याद किए जा रहे धरती आबा बिरसा मुंडा और 21वें बरस में दाखिल होता झारखंड

याद किए जा रहे धरती आबा बिरसा मुंडा और 21वें बरस में दाखिल होता झारखंड
पीबी ब्यूरो ,   Nov 15, 2020

उलगुलान के महानायक धरती आबा बिरसा मुंडा की आज जयंती है. पूरे देश में उन्हें याद किया जा रहा है. श्रद्धांजलि दी जा रही है. खास कर झारखंड में. बिरसा का जन्म झारखंड में खूंटी जिले के अड़की प्रखंड अंतर्गत उलिहातू में 15 नवंबर 1875 को हुआ था. 

उलिहातू में आज बिरसा विशेष तौर पर पूजे जा रहे हैं. शनिवार को बिरसा की जन्मस्थली बिरसा ओड़ा की साफ-सफाई व धुलाई की गई. इसके अलावा  अखरा में भी गांव- गिराव के लोग जुटे हैं. 

उतिहातू के अलावा दूसरे आदिवसी इलाकों में भी बिरसा पूजे जा रहे हैं. भिरसा के उलगुलान के अंकुर लहलहायें, इसके संकल्प भी दोहराए जा रहे हैं. 

हालांकि बिरसा मुंडा अपने उलगुलान (क्रांति) की वजह से सिर्फ आदिवासियों के बल्कि हर भारतवासियों के लिए नायक बने. 

रविवार की सुबह बिरसा ओड़ा में स्थापित बिरसा मुंडा की प्रतिमा की ग्रामीण आदिवासी रीति-रिवाज से पूजा-अर्चना कर रहे हैं. सबसे पहले भगवान बिरसा मुंडा के वंशजों ने पूजा के साथ श्रद्धासुमन अर्पित किए.  

इसे भी पढ़ें: 15 नवंबरः अलग राज्य गठन के दिन उपवास पर क्यों बैठे झारखंड के हजारों आंदोलनकारी

उलिहातू के अलावा राजधानी रांची में भी बिरसा की समाधि स्थल और जगह- जगह लगी मूर्तियों पर फूल माला चढ़ाए जा रहे हैं. बिरसा के सपने साकार हों, यह संकल्प दोहराए जा रहे हैं. बिरसा के संघर्ष और आंदोलन ने उन्हें भगवान का दर्जा दिलाया है. 

राज्यपाल द्रौददी मुर्मू और मुख्यमंत्री श्रद्धा के फूल चढ़ाने कोकर स्थित बिरसा की समाधि स्थल पर पहुंचे हैं. थोड़ी देर में बीजेपी के प्रदेश अध्यक्ष दीपक प्रकाश और झारखंड के पहले मुख्यमंत्री बाबूलाल मरांडी भी समाधि स्थल पहुंचने वाले हैं. 

बिरसा ने जल, जंगल, जमीन की सुरक्षा, अस्मिता की खातिर अंग्रेजों और जमींदारों, शोषकों से लड़ाई लड़ी थी. उनका संघर्ष गाथा हर झारखंडी को गौरवान्वित करता है. बिरसा लोगों को दिलों में खेतों-खलिहानों, जंगल- पठार में बसते हैं. आदिवासियों के अरमानों में रहते हैं. 

आज का दिन झारखंड के लिए खास है. अलग राज्य गठन के बाद झारखंड 21वें बरस में दाखिल कर रहा है.

बिहार के बंटवारे के बाद 15 नवंबर 2000 को जब झारखंड अलग राज्य बना था. झारखंड अलग राज्य बना, तो यहां के लोगों की ख़ुशियां, उम्मीदें और आकांक्षाएं उछाल मार रही थीं. लेकिन समय के साथ लोगों की ख़ुशियां गुम होती गई.

कई मौके पर ये सवाल उठते रहे हैं कि क्या यही है बिरसा के सपनों का झारखंड. दरअसल, अलग राज्य गठन के बाद से भौगोलिक, प्रशासनिक, भाषाई अधिकार तो मिला, लेकिन संतुलित, सम्यक विकास और भविष्य का तानाबाना कहीं पीछे छूटता रहा. 

खनिज संपदा से परिपूर्ण झारखंड में अब भी एक अकुलाहट, बैचेनी है. 20 सालों में बदले बहुत कुछ, पर बिरसा के सपनों का झारखंड अब भी कहीं पीछे छूट रहा है. 

लिहाजा बिरसा के सपने पूरे हों, यह संकल्प दोहराये जा रहे हैं. उम्मीद कीजिए बिरसा के संघर्ष और बलिदान का दीया युगों तक जलता रहे.


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