क्या नेतृत्व की कमोबेश सहानुभूति के बाद भी रघुवर दास की राह में अभी और कांटे हैं

क्या नेतृत्व की कमोबेश सहानुभूति के बाद भी रघुवर दास की राह में अभी और कांटे हैं
Publicbol (File Photo)
पीबी ब्यूरो ,   Mar 12, 2020

विधानसभा का चुनाव हारने और सत्ता गंवाने के बाद भी क्या रघुवर दास की मुश्किलें कायम हैं. क्या बीजेपी में नेतृत्व की सहानुभूति के बाद भी रघुवर की राह में अभी और कांटे हैं. क्या रघुवर का बेहतर एडजस्टमेंट हो जाए, नेतृत्व के कमबेसी चाहने के बाद भी समय उनका साथ नहीं दे रहा. क्या झारखंड की सियासत रघुवर दास के दिन अब लदते ही जा रहे हैं. 

पिछले चार महीने के दौरान झारखंड बीजेपी की राजनीति और केंद्र की रणनीति पर गौर करे, तो ये सवाल एक साथ खड़े हो जाते हैं.

झारखंड में दीपक प्रकाश को बीजेपी का प्रदेश अध्यक्ष बनाए जाने के बाद यह कयास लगाए जा रहे थे कि रघुवर दास को राज्य सभा के लिए बीजेपी उम्मीदवार बना सकती है. लेकिन यह नहीं हो सका.

लेकिन राज्य सभा के लिए भी बीजेपी ने दीपक प्रकाश को ही सामने किया. हालांकि बीजेपी ने वक्त, समीकरण, रणनीति और परिस्थितियों के हिसाब से ही यह फैसला लिया है. राज्य सभा की एक सीट हर हाल में निकालना बीजेपी के लिए समय का तकाजा है.

जबकि अंदरखाने की खबरों के मुताबिक केंद्रीय चुनाव समिति की बैठक में झारखंड से दो ही नाम- रघिवर दास और दीपक प्रकाश पर चर्चा हुई. 

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जबकि ऱघुवर दास प्रदेश अध्यक्ष बनने की दौड़ में भी शामिल थे. प्रदेश अध्यक्ष की दावेदारी से पिछड़ने के बाद राज्य सभा में जाने की भी अपनी इच्छा से नेतृत्व को वाकिफ कराया था. दरअसल, पार्टी में झारखंड से लेकर दिल्ली तक अब भी रघुवर दास की बातें सुनी जाती है.   

गौर कीजिए, 17 फरवरी को रांची में बाबूलाल मरांडी के बीजेपी में शामिल होने के कार्यक्रम में शिरकत करने आए पार्टी के पूर्व राष्ट्रीय अध्यक्ष और गृह मंत्री अमित शाह ने रघुवर दास के कार्यों की तारीफ की थी. उन्होंने कहा था कि रघुवर दास ने पांच साल में झारखंड के लिए बहुत काम किए और केंद्र सरकार की योजनाओं को जमीन पर पहुंचाया.

अब बात राज्य सभा चुनाव की. झारखंड में चुनाव जीतने के लिए बीजेपी को अपनी पार्टी के वोट के अलावा कम से कम दो और वोट की जरूरत होगी. बीजेपी की सीधी नजर आजसू की ओर है. 

जबकि रघुवर दास से आजसू प्रमुख सुदेश कुमार महतो के रिश्ते में अब भी खटास कायम है. इसकी जानकारी बीजेपी नेतृत्व को विधानसभा चुनाव से पहले गठबंधन की कोशिशों के दौरान ही हो चुकी थी. 

आजसू ने राज्य सभा चुनाव को लेकर अब तक पत्ते नहीं खोले हैं. हालांकि कुछ दिनों पहले सुदेश कुमार महतो ने कहा था कि बीजेपी किसे उम्मीदवार बनाती है, पहले देखा जाए. साथ ही पार्टी के अंदर इस मामले में बात बाकी है. 

जाहिर है सुदेश महतो के इस बयान से बीजेपी के कान खड़े हो गए. रघुवर दास को ही चुनाव हराने वाले सरयू राय का वोट लेना भी बीजेपी के लिए बहुत आसान नहीं था.

उधर बरकट्ठा में निर्दलीय चुनाव जीते अमित यादव भी रघुवर दास के नाम पर बीजेपी को वोट देने के लिए शायद तैयार नहीं होते. क्योंकि अमित यादव को इस बात की टीस है कि रघुवर दास के ना चाहने के कारण ही उन्हें बीजेपी से टिकट नहीं मिला. जबकि वे बीजेपी से टिकट के दावेदार थे. 

इससे पहले रघुवर दास की तमाम कोशिशों के बाद भी विधानसभा चुनाव में आदिवासी सीटों पर करारी हार की वजह से ही बीजेपी ने बाबूलाल मरांडी को वापस लाने की रणनीति पर काम शुरू किया. और अब बाबूलाल बीजेपी में विधायक दल के नेता हैं. 

इन सबके बीच फिलहाल रघुवर दास के लिए झारखंड में अहम जिम्मेदारी पाना या राज्य सभा में जाना फिलहाल आसान नहीं दिखता. अब बहुत होगा, तो पार्टी उन्हें केंद्रीय स्तर पर बड़ी जिम्मेदारी दे सकती है. लेकिन प्रदेश अध्यक्ष बनना या राज्य सभा में जाने का मौका फिलहाल उनके सामने से निकल गया है.  


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