क्या सुदेश ने जिनके लिए किया महासंग्राम, वे पिटे मोहरे निकले?

क्या सुदेश ने जिनके लिए किया महासंग्राम, वे पिटे मोहरे निकले?
पीबी ब्यूरो ,   Dec 27, 2019

विधानसभा चुनाव परिणाम के बाद बीजेपी के अंदर आजसू से गठबंधन टूटने को लेकर बातें उठने लगी है, तो आजसू में भी कशमकश का दौर जारी है कि जिनके लिए सुदेश महतो ने महासंग्राम किया, वही चुनाव में पिटे हुए मोहरे निकले. 

दरअसल,  छह महीने पहले लोकसभा चुनाव में नरेंद्र मोदी की प्रचंड लहर पर सवार बीजेपी के लिए झारखंड विधानसभा चुनाव धक्का देने वाला साबित हुआ है.

साथ ही सरकार और लोकसभा चुनाव में बीजेपी के साथ चली आजसू के लिए भी नतीजे बेहद परेशान करने वाले हैं.

सुदेश कुमार महतो को लोहरदगा, चंदनकियारी, चक्रधरपुर, सिंदरी, सिमरिया, इचागढ़ पर सबसे ज्यादा भरोसा था. संगठन और नेता के हिसाब से वे लोहरदगा. चक्रधरपुर और चंदनकियारी सीट किसी हाल में छोड़ना नहीं चाहते थे.

उनके जेहन में और आंखों के सामने कमलकिशोर भगत तथा उमाकांत रजक का चेहरा था. कमलकिशोर भगत इसी साल दो अक्तूबर को जेल से रिहा होकर निकले हैं. और लोहरदगा में उनकी पत्नी नीरू शांति भगत चुनाव लड़ीं और कांग्रेस से हार गईं.  

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लेकिन मैदान कमलकिशोर भगत ही संभाल रहे थे. उधर उमाकांत रजक 2014 का चुनाव हारने के बाद 2019 के चुनाव की तैयारी में जुटे थे.

इससे पहले 2009 में उमाकांत रजक चुनाव जीते थे. जबकि 2005 में हार गए थे. 2005 से ही सुदेश की नजर चंदनकियारी की सीट पर थी. 

कमलकिशोर भगत भी 2009 और 2014 का चुनाव लोहरदगा में जीते थे. 2015 में उनकी सदस्यता खत्म होने के बाद उपचुनाव में कांग्रेस के सुखदेव भगत चुनाव जीते. इस बार सुखदेव भगत चुनाव के वक्त बीजेपी में चले गए और कांग्रेस के रामेश्वर उरांव से हार गए.

आजसू को इसका दर्द है कि लोहरदगा सीट तमाम कोशिशों के बाद वह बचाने, चंदनकियारी में वापस होने तथा चक्रधरपुर, इचागढ़, सिमरिया, सिंदरी और बड़कागांव में झंडा गाड़ने में वह सफल नहीं रही.

जबकि चंदनकियारी, लोहरदगा और चक्रधरपुर की रैलियों में सुदेश कुमार महतो यह कहते हुए अपने उम्मीदवारों का पीठ ठोकते और समर्थकों को लामबंद करते रहे कि वे ( बीजेपी वाले) यह सीट लेने पर अड़े थे, हमने कहा कि यह नहीं हो सकता. पहले संगठन तब गठबंधन.

दरअसल, अलग- अलग विधानसभा क्षेत्र में चुनाव की तैयारी कर रहे नेताओं का लगातार दबाव बनाते रहे कि वे हर हाल में चुनाव लड़ेंगे. उमाकांत रजक यहां तक दावेदारी करते रहे कि वे किसी छाप ( सिंबल ) से लड़ेंगे चुनाव फतह करेंगे.

जाहिर है पार्टी पर दबाव था कि अगर चंदनकियारी सीट बीजेपी के लिए छोड़ दें और उमाकांत निर्दलीय लड़क जीत जाएं, तो वह दर्द भी गहरा होगा. 

तब आजसू अकेले चुनाव में उतरे, तो चुनावी मोर्चे पर उम्मीदवार की दमदारी के लिए पार्टी ने साधन-सुविधा मुहैया कराने में कोई कसर नहीं छोड़ी.

प्रचार असरदार रहे, इसके लिए भी सभी दलों से ज्यादा आजसू ने तैयारियां की. सबसे बड़े खेवनहार के तौर पर सुदेश महतो ने प्रचार की कमान संभाली और हर जगह जाते रहे.

