मशहूर नागपुरी गायक मधु मंसूरी को पद्मश्री सम्मान, झूमा गांव-जवार, जंगल-पठार, हिलोरे लेती नदियां

मशहूर नागपुरी गायक मधु मंसूरी को पद्मश्री सम्मान, झूमा गांव-जवार, जंगल-पठार, हिलोरे लेती नदियां
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पीबी ब्यूरो ,   Jan 25, 2020

रचनाएं और गीतों से झारखंड आंदोलन में जान फूंकने वाले जाने-माने नागपुरी गायक मधु मंसूरी हंसमुख को पद्मश्री सम्मान मिला है.

उन्हें यह सम्मान मिलने से खासकर छोटानागपुर के गांव- जवार, जंगल-पठार में खुशियां छाई हैं. उन्हें बधाई देने का सिलसिला जारी है. सोशल साइट पर उनके गीत जमकर शेयर किए जा रहे हैं. मंसूरी के गांव रातू सिमलिया में भी लोग गर्व कर रहे हैं. 

मधु मंसूरी हंसमुख के अलावा झारखंड से एक और कलाकार शशिधर आचार्य को भी पद्मश्री से सम्‍मानित किया गया है. शशिधर आचार्य ने छऊ नृत्य को अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर पहचान दिलाने में अहम भूमिका निभाई है. वे पांचवीं पीढ़ी के कलाकार माने जाते हैं. 

इस सम्मान पर मधु मंसूरी हंसमुख की पहली प्रतिक्रिया है, ''यह सम्मान पूरे झारखंड को मिला है. इस सम्‍मान के हकदार सही मायने में झारखंड की जनता है, जिन्‍होंने 50 सालों से हमें प्‍यार दिया. गीतों को दिलों के करीब रखा. इस सम्मान से गांव की माटी भी गौरवान्वित महसूस कर रही है. इस पुरस्‍कार से यहां के कलाकारों, खासकर युवा पीढ़ी को नई ऊर्जा मिलेगी.''.  

सुनिये #झारखंड कर कोरा...। अद्भुत गीत है। बरसों पहले बिना किसी वाद्ययंत्र के ट्रेन पर फिल्माया गया।

Posted by Pankaj Saw on Monday, 8 January 2018

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मधु मंसूरी ने पद्मश्री सम्‍मान को अपने पिता को समर्पित किया. 72 साल के मधु मंसूरी अब भी उसी अंदाज और लय में गीत गाते है, जैसा जवानी के दिनों में गाते थे. उनकी शिक्षा मैट्रिक तक हुई. 

मेकॉन से सेवानिवृत्त होने के बाद उन्‍होंने पूरा जीवन नागपुरी भाषा, साहित्‍य, कला संस्‍कृति और गायन को समर्पित कर दिया. 50 वर्षों से अधिक समय से नागपुरी में एक से बढ़कर एक गीत गाने वाले मंसूरी का एक गीत- ''गांव छोड़ब नाही, जंगल छोड़न नाही''... 'नागपुर कर कोरा', झारखंडी दिलों में रचता-बसता है. 

उनके गीतों में वृत्तचित्र 'लोह‍रदगा एक्‍सप्रेस' के टाइटल सॉंग काफी प्रचलित हुए. इसके साथ ही झारखंड की सभ्‍यता और संस्‍कृति के साथ ही प्रकृति के रहस्‍यों को भी अपने गीतों में शामिल किया है. उनके गीतों की खासियत यह है कि उसमें लोक परंपराएं समाहित हैं. 

उन्‍होंने कई रचनाएं भी रची हैं. कई गानें काफी प्रसिद्ध हुए. झारखंड आंदोलन के दौरान मंसूरी के गीत युवाओं में जोश भरते थे. 

इतनी शोहरत हासिल करने के बाद भी मंसूरी ने कभी गांव छोड़ना नहीं स्वीकार किया. जिंदगी में उन्होंने काफी उतार- चढ़ाव देखे. मुफलिसी का सामना किया, लेकिन कभी विचलित नहीं हुए. 

हंसमुख न केवल एक अच्‍छे गायक हैं, बल्कि बेजोड़ मांदर वादक और नर्तक भी हैं. उन्‍होंने पद्मश्री डॉ रामदयाल मुंडा और पद्मश्री मुकुंद नायक के साथ मिलकर नागपुरी गीत-संगीत को विदेशों तक पुहंचाया और लोकप्रिय बनाया.

हंसमुख फिलहाल कई कला संस्‍कृति संस्‍थाओं से जुड़े हैं, जिसमें वो नागपुरी साहित्‍य संस्‍कृति मंच के उपाध्‍यक्ष भी हैं.

मंसूरी ने सरकार और सिस्टम के सामने कभी अपने बेबसी या दर्द साझा नहीं किया. वे कहते हैं, लोगों के प्यार में दर्द कम पड़ जाते हैं. झारखंड आंदोलन को जब मुकाम मिला, तो लगा गीतों को जी लिया. 

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मंसूरी गांवों के मर्म को बखूबी समझते हैं. सामाजिक सरोकार उनके लिए बेहद अहम होते हैं.

युवा पत्रकार पंकज साव ने अपने फेसबुक वाल पर लिखा है, मधु मंसूरी को पद्मश्री. अच्छा लगा. उन्होंने एक अद्भुत गीत भी साझा किया है., एक और युवा पत्रकार कुमार गौरव ने उन्हें बधाई दी है और गांव छोड़ब नाही गीत के पंक्तियों को उद्धृत किया है. 

भाषा, कला, संस्कृति, पंरपरा, साहित्य पर लिखते रहे पत्रकार संजय कृष्ण ने लिखा है, ''सम्मान का हुआ सम्मान, बधाई''. 


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