एनोस फिर 'सलाखों' के पीछे और अर्श से फर्श पर राजनीति का 'इक्का'

एनोस फिर 'सलाखों' के पीछे और अर्श से फर्श पर राजनीति का 'इक्का'
Publicbol (सीबीआइ कोर्ट परिसर में एनोस एक्का बीच में लाल बंडी पहने व आंखों पर गोगल्स लगाए)
पीबी ब्यूरो ,   Feb 25, 2020

झारखंड के पूर्व मंत्री एनोस एक्का फिर सलाखों के पीछे पहुंच गए हैं. आज ही आय से अधिक संपत्ति के मामले में रांची स्थित सीबीआइ की विशेष अदालत ने उन्हें सात साल की सजा सुनाई है.

इस चक्रव्यूह में एनोस की पत्नी, भाई समेत सात लोग भी फंसे हैं. उन्हें भी सात- सात साल की सजा सुनाई गई है. 

रांची स्थित सीबीआइ के विशेष न्यायाधीश एके मिश्र ने एनोस एक्का उनकी पत्नी मेनन एक्का, भाई गिदियोन एक्का और इब्राहिम एक्का तथा नजदीकी रहे जयकांत बाड़ा, भांजा रोशन मिंज और एक नजदीकी दीपक लकड़ा को यह सजा दी है. 

इससे पहले एनोस एक्का सिमडेगा के एक पारा शिक्षक मनोज कुमार की हत्या के आरोप में सजायाफ्ता हैं. हत्या के मामले में उन्हें उम्र कैद की सजा मिली है.

साल 2017 के जुलाई महीने में उन्हें उम्र कैद की सजा मिली थी. इसके बाद उनकी विधायकी खत्म हो गई.

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जाहिर है कम समय में ही सियासत की ऊंचाइयों को छूने में कामयाब एनोस एक्का की राजनीति पहले ही अर्श से फर्श पर जाती रही है. जबकि इसे संभालने की कोशिशें लगातार नाकाम भी होने लगी हैं. 

एनोस एक्का के खिलाफ भ्रष्टाचार और आय से अधिक संपत्ति हासिल करने के मामले में भी अलग- अलग कार्रवाई जारी है. बड़े पैमाने पर उनकी संपत्ति जब्त की गई है. जांच का दायरा भी बढ़ता जा रहा है. 

पांच साल पर निकले थे जेल से

पिछले साल (2019) हत्या के मामले में उन्हें हाइकोर्ट से सशर्त जमानत मिली थी.

एक अक्तूबर को जमानत पर जब जेल से एनोस बाहर आए, तो राजनीति में नए सिरे से जलवा दिखाने की कोशिश की. सामने विधानसभा चुनाव था.

कार्यकर्ताओं, समर्थकों को उन्होंने भरसक लामबंद करने के लिए गांव से शहर तक जमीन नापी.  पुराने रिश्ते की दुहाई दी. काम गिनाए. बताया कि वे साजिशों का शिकार होते रहे. पत्नी, बेटी, भाई, नजदीकी सभी मैदान संभालने के लिए निकले.लेकिन एक्का के हुकुम का इक्का नहीं चला. 

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बेटी और पत्नी हारी

विधानसभा चुनाव में एनोस की बेटी आइरिन एक्का समेत झारखंड पार्टी के सभी उम्मीदवार हार गए. आइरिन कोलेबिरा से चुनाव लड़ी थीं. कांग्रेस के विक्सल कोंगाड़ी ने उन्हें शिकस्त दी. 

( Publicbol (विधानसभा चुनाव के दौरान बेटी आइरिन के साथ प्रचार करते)

इससे पहले एनोस एक्का की विधायकी खत्म होने पर साल 2018 के दिसंबर महीने में कोलेबिरा विधानसभा का उपचुनाव हुआ था.  

उपचुनाव में एनोस की पत्नी मेनन एक्का को मैदान में उतारा गया. जेएमएम ने उनका समर्थन किया. हेमंत सोरेन प्रचार करने भी गए.

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लेकिन मेनन को कांग्रेस के विक्सल कोंगाड़ी से न सिर्फ हार का सामना करना पड़ा, बल्कि वे औंधे मुंह गिरते हुए चौथे नंबर पर टिकीं.  

एनोस के खिलाफ आय से अधिक संपत्ति और मनी लांड्रिंग के मामले दर्ज हैं. और इन्हीं आरोपों को लेकर मेनन एक्का भी पहले जेल जा चुकी हैं.     

2005 में चमका सितारा

साल 2005 में कोलेबिरा सीट से पहली दफा चुनाव जीतने वाले एनोस एक्का की राजनीतिक कुंडली के बारे में तब किसी ने पढ़ने- जानने की कोशिश नहीं की थी. 

