झारखंडः सूख गई उम्मीदें, पाताल तक तलाश, डेगची भर पानी, भटक रही जिंदगानी

झारखंडः सूख गई उम्मीदें, पाताल तक तलाश, डेगची भर पानी, भटक रही जिंदगानी
Shahid (कोडरमा का सुदूर कुटुमटांड़ इलाका, दो डेगची पानी के लिए जूझती जिंदगी)
पीबी ब्यूरो ,   Jun 05, 2019

हलक सूखे हैं और जिंदगी हलकान. धरती की छाती छेदकर पाताल तक पानी की तलाश हो रही है, फिर भी लोटे-तसले, घड़े-सुराही ढनढन हैं. मीलों चलकर ताल-तलैया, चुआं- दाड़ी, सोती से डेगची भर गंदा पानी उलीच लाने की जद्दोजहद में गांवों की चमेली, मुंदरी, सुगनी और एतवरिया के पांवों में दर्द के छाले और माथे पर पसीने की बूंदें हैं. 

तिल- तिल कर सूखती और सिकुड़ती नदियां तो कब की रेत के छोटे-बड़े टीलों और ढूहों में तब्दील हो चुकी हैं. यह तस्वीर झारखंड के किसी एक इलाके की नहीं है.

पूरे पठार-प्रदेश में कमोबेश यही हालात हैं. नदी नाले सूख चुके हैं और चापाकलों में भी पानी नदारद है. सूखे की वजह से सब परेशान हैं. क्या इंसान, क्या जानवर. बिन पानी सब सून सा लगता है. 

कोडरमा के सुदूर कुटुमटांड़ के कई आदिवासी परिवारों के सामने पानी बड़ा संकट बना है. चापाकल खराब है. सूखी नदी और पत्थरों के बीच जमीन खोदकर पानी निकालने की बेबसी छोटकी सोरेन की आंखों में साफ दिख जाती है. वे बताते हैं महज दो डेगची पानी के लिए दो किलोमीटर दूर चलते हैं. जमीन खोदकर पानी निकाल लेना बहुत आसान नहीं होता.    

Shahid (कोडरमा में मसनोडीह पंचायत के सखुआटांड़ इलाके का हाल)

डबल इंजन

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लोकसभा चुनाव के दौरान हम कई इलाके गए. लेकिन चुनावी सियासत के एजेंडे में पानी का बुनियादी सवाल सिरे से गायब रहा. हैरत यह कि बेपानी जिंदगी के चुभते हुए सवालों पर डबल इंजन की सरकारों के भीतर कोई बेचैनी नहीं दिखती. जनता के नुमाइंदों को ये सवाल बहुत परेशान नहीं करते. गोया इन्हीं सवालों के जरिए कैसे वोट के समीकरण साधे जाएं, इसकी कोशिशें लगातार जारी है. कुछ ही महीने बाद विधानसभा चुनाव हैं. लिहाजा वादे, आश्वासन का जोर है. गांव की सरकार भी इस भयावह स्थिति से निजात दिलाने में पानी- पानी हो रही. 

पेटरवार का चलकरी इलाका, चट्टानों के बीच से रिसते पानी को जमा करने की मशक्कत 

गोमिया प्रखंड अंतर्गत लुगू पहाड़ के तलहटी में बसे लालगढ़ के ग्रामीणों के बीच पानी संकट का सबब बना है. पहाड़ से उतरने वाला झरना भी अब साथ नहीं दे रहा. इस गांव के करीब 29 घरों की महिलाएं और बच्चे डोगची लेकर दो किलोमीटर पैदल चलते हैं. और घर लौटने में दो- ढाई घंटे का वक्त लगता है. दरअसल झरना के नीचे दाड़ी और पानी छानने की मशक्कत बेहद तकलीफ देह होती है. गांव के चापाकल से पीने का पानी मिल गया, तो लोग इसे तकदीर का हिस्सा मानते हैं. 

