ने फूलप्रूफ गठबंधन के तहत चुनाव लड़ा था. और राज्य की 13 सीटों पर बीजेपी हार गई थी. 

सिर्फ कोडरमा में बाबूलाल मरांडी बीजेपी की लाज बचा सके थे. 2004 के चुनाव में हजारीबाग में यशवंत सिन्हा भाकपा के भुवनेश्वर मेहता से हार गए थे. इसके बाद यूपीए के घटक दलों के बीच फूलप्रूफ गठबंधन नहीं हो सका. 

जाहिर है 2004, 2009 और 2014 के चुनाव परिणाम से सबक लेते हुए और वोटों के बंटवारे को रोकने की गरज से झामुमो, राजद, झाविमो और कांग्रेस एक प्लेटफॉर्म पर आना चाहते हैं. अलबत्ता 2014 में केंद्र और राज्य में बीजेपी की सरकार बनने के बाद ये दल साथ चलने और चुनाव लड़ने के कसमे खाते रहे हैं. वादे करते रहे हैं. अब उनके लिए वफा की बारी है. 

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हालांकि गोड्डा सीट को लेकर विपक्षी दलों में जिच कायम है. अगर ये जिच दूर हो गया, तो वोटों के समीकरण के पैमाने पर इस संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता कि बीजेपी को इस चुनाव में झारखंड में बेहद कड़ी चुनौती का सामना करना पड़ेगा.  

इसके साथ ही यह भी तय है कि विपक्ष में कोई सशक्त गठबंधन नहीं बना, तो बीजेपी का वोट उनकी (विपक्ष) की दीवार में दरक लगाने के लिए अहम हो सकता है. 

बदलती परिस्थितियों में इसकी गुंजाइश बढ़ी है कि बीजेपी झारखंड में आजसू को लोकसभा चुनाव में साथ रखकर वोट आधारित समीकरण को टांके को मजबूत करे. आजसू की भी इस ओर नजरें लगी है. तब आजसू को कम से कम एक सीट बीजेपी दे सकती है. इसके लिए आजसू की हजारीबाग और गिरिडीह पर नजरें टिकी है.  पिछले चुनाव में आजसू  ने गिरिडीह में जेएमएम को ही नुकसान पहुंचाया था. और इससे बीजेपी की राह आसान हुई थी. 

आत्मविश्वास का सच

ये खतरे महसूस करने के बाद भी बीजेपी के रणनीतिकारों और नेताओं को इन बातों का भरोसा है कि केंद्र और राज्य की सरकार ने विकास के जो काम किए हैं वह चुनाव में उनके काम आएंगे. दूसरा यह कि नरेंद्र मोदी का चेहरा उनके सामने है और चुनाव में नरेंद्र मोदी ही सबसे बड़े खेवनहार होंगे. 

पांच राज्यों के चुनाव परिणान आने के बाद से ही बीजीपी के कई मुख्यमंत्री और नेता लगतार कहते रहे हैं कि विपक्ष में नेता कौन है जबकि बीजेपी के पास नरेंद्र मोदी हैं. 

वैसे बीजेपी ने जोरदार ढंग से चुनावी बिसात बिछा दी है. और झारखंड समेत हर राज्य में उसकी मुहिम तेज है. बीजेपी के पास नेता, वक्ता कार्यकर्ता और साधन- सुविधा ज्यादा हैं, लेकिन विपक्ष को इसका भरोसा है कि वोटरों का मिजाज उसके ( बीजेपी) के खिलाफ है. और बीजेपी का आत्मविश्वास यहीं पर धरा रह जाएगा. 

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छत्तीसगढ़ चुनाव परिणाम की हवा का असर भी झारखंड में हो सकता है. इससे इनकार नहीं किया जा सकता. हाल ही में बीजेपी के एक कार्यक्रम में शामिल होने रांची आए छत्तीसगढ़ के पूर्व मुख्यमंत्री रमण सिंह ने पार्टी के कार्यकर्ताओं को आत्म विश्वास से बचने की सलाह दी थी. रमण सिंह ने यह भी कहा कि उनका सेल्फ विकेट हुआ. 

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वैसे भी झारखंड में हवा का रुख भांपने और चुनावी राजनीति का मर्म समझने में बीजेपी के कई पुराने और अनुभवी नेता हैं जिन्हें ये बातें डराती रही है कि सरकार के कुछ फैसले के खिलाफ और जमीन के सवाल पर भड़का आंदोलन कम- से- कम आदिवासी और खेतिहर इलाकों में उनकी जमीन हिला सकती है. 

पिछले कुछ महीनों के दौरान बीजेपी, उसकी सरकार और रणनीतिकार आदिवासी वोट संभालने के लिए कई किस्म की कोशिशें करते रहे हैं. परंपरागत वोट संभालने की खातिर संघ की भी अंदर ही अंदर सक्रियता बढ़ी है. 