लेकिन नतीजे सामने आने के बाद वोट के समीकरणों के साथ उम्मीदवारों की दावेदारी और तैयारियों पर सवाल उठने लगे हैं.

साथ ही ये बातें भी उठने लगी कि गठबंधन के वोट समीकरण के सामने बीजेपी- आजसू को अलग होने का बड़ा नुकसान हो चुका है. 

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गठबंधन की बात 

इस बार आजसू ने गठबंधन को लेकर बीजेपी के सामने 17 सीटों पर दावेदारी पेश की थी. गठबंधन को लेकर बातचीत के दौरान ही बीजेपी ने 52 उम्मीदवारों की पहली सूची जारी कर दी.

इससे पहले लोहरदगा से सुखदेव भगत को बीजेपी में शामिल करा लिया गया.आजसू प्रमुख सुदेश को यह खटका कि लोहरदगा पर आजसू की वाजिब दावेदारी है, तो बीजेपी ने भरोसा में लिए बिना सुखदेव भगत को टिकट देने के मकसद ही लपक लिया. 

उधर चंदनकियारी में 2014 में अमर बाउरी जेवीएम से चुनाव जीते थे. चुनाव जीतने के बाद वे बीजेपी में शामिल हो गए. सरकार में मंत्री भी बने. सरकार और संगठन दोनों जगह अमर बाउरी छवि बनाने में सफल होते रहे. 

चक्रधरपुर में आजसू के रामलाल मुंडा भी चुनाव लड़ने की तैयारी पहले से कर रहे थे. उन्हें सुदेश का बैकिंग था और सुदेश तैयारियों तथा वोट के समीकरणों को देखते हुए इस उम्मीद में थे कि रामलाल मुंडा रेस का घोड़ा साबित होंगे. लेकिन चुनाव में वे जेएमएम के सामने पिटे हुए मोहरे साबित हुए. 

लोकसभा चुनाव में चाईबासा से बीजेपी के प्रदेश अध्यक्ष लक्ष्मण गिलुआ जब हार गए, तो यह बात उठने लगी थी गिलुआ को पार्टी चक्रधरपुर विधानसभा से चुनाव लड़ा सकती है. गिलुआ भी तैयारी में जुट गए थे. 

गठबंधन के लिए बीजेपी के सामने आजसू ने चक्रधरपुर सीट की भी दावेदारी रखी. बीजेपी को यह मंजूर नहीं था. क्योंकि सवाल प्रदेश अध्यक्ष का था और लक्ष्मण गिलुआ के पीठ पर रघुवर दास ने हाथ रखा था. लेकिन चक्रधरपुर सीट बीजेपी जेएमएम से छीन नहीं सकी.

गिलुआ दूसरे नंबर पर रहे. जबकि जेएमएम ने उम्मीदवार भी बदला और जीत भी कायम रखी. इस बार जेएमएम ने जब सुखराम उरांव को उम्मीदवार बनाया, तो 2014 में जीतने वाले शशिभूषण सामड जेवएम से लड़ गए, लेकिन सुखराम हेवी वेट निकले. बीजेपी, आजसू, जेवीएम तीनों को शिकस्त देने में सफल रहे. 

आजसू के रामलाल मुंडा को 17 हजार वोट मिले हैं, जाहिर है जिन पर पार्टी को गुमान था, वह रणबाकुंड़ा साबित नहीं हुए. इधर लोकसभा और विधानसभा चुनाव हार के बाद लक्ष्मण गिलुआ ने भी प्रदेश अध्यक्ष पद से इस्तीफा दे दिया है. बीजेपी और आजसू दोनों के सामने अब टीस के सिवा कुछ नहीं बचा है. 

चंदनकियारी भी हाथ से निकला

चंदनकियारी में भी अमर बाउरी को लेकर बीजेपी शुरुआती दौर में सीट छोड़ने के मूड मे नहीं थी. बाद में दोस्ताना लड़ाई की बात भी चली. लेकिन उमाकांत रजक अपनी तैयारियों को लेकर पार्टी फोल्डर में हर हाल में जीत की दावेदारी करते रहे. 

चुनाव से पहले सुदेश महतो भी चंदनकियारी मे की कार्यक्रम किया और कार्यकर्ताओं, समर्थकों का मिजाज देख इत्मिनान होते रहे कि किसी भी सूरत में यह सीट आजसू के खाते में आएगी.