गोमिया के सुदूर लालगढ़ में पहाड़ी झरना से पानी जमा करने की जद्दोजहद

प्रदेश के जिस दूरदराज  के आदिवासी, दलित गांवों-टोले की तरफ जाएं, तस्वीरें तस्दीक करती दिखाई पड़ेगी कि बड़ी आबादी के सामने पानी ने जिदंगी की दुश्वारियां बढ़ा दी है. इन तस्वीरों के साथ सवाल भी हैं. झारखंड अलग राज्य की खुशिया, हक-अधिकार विकास के दमदार दावे  गांव- गिराव और आखिरी कतार के लोगों तक पहुंचने से पहले गुम कहां हो जाते हैं. (चतरा में मयूरहंड इलाके के भुइंयाडीह, डर इसका कि ये पोखरा न सूख जाए)

बिसलेरी की बोतलें

इधर सचिवालय के सभागृहों और चैंबरों में मेजों पर सजी बिसलेरी की बोतलों के बीच कुछ मीटिंग-सीटिंग, फरमान, टोल फ्री नंबर जारी करने का जो कथित खेल चल रहा है, उससे जमीन पर रत्ती भर राहत भी पहुंची हो, यह कह पाना मुश्किल है. 

चतरा के सुदूर भुईयांडीह टोला की चमेली देवी कहती हैं- 'खींच ला फोटवा, सरकार और साहेब का नाय दिखे है ई सब' (तस्वीर ले लीजिए, साहब सरकार को दिखाइएगा, उन्हें ये पता नहीं) 

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मुंदरी देवी, शारदा देवी, दसबनी देवी की टीस है कि 'वोट बेर बड़- बड़ बात करथतीन नेता सब, पर बाद में मुंह फेर लेतो' (वोट के वक्त बड़ी बातें करने वाले नेता बाद में आसानी से मुंह फेर लेते हैं)    

इसी टोला के राजेश कुमार कहते हैं कि 14 वीं वित्त से डीप बोरिंग कराया गया, लेकिन वह सूख गया. मुखिया से प्राथमिक विद्यालय के पास डीप बोरिंग करवाने को कहा, पर बातें सुनी नहीं गई. 

कड़वा सच

ये है हजारीबाग के चौपारण प्रखंड का लुकयी सोकड़ा गांव और आसपास का इलाका. आदिवासी परिवारों के लिए ये गर्मी सितम बन कर आई है.

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सुरती मांझी, बड़की मांझी बताती हैं कि चुआं से थोड़ा बहुत पानी निकल जाता है, वर्ना जान नहीं बचती. लेकिन चुआं से पानी के लिए हर दिन तीन किलोमीटर पैदल चलना होता है. देह झुलसाते लू के थपेड़ों के बीच महिलाएं घरों से निकल जाती हैं. वे गंवई लहजे में कहती हैंः एको ठो चपाकल, कुआं देला देतला, तो ठीक रहतो (कम से कम एक चापाकल या कुंआ दिला दीजिए)

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कर्मा मांझी कहते हैं, ''दो डेगची पानी के लिए गांवों के आदिवासी किन सितम से गुजरते हैं, इसे और करीब से देखना है तो दो- तीन दिन इस इलाके में घूम जाइए''. इक्के- दुक्के कुएं थे, वे सूख गए. चापाकल खराब पड़े हैं. चैत के महीने से नदिया रेत में तब्दील होने लगी थी. जेठ की दुपहरी पानी की खोज में महिलाओं के पैरों में छाले पड़ते रहे. 

Publicbol (हजारीबाग के सरईया इलाके में पानी की तलाश में निकलीं गांव की महिलाएं)

यह कड़वा सच है कि सूखे की वजह से सब परेशान हैं. क्या इंसान, क्या जानवर. लोग घर-बार छोड़ कर जाने को विवश हैं. गांव- कस्बा, जंगल- पठार, सब जगह पानी के लिए हाहाकार. ये तस्वीरें उस राज्य की है जहां का सालाना बजट 85 हजार 429 करोड़ (2019-2020) है.

