'बिरसा मुंडा की धरती के हैं इसलिए हिम्मत रखते हैं, पर बेबसी के बीच कब तक टिक सकेंगे परदेस में'

'बिरसा मुंडा की धरती के हैं इसलिए हिम्मत रखते हैं, पर बेबसी के बीच कब तक टिक सकेंगे परदेस में'
Photo- Issac Mundu
पीबी ब्यूरो ,   Mar 30, 2020

रांची से सरकारी फोन आया था. उनसे हमने कहा, सब लोग लौटना चाहते हैं. उधर (रांची) से कहा गया खाने का इंतजाम हो जाएगा. सबको लाना मुश्किल है. मगर खाने का इंतजाम का अब तक इंतजार ही है. गनीमत बिरसा की धरती के लोग हैं. हिम्मत रखते हैं. पर इस हाल में कब तक टिक सकेंगे. अभी चावल और मसूर दाल पका रहे हैं. बहुत राशन भी नहीं पकड़े हैं. किराए के कमरे में रहते हैं. डर लगा है खाली करने को कहा, तब क्या करेंगे. पैदल भी चल देते, पर सैकड़ों मील दूर है अपना गांव. दिहाड़ी खटने आए परदेस और बुरी तरह फंस गए.

इसाक मुंडू एक सांस में बोल कर खामोश हो जाते हैं. इसाक खूंटी जिले के अड़की प्रखंड के बड़ी निचकल पंचायत के रहने वाले हैं. खूंटी का अड़की, यानी उलगुलान के नायक बिरसा मुंडा की धरती.

मुंडू बताते हैं कि करीब खूंटी समेत झारखंड के दूसरे जिलों के करीब 290 लोग कर्नाटक के मैंगलोर में फंसे हैं. इनमें अधिकतर आदिवासी मजदूर हैं. 

हालांकि इस युवा मजदूर को इसकी भी जानकारी है कि आज झारखंड के मुख्यमंत्री ने कर्नाटक के मुख्यमंत्री से उनके लिए मदद की दरकार बताई है. अब उन्हें मदद का इंतजार है. 

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वे कहते हैं कि पास में पैसे नहीं हैं. फोन में भी टॉकटाइम खत्म होने वाला है. इसके बाद तो घर से भी संपर्क टूटता जाएगा. 

मैट्रिक तक पढ़े इसाक मुंडू बताते बताते हैं कि वे 13 मार्च को अपने गांव-गिराव के कुछ साथियों के साथ मैंगलोर पहुंचे थे. वहां क्या काम है, सवाल पर उन्होंने कहा फैक्ट्री में ठेकेदार के अंदर दिहाड़ी खटना है. 

मैंगलोर रिफाइनरी एंड पेट्रोकैमिकल्स लिमिटेड (एम.आर.पी.एल), मंगलौर शहर से उत्तर में स्थित कटिपल्ला में स्थापित एक तेल-शोधन कारखाना है. मुंडू के मुताबिक झारखंड के बहुत से आदिवासी मजदूर इसी कारखाने में रोजी रोटी की खातिर सालों से खटते रहे हैं. 

यह जगह झारखंड की राजधानी रांची से 2225 किलोमीटर दूर है. 

इसाक मुंडू ने बताया कि मैंगलोर से कटिपल्ला आने में बीस रुपए लगता है. वेलोग कटिपल्ला में ही रहते हैं. कटिपल्ला इलाके में ही खूंटी के अधिकतर मजदूर टिके हैं. 

बारगी, उलिहातु गांव के एक अन्य श्रमिक जयपाल पूर्ती बताते हैं कि कारखाना बंद है. लॉक डाउन के चलते घरों से निकलने पर पाबंदी है. गांव लौटना चाहते हैं, लेकिन कोई राह नहीं दिखती. 

