दुमकाः सुनील ने रोका दिग्गज शिबू सोरन का विजय रथ, 47 हजार से जीते

दुमकाः सुनील ने रोका दिग्गज शिबू सोरन का विजय रथ, 47 हजार से जीते
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पीबी ब्यूरो ,   May 23, 2019

झारखंड मु्क्ति मोर्चा के केंद्रीय अध्यक्ष, पूर्व मुख्यमंत्री शिबू सोरेन चुनाव हार गए हैं. संताल परगना में आदिवासियों के बीच सर्वमान्य नेता माने जाते रहे शिबू सोरेन के विजय रथ को बीजेपी के सुनील सोरेन ने इस बार रोक लिया है. सुनील सोरेन ने शिबू सोरेन को 47 हजार 590 वोटों से हराया है.

शिबू सोरेन की इस हार से जेएमएम को बड़े सेटबैक का सामना करना पड़ सकता है. साथ ही संताल परगना का गढ़ दरकने का खतरा भी हो सकता है. वैसे भी 2014 के विधानसभा चुनाव में दुमका की सीट बीजेपी की लुइस मरांडी ने हेमंत सोरेन से छीन ली है. अब विधानसभा के साथ ही लोकसभा की सीट बीजेपी के कब्जे में आ गई है. 

दुमका विधानसभा में इस बार भी बीजेपी ने शिबू सोरेन से बढ़त ले ली. साथ ही जामा, सारठ और नाला विधानसभा में भी सुनील सोरेन आगे रहे. जामा में जेएमएम की सीता सोरेन का कब्जा है, जो शिबू सोरेन की बड़ी बहू हैं. जबकि नाला में भी जेएमएम का कब्जा है. 

शिबू सोरेन दुमका से आठ बार चुनाव जीते हैं. इस बार जीतते, तो उनकी नवीं जीत होती. शिबू सोरेन के नाम की वजह से दुमका को अब तक जेएमएम का अभेद्य किला माना जाता रहा है. 

सुनील सोरेन 2009 और 2014 के चुनाव में शिबू सोरेन से हार गए थे. 2014 में सुनील सोरेन शिबू सोरेन से 39 हजार 30 वोट से हारे थे. जबकि 2009 में 18 हजार वोटों से ही हार का सामना करना पड़ा था. साधारण परिवार से आने वाले सुनील सोरेन जामा विधानसभा क्षेत्र के पूर्व विधायक रहे हैं. 

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भाजपा ने सुनील सोरेन पर ही भरोसा करते हुए तीसरी बार मैदान में उतारा. सुनील सोरेन ने भी हिम्मत नहीं हारी और दिन रात की मेहनत करते रहे. युवा और उर्जावान होने का उन्होंने लाभ उठाया तथा गांव- गांव तक जाते रहे. सुनील सोरेन को जेएमएम के हर दांव- पेंच और घाट का बखूबी पता है. लिहाजा उन्होंने अपनी गोटी चलने में कोई चूक नहीं की. वे खुद गांवों में ज्यादा घूमते रहे. उन्हें इस दफा अहसास था कि शहरी और कस्बाई क्षेत्र में वैसे ही बीजेपी की लहर काम कर जाएगी. सिर्फ गांवों में वोटरों का मिजाज बदलना है. परिणाम बताते हैं कि वे इसमें सफल हुए. 

इधर जेएमएम के साथ दिशोम गुरु (शिबू सोरेन) भी इस भरोसे में रहे कि दुमका के वोटरों का उन पर दशकों से जमा विश्वास कायम रहेगा. लेकिन परिणाम आने के साथ यह टूटता नजर आ रहा है.  

2014 में नरेंद्र मोदी की प्रचंड लहर में भी संताल परगना की दुमका और राजमहल सीट से जेएमएम की जीत हुई थी. तब से ही बेजीपी को यह खटक रहा था कि दुमका और राजमहल में जेएमएम को रोकना जरूरी है.  हालांकि राजमहल सीट पर जेएमएम ने फिर जीत दर्ज की है. लेकिन शिबू सोरेन की हार में ही बेजेपी जेएमएम और हेमंत सोरेन की भी हार देख रही है. 

इस बार शिबू सोरेन के विजय रथ को रोकने के लिए बीजेपी और खास कर मुख्यमंत्री रघुवर दास ने कोई दांव खाली जाने नहीं दे रहे थे. रघुवर दास ने चुनाव की तारीख नजदीक आने के साथ ही संताल परगना में डेरा डाल दिया. साथ ही प्रचार के दौरान रघुवर दास जेएमएम और उसके सहयोगी दलों पर जमकर निशाना साधते रहे. 

रघुवर दास और बीजेपी के नेता, कार्यकर्ता संताल परगना में आदिवासियों को यह बताते रहे कि जेएमएम ने अब तक लोगों को बरगलाया है, जबकि बीजेपी विकास की बुनियाद पर राजनीति करती रही है.

 उधर जेएमएम के सबसे बड़े रणनीतिकार हेमंत सोरेन चुनावी प्रबंधन और प्रचार की कमान संभाल रहे थे. वे भी बीजेपी के खिलाफ तरकश के हर तीर खाली करते रहे. जबकि शिबू सोरेन के समर्थन में बाबूलाल मरांडी, सुबोधकांत सहाय, तारिक अनवर, बंधु तिर्की सरीखे नेताओं ने भी प्रचार किया था. 

इस चुनाव में दुमका में सबसे ज्यादा 73 फीसदी वोट डाले गए, तो बीजेपी और जेएमएम दोनों यह उम्मीद लगाते रहे कि इसका लाभ मिलेगा. जेएमएम को यह लगा कि गांवों में पड़े वोट का लाभ वह ले जाएगा, जबकि परिणाम इसके संकेत हैं कि गांवों में भी बीजेपी ने इस बार जेएमएम की घेराबंदी की. 


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