इसी सिलसिले में रघुवर दास की सरकार अब दनादन लोकलुभावन फैसले रही हैं जिससे आदिवासी, किसान, रैयत और संविदा पर काम करने वाले कर्मियों का मिजाज बदल सके. 

उपचुनाव का मूड

केंद्र और राज्य में बीजेपी की सरकार के कामकाज और सबका साथ सबका विकास के मंत्र की तमाम दुहाई के बाद भी साढ़े चार साल के दौरान झारखंड में उपचुनाव के मूड को देखें, तो बीजेपी या एनडीए के लिए बहुत मुफीद नहीं माना जा सकता. 
आजसू के विधायक कमलकिशोर भगत के सजायाफ्ता होने के बाद लोहरदगा विधानसभा क्षेत्र में हुए उपचुनाव में आजसू की हार हो गई. यहां बीजेपी ने आजसू का साथ दिया था. पलामू के पांकी में हुए उपचुनाव में कांग्रेस ने कब्जा बरकरार रखा और बीजेपी की हार हुई. 

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इसी तरह गोमिया में हुए उपचुनाव में बीजेपी और उसके घटक दल आजसू की हार हुई और झामुमो ने कब्जा बरकरार रखा. सिल्ली विधानसभा उपचुनाव में आजसू प्रमुख सुदेश महतो हार गए और झामुमो ने कब्जा बरकरार रखा. गौरतलब है कि बीजेपी के साथ आजसू सरकार में शामिल है और पिछले विधानसभा चुनाव में दोनों दलों के बीच प्री पोल गठबंधन था.
इससे पहले गोड्डा विधानसभा के लिए हुए उपचुनाव में बीजेपी सीट जरूर बचा सकी.

लेकिन हाल ही में हुए कोलेबिरा विधानसभा उपचुनाव में बीजेपी हार गई और बिना झारखंड मुक्ति मोर्चा के समर्थन कांग्रेस ने इस सीट पर जीत हासिल कर बीजेपी को सकते में डाल दिया. 

कोलेबिरा के परिमाम को लिटमस टेस्ट के तौर पर भी देखा जाता रहा है. लेकिन बीजेपी इससे इनकार करती रही है. 

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विपक्ष की मुहिम 

झामुमो के कार्यकारी अध्यक्ष हेमंत सोरेन ने चुनावी समां बांधने के ख्याल से ही संघर्ष यात्रा की शुरुआत की है. पिछले तीन महीने के दौरान हेमंत सोरेन राज्य के हर एकविधानसभा क्षेत्र जाकर बीजेपी विरोधी वोट को लामबंद करने की कोशिशें कर रहे हैं. 

संघर्ष यात्रा के जरिए हेमंत सोरेन ने सरकार के लोक लुभावन फैसले और घोषणाओं को फरेब बताते हुए उन पर पेंट करने की कोई कोशिश बाकी नहीं रख रहे. . 
इन यात्रा के जरिए हेमंत सोरेन ने आदिवासियों को भी गोलबंद करने की कोशिशें कर रहे हैं. साथ ही सीएनटी- एसपीटी कानून में संशोधन की कोशिशों के बाद सरकार के खिलाफ जो माहैल बना था उसे लोगों के बीच फिर से ताजा करना चाहते हैं. 

इधर सुबोधकांत सहाय और बाबूलाल मरांडी कतई नहीं चाहते कि साढ़े चार साल से विपक्ष को एक प्लेटफॉर्म पर खड़ा करने और बीजेपी के खिलाफ जनसंगठनों को साथ लेकर चलने की जो कोशिशें उन दोनों ने की है और जो तस्वीरें बनी है वह एक झटके में परदे से उतर जाए. दरअसल विपक्ष को इसका अहसास है कि वोटों का बंटवारा रोक सके, तो बीजेपी की मुश्किलें बढ़ती जाएगी.  

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मॉब लिंचिंग, भूख से कथित मौत, पुलिस फायरिंग, पारा शिक्षकों और आंगनबाड़ी सेविका, सहियका, मनरेगा कर्मियों के आंदोलन और रोजगार, नौकरी समेत प्रचार प्रसार पर सरकार के द्वारा अरबों खर्च किए जाने जैसे सवाल हैं जिसे चुनावों में उछाले जा सकते हैं.

इधर विपक्ष के खिलाफ बीजेपी के तरकस में जो तीर सजते दिख रहे हैं, वो पहले भी आजमाए जा चुके हैं. इनमें एक बात उसके लिए अहम होगी कि सरकारों ने साढ़े चार साल में जनता का दिल जीता, या विश्वास खोया. और इससे ज्यादा अहम होगा कि बीजेपी अपने वोट बैंक को कैसे सहेज सकेगी. 


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