हजारीबागः कोयला खनन और किसानों की बेबसी, रौंदी जा रही भर छाती लहलहाती धान की फसलें

हजारीबागः कोयला खनन और किसानों की बेबसी, रौंदी जा रही भर छाती लहलहाती धान की फसलें
पीबी ब्यूरो ,   Sep 18, 2019

देखिए, सबकुछ आपके सामने है. भर छाती खेतों में लहलहाती धान की फसलें रौंदी जा रही है. और किसान खून के आंसू रोने को मजबूर है. खेती के मौसम में घर- बार छोड़कर गुहार लगाने कहां जाएं. और जाएं भी तो इंसाफ किससे मिले. जिला प्रशासन को ग्रामीणों ने आवेदन देकर सारी बातों की जानकारी दी है, पर मजाल कि त्रिवेणी संगम कंपनी को कोई फर्क पड़े. पुरखों की जमीन हाथों से निकली जा रही है. हमारे हिस्से बेबसी के सिवा कुछ नहीं. 

हजारीबाग जिले में चुरचू गांव के गोवर्धन यादव एक सांस में इतना कुछ बोल जाते हैं. उनके साथ हताश-निराश कई ग्रामीण हैं, जो हामी भरते हैं. सबकी आंखों में बेबसी की झलक साफ दिखती है- ''बस ढाई- तीन महीने की बात है. धान लहलहरा रही है. कोयला खनन के नाम पर इन खेतों को इस कदर रौंदा नहीं जाए''. 

फिलहाल चुरचू के कई किसान इसलिए परेशान हैं कि कोयला खनन से निकलते मलबे (ओवर बर्डन) को खेतों में गिराया जा रहा है. जिन खेतों में फसलें लहलहा रही हैं उसे मलबे लदे हाइवा और डंफर रौद रहे हैं.

गांव की महिलाएं खेतों का हाल देख रोती- कलपती हैं. बुजुर्गों का गला रूंध जाता है. विरोध के साथ मन में आशंकाएं रहती हैं कि न जाने कब लाठियां-गोलियां बरसा दी जाए.

चुरचू की सुनीता देवी कहती हैं कि मुआवजा भी नहीं मिला है और हमलोग जमीन दिए हैं. सरकारी साहब आए थे, तो बोले थे कि खेतों में गाड़ियां नहीं घुसेगी, लेकिन अब क्या हो रहा है, सब देखा जा सकता है. 

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खनन परियोजना 

एनटीपीसी के पंकरी- बरवाडीह कोयला खनन परियोजना के तहत इस इलाके में त्रिवेणी सैनिक कंपनी को काम मिला है. ग्रामीणों के विरोध की वजह से लंबे समय तक यहां खनन का काम शुरू नहीं हो सका था. लेकिन वक्त के साथ विरोध की आवाजें दबाई जाती रही. 

हजारीबाग के बड़कागांव और चुरचू में किसानों- रैयतों के दर्द के अंतहीन सिलसिला का यह ताजा हिस्सा है. इस इलाके को धान का कटोरा भी कहा जाता है. अवध यादव कहते हैं, अब वो गुमान भी आंसुओं में धूल रहे हैं. कोयला खनन को लेकर जमीनें जिस तरह से डरा- धमका कर ली जा रही हैं, उसमें न धान रहेगा और न ही कटोरा. 

इसे पहले बड़कागांव में जमीन बचाने और उचित मुआवजे की मांग को लेकर किसानों- रैयतों के साथ टकराहट की कई घटनाएं सामने आ चुकी हैं. उस इलाके ने आंदोलन का लंबा दौर के साथ पुलिस की फायरिंग में चार निर्दोष लोगों को मरते भी देखा है. 

अनदेखी की जा रही

चुरचू के कैलाश कुमार और विजय कुमार बताते हैं कि हजारीबाग जिले के उपायुक्त को ग्रामीणों ने एक आवेदन देकर बताया है कि चुरचू के भू-स्वामियों को एनटीपीसी एवं त्रिवेणी सैनिक कंपनी के पदाधिकारियों द्वारा प्रताड़ित किया जा रहा है. साथ ही मुआवजा देने में धोखाधड़ी की जा रही है.

ग्रामीणों ने अपने आवेदन में जिक्र किया है कि जमीन मालिकों, एनटीपीसी पदाधिकारियों, त्रिवेणी सैनिक के पदाधिकारियों, अपर समाहर्ता हजारीबाग तथा अंचलाधिकारी की उपस्थिति में हुई बैठक में जिन बिंदुओ पर समझौता हुआ था, उसका अनुपालन नहीं किया जा रहा. यह बैठक बीते18 मई 2019 को हुई थी. 

अवद यादव का कहना है कि समझौते में यह भी शामिल था कि चुरचू के लोगों को कंपनी रोजगार देगी, लेकिन इसकी भी अनदेखी की गई. इलाके में हो रही फसलो की बर्बादी की क्षतिपूर्ति की शर्त पर ही किसानों ने जमीन दी थी, जिसे नहीं माना जा रहा है. जबकि कई रैयत मुआवजे की तय राशि से संतुष्ट नहीं हैं. उनका मुआवजा ट्रिब्यूनल कोर्ट में जमा किया गया है. 

चुरचू के ही तपेश्वर कुमार बताते हैं कि यह भी तय हुआ था कि जबतक ग्रामीण मुआवजा नहीं लेते हैं तब तक फसलों की क्षतिपूर्ति की जाएगी. जब क्षतिपूर्ति नहीं की गई, तो रैयतों ने खेती की. अब उन खेतों मे कोयले खनन का मलबा (ओबी) डाला जा रहा है.

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ग्रामीणों का आरोप है, ''विरोध करने पर त्रिवेणी संगम कंपनी के पदाधिकारी दंबगई पर उतर जाते हैं. वे कहते हैं कि हाथ पसारो तब पैसे मिलेंगे. पुलिस और प्रशासन का भी भय दिखाया जाता है''. 

उठते रहे हैं सवाल 

गौरतलब है कि कोयला खनन की इस परियोजना को लेकर कंपनी फॉरेस्ट क्लीयरेंस के साथ पर्यावरण संरक्षण तथा नियम कायदों की अनदेखी को लेकर भी सवाल उठते रहे हैं. इस मामले में एक उच्च स्तरीय जांच कमेटी भी बैठाई गई थी. यह रिपोर्ट एनजीटी को दी गई है.  


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