लोहरदगा, गुमला के पठारी इलाकों में भी पानी लोगों की परेशानी का सबब बना है. अहले भोर महिलाओं कतार में निकलती हैं. सिर्फ और सिर्फ पानी की तलाश. 

Publicbol (लोहरदगा का किस्को इलाका, अहले भोर लोग निकलते हैं पानी की तलाश में) 

कस्बा- शहर

गांवव- बस्ती से बाहर निकलिए तो शहर-कस्बे में भी कुछ कम हाहाकार नहीं. पौ फटने के पहले ही सरकारी नलों पर सिर- फुटव्वल है तो धरती से पांच सौ फीट नीचे जा पहुंची बोरिंग भी फेल है. दशकों से शहरों की प्यास बुझाने वाले डैम छिछले हुए जा रहे हैं और इनके किनारों पर सिर्फ गाद पसरा है.

Publicbol (27 मई को गिरिडीह के चैताडीह में फूटा गुस्सा, सड़क पर बाल्टी, डेगची लेकर उतरीं महिलाएं)

शहरों के लिए कई बड़ी परियोजनाएं सालों से लटकी पड़ी हैं. इन परियोजना के पूरी होने की आस में कई शहरों में पानी के लिए कोहराम मचा है. पानी के लिए मारपीट और खून तक बहने लगा है.

सड़कों पर विरोध- प्रदर्शन

पिछले महीने 27 मई को डिरिडीह शहर के चैताडीह में पानी संकट से जूझ रहे लोगों का गुस्सा फूट पड़ा था. महिलाओं ने गिरिडीह- रांची मार्ग को जाम कर दिया था. वे डेगची बाल्टी के साथ सड़क पर प्रदर्शन करती रहीं. वार्ड पार्षद गुड़िया देवी बताती हैं कि नगर निगम को कई दफा हालात की जानकारी दी, पर कोई पुरसाहाल नजर नहीं आता. 

इधर दो जून को विष्णुगढ़ प्रखंड क्षेत्र में सदारो गांव की पानी संकट से जूझती महिलाओं गोमियां सड़क मार्ग को जाम कर दिया था. सरकारी अधिकारियों ने महिलाओं को भरोसा दिलाया कि नया चापाकल लगाया जाएगा. गांवों केलोग ग्रामीण नदी से पानी लाकर पी रहे हैं. कोयलांचल के बड़े इलाके में पानी के लिए कोहराम मचा है. आंदोलन का सिलसिला जारी है. लोगबाग सड़कें जाम कर रहे हैं. सरकारी दफ्तरों में ताला जड़ा जा रहा है. इन सबके बीच आश्वासनों का पानी बहता जा रहा है.

जंगलों के बीच बसा खूंटी का सुदूर कुदागा गांव का हाल 

खूंटी के पठारी और जंगलों की तराई में बसे गांवों में आदिवासियों को पानी केलिए जूझते देखा जा सकता है. अड़की के कुइल जोरेबाड़ा के इसहाक पूर्ति कहते हैं- बूंद-बूंद के लिए लोग तरस रहे हैं. सरकारी और सिस्टम से कोई आसरा नहीं. बस बारिश हो जाती, तो थोड़ी राहत मिल जाती.

इसहाक बताते हैं कि हफ्ते- दस दिनों में एक बार नहाते हैं. नदियां सूख गई है. कुएं में एक फीट पानी बचा है. बर्तन- बासन धोने और पीने का पानी लाने के लिए महिलाओं- लड़कियों को कई मील दूर दूर जाना होता है. भीषण गर्मी में चुआं, दाड़ी भी दम तोड़ रहे हैं. 

अड़की के सुदूर कुदागा के रीगा मुंडा कहते हैं, ''हम ठहरे आदिवासी, इसी हाल में जीना है. जंगल पठार, नदियां जब सूखने लगे, तो हमें अहसास हो जाता है कि कोई बड़ा विपदा आने वाला है. सरकारी योजनाएं इस इलाके में नहीं आती''. 


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