बाहर क्यों चले गए, सवाल पर जयपाल कहते हैं कि जीने के लिए पैसे चाहिए और पैसे के लिए हाथ को काम तो चाहिए. कोई शौक से परदेस तो आता नहीं. यहां पहले से झारखंड के लोग खटते रहे हैं. जब ठेका खुलता है, तो मजदूर खींचे चले आते हैं.

जयपाल पूर्ती बताते हैं, ''सभी मजदूर किराए के घर में रहते हैं. लॉक डाउन के बाद उनके पास अब चंद दिनों का राशन-पानी ही बचा है. दो-चार दिनों के बाद वे क्या खांएंगे इसकी चिंता उन्हें सता रही है. खुद के कोरोना वायरस से संक्रमित होने का भय सता रहा है, तो दुसरी ओर परिवार की चिंता. वे घर वापस लौटना चाहते हैं, लेकिन उनके पास कोई विकल्प नहीं रह गया है. घर वालों से बातें हो रही है, तो किसी हाल में लौटने को कहते हैं''.

इसके साथ ही वे सवाल पूछते हैं, ''सरकार तो ध्यान दे रही है ना. सरकार चाहेगी, तो जरूर वापस हो सकेंगे. हो सके, तो हमारी बात सरकार, साहब और क्षेत्र के जनप्रतिनिधियों तक पहुंचा दीजिएगा''. 

इससे पहले इसाक मुंडू नें मैंगलोर में फंसे पड़े मजदूरों के नाम- पता की जो सूची भेजी है उनमें अधिकतर लोग खूंटी के मुरहू, अड़की, रांची जिले के मांडर, सरायकेला जिले के कुचाई, चाईबासा के बंदगांव के रहने वाले हैं. 

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इधर उलिहातू के वार्ड पार्षद सामुएल पूर्ति कहते हैं कि घर- गांव के लोग भी चिंता में है. वे बिरसा के गांव के हैं, खतरे से बच कर निकल जाएंगे. लेकिन यह घटना यह भी जाहिर करती है कि आदिवासियों को अपने ही गांव- घर से किस तरह पलायन करना पड़ता है. 

बात की कर्नाटक के सीएम से

इस बीच मीरा संघमित्रा ने आदिवासियों की इस बेबसी पर झारखंड के मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन को ट्वीट करके ध्यान खींचा है. हेमंत सोरेन ने इसके बाद कर्नाटक के मुख्यमंत्री को ट्वीट कर मदद की दरकार बताई है. 

साथ ही हेमंत सोरेन ने राज्य में प्रवासी मजदूरों की मदद के लिए बनाए गए कंट्रोल रूम क भी इस मामले में गंभीरता से कार्रवाई करने को कहा है.

कर्नाटक के मुख्यमंत्री ने भरोसा भी दिलाया है कि उनकी सरकार उन मजदूरों को हर संभव मदद पहुंचाएगी. 

उधर आदिवासी मजदूरों को मदद का इंतजार है. साथ ही मन में की सवाल. बातचीत में वे जरूर पूछते हैं कि अपने गांव लौट तो सकेंगे. 

खूंटी के गांव-गिराव के हालात और आदिवासी विषयों को लंबे समय से कवर करते रहे पत्रकार अजय शर्मा कहते हैं कि मदद की दरकार मजदूरों को है और उनके घर वालों को भी. सरकार और स्थानीय प्रशासन को इस मामले को गभीरता से देखना चाहिए. 

अजय शर्मा आगे कहते हैं यह बेबसी ही तो है कि उलगुलान के नायक की धरती के युवा दूसरे राज्यों में दिहाड़ी खटने को विवश हैं. वे बताते हैं कि दूसरे राज्यों में भी खूंटी के सैकड़ों मजदूर फंसे पड़े हैं. गुंजाइश इसकी भी है कि लॉक डाउन खत्म होने के बाद उनकी परेशानी और बढ़ेगी जब मंदी की दौर होगा और वे काम से हटा दिए जाएंगे. 


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