अलबत्ता 12 दिसंबर को सिल्ली का चुनाव खत्म होने के बाद सुदेश महतो ने चंदनकियारी में पूरा जोर लगाया और समीकरणों के तार जोड़े. 

अमर बाउरी चुनावी चौसर में अपने को घिरा हुआ देखकर संभलते रहे. इस बीच जेएमएम ने विजय रजवार को मैदान में उतारा. अमर बाउरी विजय रजवार और हेमंत सोरेन की मुहिम से नफा-नुकसान का आंकलन करते रहे.

बोकारो में पीएम मोदी की रैली और चंदनकियारी में आखिरी वक्त राजनाथ सिंह के चुनाव प्रचार से भी अमर बाउरी का भरोसा बढ़ा. 

इधर ओवक कंफीडेंट उमाकांत रजक खतरे और वोटों में सेंधमारी को रोकने में नाकाम रहे. सुदेश कुमार महतो की वजहों से कुर्मी वोटों का बड़ा हिस्सा मिलने के बाद भी वे चुनाव नहीं जीत सके. जाहिर है कई सवाल उठने लगे हैं.

जबकि डेढ़ साल से उमाकांत रजक ने सीधे तौर पर अमर बाउरी के खिलाफ मोर्चा खोल रखा था. बाउरी के कामकाज पर निशाना साधने से बाज नहीं आते थे. 

बात कैसे बिगड़ती गई

बीजेपी पहले ही हुसैनाबाद की सीट आजसू के लिए छोड़ चुकी थी. सिमरिया सीट भी बीजेपी छोड़ने के लिए तैयार थी. इधर आजसू की दावेदारी इचागढ़ सीट पर थी. 2014 में बीजेपी ने यह सीट जीती थी. और बीजेपी यह सीट छोड़ना नहीं चाहती थी. 

इस बार जेएमएम ने यहां चुनाव जीता है. और बीजेपी जेएमएम से टक्कर के बाद भी आजसू दूसरे नंबर पर रही है. बीजेपी और आजसू के वोटों को जोड़ने से वह जेएमएम के वोट से ज्यादा होता है.

लिहाजा दोनों दलों को इसका कशक है कि टकराव में बीजेपी और आजसू के हाथ से यह सीट निकल गई. उधर महागठबंधन के पक्ष में वोट का समीकरण हिट करता चला गया. 

आजसू को भरोसा था कि इचागढ़, लोहदगा, चक्रधरपुर, चंदनकियारी और सिमरिया सीट उसके उ्मीदवार निकालने में सफल रहेंगे. लेकिन बीजेपी और आजसू के अलग होकर चुनाव लड़ने का दोनों दलों को खामियाजा भुगतना पड़ा है.

सिमरिया और चंदनकयारी बीजेपी बचाने में सफल रही, तो आजसू को धक्का लगा. 

इसी तरह बड़कागांव सीट को लेकर भी आजसू की उम्मीदें टिकी थी. 2014 के चुनाव में महज 400 वोटों से हारने वाले रोशनलाल चौधरी इस बार 30 हजार से ज्यादा वोटों से हार गए हैं.

यहां भी बीजेपी के उम्मीदवार देने से दोनों दल फंस गई और कांग्रेस की राह आसान हुई. 

इसी तरह 2014 में टुंडी सीट पर जीत हासिल करने वाले राजकिशोर महतो की भी इस चुनाव में  करारी हार हुई. आजसू को इसका अहसास पहले से था कि राजकिशोर महतो सीट नहीं बचा पाएंगे.

लेकिन राजकिशोर महतो को ़ड्रॉप करने की पार्टी ने जहमत इसलिए नहीं उठाई कि वे बगावत की राह पर उतरेंगे और पार्टी के खिलाफ नकारात्मक मैसेज जाएगा. 

लेकिन इस चुनाव में राजकिशोर महतो जिस तरह से पिछड़े हैं उसके संकेत भी साफ हैं कि पांच साल तक मोर्चाबंदी करने और वोट बैंक संभालने में वे अनदेखी करते रहे और जेएमएम हावी होता गया. 

इसी तरह सिंदरी में भी आजसू ने सदानंद महतो उर्फ मंटू महतो पर जमकर दांव खेला . लेकिन नतीजे आने के बाद वह भ्रम भी टूटता गया. मंटू महतो मजबूत प्रदर्शन नहीं कर सके. 


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