एनोस एक्का को भी तब इसका अहसास नहीं रहा होगा कि वे तेजी से ऊंचाइयों तक जाएंगे. और फिर कानून के शिकंजे में उतनी ही तेजी से फंसते चले जाएंगे. 

Publicbol (2018 में हुए कोलेबिरा उपचुनाव में प्रचार करतीं मेनन एक्का)

दरअसल सत्ता की धुरी बने एनोस एक्का एक के बाद एक गंभीर आरोपों में फंसते चले गए और वह दौर भी आया जब वे उबरने के बजाय मुश्किलों में धंसते चले जा रहे हैं. 

साल 2006 में अर्जुन मुंडा की सरकार के तख्तापलट में भी एक्का का अहम रोल था. अर्जुन मुंडा की सरकार गिराकर जब मधु कोड़ा सत्ता में आए, तो एनोस एक्का फिर मंत्री बनाए गए. 

कोड़ा के कार्यकाल में उनका रूतबा और रसूख भी बढ़ता गया. अवैध तरीके से अफरात पैसे कमाने के आरोप लगे. मुकदमे दर्ज होते गए.

अलबत्ता चुनावों में भी उन पर कथित तौर पर धन बल का जमकर इस्तेमाल करने के आरोप लगते रहे हैं. 

जब जेल से जीते 

साल 2009 के विधानसभा चुनाव में एनोस एक्का का सितारा फिर चमका. इस बार वे सिमडेगा से जीते. इसके बाद 2014 में वे कोलेबिरा से विधानसभा चुनाव जीते.

इसके साथ ही विधानसभा चुनाव में एक्का की यह लगातार तीसरी जीत थी. 2005 से 204 तक वे बीजेपी, कांग्रेस की घेराबंदी से वे निकलते रहे. 

2014 का चुनाव वे जेल में ही रहकर जीते. चुनाव से ठीक पहले पारा शिक्षक की हत्या के मामले में उन्हें गिरफ्तार किया गया था. 

सिमडेगा इलाके में राजनीति में एनोस का बढ़ता दबदबा का ही परिणाम रहा कि उनकी पत्नी मेनन एक्का जिला परिषद की अध्यक्ष बनीं. 

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वक्त बदला, समीकरण बदला

लेकिन परिस्थितियां बदली. वक्त बदला. समीकरण बदला. और फिर वह दौर भी आया जब साधारण परचून की दुकान चलाने फिर आदिवासी इलाके में राजनीतिक पैठ जमाने में कामयाब एनोस एक्का बदनामी के भंवर में फंसते चले गए.

पत्नी और बेटी का चुनाव में खारिज होने की यह भी अहम वजह भी यही रही. 

हालांकि एनोस एक्का ने विधायक रहते ही लोकसभा जाने का तानाबाना बुन लिया था. 2014 के चुनाव में वे खूंटी संसदीय सीट से चुनाव लड़े और बीजेपी के दिग्गज कड़िया मुंडा को परेशान कर दिया. 

2014 में कड़िया मुंडा को दो लाख 69 हजार 185 वोट मिले थे. झारखंड पार्टी के उम्मीदवार एनोस एक्का को एक लाख 76 हजार 937 वोट मिले और वे दूसरे नंबर पर रहे. जबकि कांग्रेस के कालीचरण मुंडा को एक लाख 47 हजार 17 वोट मिले थे और वे तीसरे नंबर पर रहे. 

खूंटी के वरिष्ठ पत्रकार और उस इलाके की राजनीति को लंबे समय से कवर करते रहे अजय शर्मा बताते हैं कि कोलेबिरा उपचुनाव मेनन की हार ने इतना संकेत तो दे ही दिया था कि एनोस के जेल जाने के बाद से इस इलाके में उनका वर्चस्व भी घटता जा रहा है. 

अगर उनकी सदस्यता खत्म नहीं होती और चुनाव लड़ने के लिए अयोग्य नहीं होते, तो 2019 का लोकसभा चुनाव भी जरूर लड़ते. एनोस के मैदान में नहीं रहने की वजह से ही खूंटी में बीजेपी और कांग्रेस की एकदम आमने- सामने की लड़ाई हुई.

अपनी राजनीतिक जमीन बचाने की खातिर ही एनोस ने बेटी को विधानसभा चुनाव के मैदान में उतारा, लेकिन उन्हें हार का सामना करना पड़ा.

जाहिर है राजनीति में पांच सालों के दौरान एनोस एक्का परिवार को लगातार झटका का सामना करना पड़ा है. 


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